
चौपाई
सोई गुरू पूरा कहलावै । दुइ अक्षर का भेद लखावै ॥1 ॥ एक छुड़ावै एक मिलावै । तब निःशंक निज घर पहुँचावै ॥2 ॥ सो गुरू बंदीछोर कहावै । बंदी छोरि के जिव मुक्तावै ॥3 ॥
पूर्ण गुरु की क्या निशानी है ? पूर्ण गुरु वह है , जो लिखने , पढ़ने , बोलने में आनेवाले अक्षरों के साथ बने शब्दों और वाणी से परे के अरंग , अरूप , अनादि , अविनाशी शब्द का भेद समझा दे । इसका दूसरा गूढ़ अर्थ यह है कि तीसरे रूहानी मंडल पारब्रह्म के दो भाग हैं । निचले भाग के शब्द की गति नीचे की ओर है तथा यह ब्रह्म या ओंकार शब्द के द्वारा निचले मंडलों का सृजन करता है । ऊपरी भाग के शब्द की गति ऊपर की ओर है । वह शब्द साधक को ऊपर सोहं और सतलोक की ओर ले जाता है । मदन साहिब कहते हैं कि पूर्ण गुरु वह है , जो अपने शिष्य को मानवकृत अनेक शब्दों की मोहताजी से मुक्त करके , उसकी सुरत को अंतर में उस अनादि , अविनाशी , माया रहित , निर्मल शब्द में अभेद कर देता है , जो उसे सहज ही उसके निजघर वापस पहुँचा देता है । इस तरह पूर्ण गुरु जीव को काल की क़ैद से छुड़ाकर , मायामय जगत और जन्म – मरण के बंधन से मुक्त कर देता है । ऐसा गुरु ही सही अर्थों में मुक्तिदाता गुरु कहला सकता है ।
नोट: यह मदन साहिब रचित ग्रंथ में से लिया गया है।