
संतों के गुण , कर्म और स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि बलिहारी जाएँ संतों पर , धन्य हैं संत क्योंकि जैसे कमल पानी में रहता है पर उसका फूल सदा पानी से ऊपर रहता है , उसी प्रकार संतजन संसार के बीच रहते हुए भी सबसे अलिप्त , निर्लेप रहते हैं ।
परमात्मा संत में समाया होता है और संत परमात्मा में दोनों की एकता के बारे में किसी प्रकार के भ्रम , शंका या दुविधा की कोई गुंजाइश नहीं ।
संतों के अंदर परमात्मा – रूपी अनमोल हीरा होता है परंतु बाहरी तौर पर वे भिखारी की तरह बने रहते हैं । वे आंतरिक अमीरी को बाहरी ग़रीबी के पर्दे से ढके रखते हैं ।
संतों का हृदय क्षमा , संयम , संतोष और दया से भरपूर होता है और वे समदर्शी होते हैं । वे अमीर – ग़रीब , छोटे – बड़े को ही नहीं , बल्कि भले – बुरे को भी समान दृष्टि से देखते हैं । वे दया की साक्षात मूरत होते हैं । वे सदा मीठे , प्यारे , रसभरे वचन कहते हैं और अनेक पापियों का उद्धार कर देते हैं ।
संतों के हृदय में सत्य का निवास होता है और उनकी कथनी और करनी का आधार भी सत्य होता है । वे सत्य की टकसाल में गढ़े हुए खरे सिक्के होते हैं और अपनी शरण में आए जीव को सत्य ( शब्द ) की टकसाल में गढ़कर पूर्ण रूप में खरा सिक्का बना देते हैं । वे सतलोक के निवासी होते हैं , उनके अंदर परमेश्वर का सच्चा नाम समाया होता है । वे सत्य का रूप होते हैं और सदैव सत्य को धारण किए रहते हैं
जो भाग्यशाली जीव छल , कपट और अवगुणों को त्यागकर तन – मन से ऐसे संतों के चरणों का दास बन जाते हैं , उन्हें वे माया का पानी पीनेवाले कौए से नाम का अमृत पीनेवाला हंस बना देते हैं अर्थात् वे उसकी कागवृत्ति या मनमति को दूर करके नाम का अमृत पीनेवाली निर्मल आत्मा बना लेते हैं ।
मदन साहिब कहते हैं कि संतों की बड़ाई बयान कर पाना असंभव है । मेरी या किसी अन्य की बात तो दूर रही , शेषनाग अपनी हज़ार जिह्वाओं द्वारा भी संतों की असल बड़ाई बयान नहीं कर सकता । मैं मन , वचन और कर्म द्वारा बार – बार संतों पर बलिहारी जाता हूँ ।
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