असल गुरु की पहचान

गुर पीर सदाए मंगण जाए ॥ ता कै मूल न लगीऐ पाए ॥ घाल खाए किछ हथहो दे ॥ नानक राह पछाणह से ॥

जो गुरु और पीर अपने शिष्यों – सेवकों से माँगते फिरते हैं , उनके पैरों पर माथा ही नहीं टेकना चाहिए । कैसे महात्मा को ढूँढ़ना है ? जो स्वयं मेहनत की कमाई करता हो और हमसे भी मेहनत की कमाई करवाए । जब तक हम मेहनत की कमाई नहीं करते , हमारे अभ्यास में बरकत ही नहीं हो सकती । आप देखते ही हैं कि कोई भी इनसान दूसरे को यों ही पैसे नहीं देता । जब हम किसी साधु को खिलाते हैं , कुछ देते हैं , तो मन में कई इच्छाएँ रखते हैं । अपनी गंदगी निकालकर उसके सिर डालने की कोशिश करते हैं । जिन इच्छाओं के साथ खिलाया है , उन्हें भरने – भुगतने के लिए उस साधु को देह के बंधनों में आना पड़ेगा और साथ ही खिलानेवाले को भी आना पड़ेगा । इसी लिए महात्मा हमें अपनी मेहनत की कमाई करने के लिए कहते हैं । दुनिया में अपना फ़र्ज़ समझकर रहना है । इस बात को स्वामी जी महाराज अगली तुक में स्पष्ट करेंगे कि किस तरह हमें दुनिया में रहते हुए भी दुनिया की मैल में नहीं लिबड़ना है । हमें महात्माओं के उपदेश पर चलने की कोशिश करनी है । जब तक हमारे मन में भरोसा और विश्वास नहीं आता , हमारा ख़याल कभी नाम की कमाई की ओर नहीं जा सकता । महात्मा को ढूँढ़कर हमें अपने आप को उनके हवाले कर देना है । मन की मत को छोड़कर गुरुमुखों की मत पर चलने की कोशिश करनी है । गुरुमुखों की मत क्या है ? अपने ख़याल को नौ द्वारों में से निकालकर आँखों के पीछे इकट्ठा करो और शब्द या नाम के साथ जोड़ो ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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