गुरु की मौज

“परमार्थी साखी”

ये बात उन दिनों की है जब बाबा जैमल सिंह जी ने महाराज सावन सिंह जी को अपनी गुरु गद्दी सौपने का निर्णय कर लिया था।

उस दिन बाबा जैमल सिंह ने महाराज सावन सिंह जी से कहा कि – जी मेरे लिए अकाल पुरुष का हुकुम आ चूका है अब मेरे बाद सारी जिम्मेवारी और काम काज तूने ही संभालना है ।

यह बात सुनकर महाराज सावन सिंह जी अचंभित होकर बोले ये काम मुझसे ना होयेगा !

बाबा जैमल सिंह जी – क्यों भाई क्यों नही होयेगा तुझसे ?

महाराज सावन सिंह जी – आप मुझे दूसरा कोई भी काम दसो मैं उसके खिलाफ नही जाऊंगा लेकिन ये इतनी बड़ी जिम्मेवारी वाला काम मुझसे ना होयेगा जी । और फिर इतनी भरी संगत में से आपने मुझे ही क्यों चुना?

उनकी बाते सुनकर बाबा जैमल सिंह जी बोले – मैं अपने गुरु से पूछ के बताता हूँ । और बाबा जैमल सिंह कुछ देर के लिए आँखे बन्द कर अंतर्ध्यान हो कर वापिस आये और बोले – “मौज बन गयी जी”।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी बोले – भाई मौज ये है कि गुरु का हुकुम आया है कि गुरु गद्दी तूने ही संभालनी है। सारा काम सारी जिम्मेवारियाँ तूने ही निभानी है।

फिर महाराज सावन सिंह जी – अच्छा ठीक है लेकिन मैं तो मिलेट्री में एक सरकारी कर्मचारी हूँ मेरा तो खुद का बसर ही पेंशन से होना है तो आगे डेरे के रख रखाव और डेरे की बढ़ती संगत और उनकी सर्व सुविधाओं के लिए आर्थिक काम काज को मैं कैसे मैनेज करूँगा ?

बाबा जैमल सिंह – ये भी गुरु से पुछ के बताता हूँ। फिर वो अंर्तध्यान में गए और वापस लौट कर कहा- फिर मौज बन गयी जी।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है कि हुकुम आया है कि ये सारी चिंताए छोड़ दो । मालिक की दया और संगत की सेवा से कभी कोई काम पैसों के लिए नही रुकेगा । संगत की सेवा के लिए और डेरे के रख रखाव के लिए पैसों की कमी कभी रोडे नही आएगी । कभी हाथ फ़ैलाने नही पड़ेंगे , कभी कोई दान के लिए अपिल भी नही करनी पड़ेगी। बस बरकत ही बरकत होवेगी।

इस बात की भी तस्सली सुनकर महाराज सावन सिंह जी महाराज सोच में पड़ गए । तब बाबा जैमल सिंह जी ने कहा अब क्या सोच रहे हो?

महाराज सावन सिंह जी बोले – आप तो शुरू से ही डेरे की की एक छोटी कुटिया में रह चुके हो , लेकिन मैं और मेरा परिवार शायद इस छोटी कुटिया में एड्जस्ट ना कर पाये।

बाबा जैमल सिंह – अच्छा ये भी गुरु से पूछ कर बताता हूँ अंतर्ध्यान होकर वापस आये और बोले इस बार भी मौज है।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है कि गुरु हुकुम आया है कि तू छोटी कुटिया में नहीं, डेरे में अच्छे से घर में रहेगा, पूरा डेरा ढेर सारे अच्छे अच्छे मकान और सुन्दर सुन्दर बागों से सुशोभित हो जायेगा । अब तो ठीक है भाई !

महाराज सावन सिंह जी – एक बात और कि मैंने सुना है कि जो अगर गुरु संगत को नाम बक्शे और कोई जीवात्मा सिमरन भजन ना कर मुक्त ना हो पाये, तो उस जीवात्मा को मुक्त करने के लिए अपनी जिम्मेवारी के खातिर गुरु को उस जीवात्मा के लिए फिर दूसरे जन्म में आना पड़ता है , लेकिन इस भव सागर में तो मैं दुबारा आना ही नही चाहता।

बाबा जैमल सिंह जी – भाई रुक ये भी पूछ के बता रहा हूँ ।अंतर्ध्यान से वापस आ कर बोले भाई फिर मौज हो गयी।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है कि हुकुम आया है कि आप जिन्हें नामदान देंगे उनकी मुक्ति एक ही जन्म में होगी उन्हें फिर यहाँ आना ही नही पड़ेगा।

महाराज सावन सिंह जी – एक बात और है आप तो जानते ही हैं मिलेट्री में नौकरी के चलते मेरी बोल चाल कभी गुस्से भरी तो कभी मज़ाकिया आदत के कारण मैं तो किसी को कुछ भी बोल देता हूँ और गुरु गद्दी के बाद मेरे ऐसे शब्द किसी के लिए श्राप ना बन जाये।

बाबा जैमल सिंह जी- भाई रुक गुरु से पूछ कर बताता हूँ अंतर्ध्यान हुए और वापस लौट कर बोले-भाई मौज हो गयी।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है कि हुकुम हुआ है कि आपका सिर्फ वरदान ही काम काम करेगा श्राप किसी को नही लगेगा। भाई अब तो ठीक है!

महाराज सावन सिंह जी – ईक और आखरी सवाल है जी।

बाबा जैमल सिंह जी- भाई वो भी पूछ ले ।

महाराज सावन सिंह जी – आप तो 10 से 15 दिन की रखी सुखी रोटियां पानी पी पी के खा लेते हो। लेकिन हो सकता है मैं , मेरा परिवार , और डेरे की बढ़ती संगत को ये खाना ना भावे।

बाबा जैमल सिंह जी – अच्छा ये भी गुरु से पूछ कर बताता हूँ । अंतर्ध्यान हो कर वापस आये और बोले, लो जी इस बार भी मौज हो गयी।

महाराज सावन सिंह जी – कैसी मौज ?

बाबा जैमल सिंह जी – मौज ये है भाई कि हुकुम आया है कि डेरे विच किसी भी संगत को रुखा सुखा नही खाना पड़ेगा। चाहे कितनी भी संगत किसी भी वक़्त डेरे में आये उसे खाने की कमी महसूस नही होगी । कोई भी संगत भूखी ना रहेगी । बस बरकत ही बरकत होएगी । चौबीस घण्टे अटूट लंगर चलते ही रहेंगे ।

और हम सब आज देख रहे है कि गुरु के सारी मोज़े पूरी हो रही है। किसी बात को कमी नहीं है , कमी है भी तो सिर्फ हमारी करनी में है।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

One thought on “गुरु की मौज

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started