ज्ञान

ज्ञान ‘ ज्ञा ‘ धातु से निकला है जिसका अर्थ है जानना । अंग्रेज़ी में ‘ know ‘ भी ‘ज्ञा ‘ का ही एक रूप है । आम लोगों ने केवल वाचक ज्ञान को ही काफ़ी समझ लिया है और इसी पर ज़ोर देते नज़र आते हैं । वास्तव में ज्ञान – ध्यान केवल बुद्धि फैलाव का नाम नहीं है । गीता में ज्ञान और विज्ञान का उल्लेख आया है । सृष्टि के सारे नाशवान पदार्थों में एक ही अविनाशी परमपिता परमात्मा व्याप्त हो रहा है , इस अनुभव को ज्ञान माना है । उस नित्य परमेश्वर से इन सभी नाशवान पदार्थों की उत्पत्ति के ज्ञान को विज्ञान कहा है । गीता ( 6 : 8 ) में बताया गया है कि ज्ञान और विज्ञान से तृप्त , योगयुक्त मनुष्य समस्त जीवों में परमेश्वर को और परमेश्वर में संपूर्ण प्राणियों को देखता है ।

वाचक ज्ञान , ध्यान यानी विचार आदि ( जो मन – बुद्धि का फैलाव है ) की भी आवश्यकता है ताकि हम आदर्श को समझ सकें , पर समझकर उस आदर्श को पाने के लिए यत्न करना पड़ता है , जो मन – बुद्धि को स्थिर करने पर ही हो सकता है ।

गुरवाणी में लिखने और पढ़ने को या बुद्धि के विचार को ज्ञान नहीं माना गया बल्कि शब्द और नाम , सच और कीर्तन को ज्ञान कहा है । अंदर सहज की उस ध्वनि ( वाणी ) को , जो सदा घट – घट में हो रही है और सब जगह व्याप्त है , ज्ञान कहा है :

गिआन धिआन गुर सबद है मीठा ॥ गुर किरपा ते किनै विरलै चख डीठा ॥ गुरु अमरदास , आदि ग्रन्थ , पृ . 162

गुर गिआन पदारथ नाम है हर नामो दे द्रिड़ाए । जिस परापत सो लहै गुर चरणी लागै आए ॥ गुरु रामदास , आदि ग्रन्थ , पृ .759

गियान धिआन सच गहिर गंभीरा ॥ कोए न जाणे तेरा चीरा ॥ गुरु नानक देव , आदि ग्रन्थ , पृ .1034

गुरु ज्ञान का साक्षात रूप है । उससे ही ज्ञान की प्राप्ति होती है , जो गुरुमुख बनने पर मिल सकती है । गुरवाणी में स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है कि सतगुरु से ज्ञान पैदा होता है । यह ज्ञान ‘ निरबान ‘ है और बिना सतगुरु के किसी को इसका बोध नहीं होता । यह आज तक बिना गुरु न किसी को मिला है और न मिल सकता है क्योंकि यह कमाई का भेद है और कमाई वालों के द्वारा ही मिल सकता है :

भाई रे गुर बिन गिआन न होए ॥ पूछहो ब्रहमे नारदै बेद बिआसै कोए ॥ गुरु नानक देव , आदि ग्रन्थ , पृ .59

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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