
ईद का दिन था , लोग ईद की नमाज अदा करके वापस आ रहे थे । राह में एक पूर्ण मुर्शीद का मुरीद खड़ा था , हर राहगीर से पूछ रहा था , सांई ईद कद है ? लोग हंसते और कहते ओ सांई तेरे को नहीं पता ईद तां अज है । उसी राह से ख्वाजा गुलाम फरीद गुजरे , आदमी ने उनसे भी वही सवाल किया । सांई ईद कद ? आपने फ़रमाया , यार मिले जद । आदमी रोने लगा और बोला हजूर , यार मिले कद ? आपने फ़रमाया ऐ होमैं (काम,क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) मरे जद , आदमी ने फिर रोते हुए पूछा , ऐ होमैं मरे कद ? आप मुस्कराए और आदमी के कंधों पर हाथ रखकर फ़रमाया , ओ यार चाहे जद
बात छोटी है पर गहरी बहुत है।
Very deep thought.
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