परमात्मा कहा है?

गुरु नानक देव जी की वाणी है : 

हर मंदर सोई आखीऐ जिथहो हर जाता ॥ मानस देह गुर बचनी पाइआ सभ आतम राम पछाता ॥ बाहर मूल न खोजीऐ घर माहे बिधाता ॥ मनमुख हर मंदर की सार न जाणनी तिनी जनम गवाता ॥ (आदि ग्रंथ पेज न 953)

अर्थात् उस स्थान को ही हरि – मंदिर कहा जा सकता है जिसमें उस हरि यानी परमात्मा की प्राप्ति होती है । वह सर्वव्यापी परमात्मा , गुरु के वचनों पर अमल करके शब्द के जरिए, केवल मनुष्य देह में ही मिलता है। उसकी तलाश बाहर बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह प्रभु तो हमारे देहरूपी घर में ही वास करता है। मनमुख इस असली हर मंदिर के भेद को नहीं जानते और अपना जन्म बाहर भटकने में व्यर्थ गंवा देते है।

यही उपदेश अनादि काल से सभी संत महात्मा देते आ रहे है। ऋषि मुनियों ने मनुष्य शरीर को नर नारायणी देह कहा है, क्योंकि इसकी रचना करने वाला नारायण इसके अंदर बैठा हुआ है और आत्मा अंदर ही उस नारायण से मिलाप कर सकती है।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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