मन का शिकार – उसे वश में करना

एक ग्रामीण शिकारी के जीवन पर आधारित यह पद मन को वश में करने का सुझाव देता है । शिकार पर जाते हुए पति से शिकारी की पत्नी कहती है कि हे पतिदेव , किसी जीवित प्राणी की हत्या न करना , परन्तु मरा हुआ , रक्त तथा मांस से हीन शिकार लेकर भी घर न आना । भाव यह है किमनुष्य का असली शिकार मन है जिसका कोई शरीर और रूप नहीं है , परन्तु जो फिर भी संसाररूपी वन में बेखटके दौड़ रहा है । मनुष्य अपने अन्तर में स्थित अपने घर सतलोक में तभी वापस जा सकता है जब वह इस बिना चोच , खुर सिर और शरीर के पशु का शिकार कर ले . अर्थात् अपने मन को वश में कर ले । परन्तु मन को वश में करने का अर्थ इसे केवल संसार के मोह से मुक्त करना है , संसार के काम – काज से छुट्टी दिला देना नहीं । परमार्थी को भी अपने सांसारिक कर्तव्य निभाने होते हैं और इसके लिये उसे अपने मन को संसार में सक्रिय तो रखना ही पड़ता है , मगर यह काम वह मन को वश में रखते हुए भी , उसे संसार में अनासक्त रखते हुए भी कर सकता है ।

शिकारी की पत्नी अपने पति को दूसरे किनारे के शिकारी ( परम – धाम को प्राप्त कर चुके परमार्थी ) का उदाहरण देते हुए प्रेरित करती है कि देखो , उस शिकारी ने डोर – रहित धनुष से ऐसे हिरन का शिकार किया है जिसका सिर नहीं है और उसका वध करके भी उसे जीवित रखा है । यह गुरु के प्रदान किये हुए ज्ञान की महिमा है । तात्पर्य यह है कि हमें अपने मनरूपी मृग को साधारण शिकारियों के से बाण से नहीं , बल्कि ध्यान के धनुष पर सुमिरन का बाण चढ़ाकर उसके द्वारा मारना है । इस प्रकार मारा हुआ मन दुनिया की ओर से मृत रहकर आन्तरिक रूहानी मण्डलों के प्रति जीवित हो जाता है । पद के अन्त में कबीर कहते हैं कि प्रभु , तुझसे मिलने के लिये व्याकुल मैं वृक्ष से लिपटना चाहती एक लता के समान हूँ , परन्तु इस लता में सांसारिक कामना और वासना के पत्ते नहीं हैं ।

जीवत जिनि मारै मूवा मति ल्यावै , मास बिहूँणॉन घरि मत आवै हो कंता ॥ टेक ॥ उर बिन पुर बिन चंच बिन , बपु ‘ बिहूँना सोई । सो स्यावज ‘ जिनि मारैं कंता , जाकै रगत मास न होई ॥ पैली पार के पारधी , ताकी धुनहीं पिनच नहीं रे । ता बेली ‘ को ढूँक्यो मृग लौ ‘ , ता मृग के सीस नहीं रे । मास्या मृग जीवता राख्या , यहु गुरु ग्याँन मही रे । कहै कबीर स्वामी तुम्हारे मिलन कौ , बेली है पर पात नहीं रे ।  कबीर ग्रंथावली , पृ . 119

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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