सच्चा नाम क्या है ?

नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय ||1||

परमात्मा का नाम तो सब जपते है पर किसी को भी नाम (परमात्नमा) हीं मिला है ?  

अब हमें यह इस बात पर विचार करना है कि कोनसा नाम हम जपते है ? और उसको जपने से हमें कोनसा नाम नही मिला ? 

हम सब किसी न किसी आस्था या विचारो के साथ जन्म से बंधे पड़े है | इसीलिए जैसा माहोल,हमें मिलता है हम वैसे बन जाते है | भक्ति भी हम ऐसे ही सीखते है ,जो हम परिवार में  या अपने धर्म या मजहब के लोगो में देखते है, वैसा ही हम सिख जाते है | जब तक हमारी बुद्दि का दायरा नहीं खुलता है, जब तक स्वतंत्र रूप से अपने बारे में नहीं सोचते है | हम वैसे ही करते है जैसा हमारे उपर प्रभाव होता है | हम क्या करते है ? हम कोनसा नाम जपते है ?  

हम सब अपने मजहबो के हिसाब से हमने अपने अपने परमात्मा के अलग अलग नाम रखे है और उसको जपते है समझाते है कि हमें इसको जपने से परमात्मा मिल जायेगा | जैसे हिन्दू भाई ओम नाम को जपते है और राम नाम के महिमा अनेक प्रकार से गाते है | मुसलमान भाई अल्लाह के नाम को जपते है | सिख में वाहेगुरु नाम प्रचलित है | और इसाइओ में god god नाप को जपने से मुक्ति समझते है | ऐसे ही कई अनगिनत नाम हमने परमात्मा के हमने प्यार में आकर रखे है | जैसे जप जी में परमात्मा के पाचवी पातशाही ने 1400 के करीब नाम रखे है |

बड़े हुजुर महाराज जी  “नाम की महिमा करने के लिए संतो को लफ्ज नहीं मिलते , क्योकि उसका नमूना दुनिया में है ही नहीं| हम अलाह, परमेश्वर आदि लफ्जो को नाम समझते है | परन्तु लफ्ज नाम नहीं | दुनिया लफ्जो में ही उलझकर रह गई |लफ्ज सिर्फ आत्मा को नाम के साथ जोड़ने के लिए है समझाने बुझाने के लिए है लफ्ज नाम नहीं |” अमृत वचन पेज २७ 

जैसे जैसे संतो महात्माओ ने परमात्मा के गुण अपने अंतर में महसूस किये उन्होंने भी प्यार में आकर गुणों  के आधार पर परमात्मा के कई नाम रखे है जैसे राम ( रमी हुई ताकत है ) रहीम ( हम सब पर समान रूप से रहम करता है ) दयालु ( दया उसका स्वभाव है ) कृपालु ( कृपा करता है ) | जैसे माँ अपने बच्चे के प्यार में आकर कई नामो से पुकारती है |वैसे ही हमने भी परमात्मा के कई नाम रखे है जो हर भाषा , हर देश , जाति में अलग अलग हो सकते है पर हम इन नामो से उस एक ही महिमा करते है | 

कबीर सा : किरतम नाम कथे तेरे जिहबा |

जिन्हें हम किसी भी भाषा में लिख पढ़ या बोल सकते है | इन सब नामो का इतिहास भी है | जैसे 500 वर्ष पहले परमात्मा को वाहेगुरु के नाम से कोई नहीं जानता था, 1400 वर्ष पहले अल्लाह नाम को कोई नहीं जानता था | 2000 वर्ष पहले god god को कोई नहीं जानता था | त्रेता युग से पहले भी राम नाम था | कहने का भाव है कि नाम सिर्फ एक लफ्ज है जो किसी नामी की हस्ती को बयान करते है | सिर्फ इन लफ्जी या वर्णात्मक नामो को जपने से हमें नाम भाव परमात्मा नहीं मिलता है |    

संत महात्मा हमें समझाते है कि जैसे रोटी  एक लफ्ज है रोटी खाना  अलग है | सिर्फ रोटी, रोटी कहने से भूख नहीं जाती,… रोटी खाने से.. भूख बुझ जाती है | वैसे ही नाम नाम कहने से या जपने से परमात्मा नहीं मिल जाता है | 

यारी सा. “रसना राम कहत ते थाको| पानी कहें, कहू प्यास बुझत है, प्यास बुझात जद चाखो|”

कि जिबान से हम चाहे करोडो बार परमात्मा का कोई भी नाम ले ले | कितने ही दिन क्यों न जप ले , चाहे सालो जप ले |इसीसे सिर्फ हमारे अन्दर अहंकार बढता है | जैसे बड़े हुजुर फरमाते थे कि मैंने ग्रन्थ सा. सो सो बार पाठ करने वाले भइयो से पूछा कि कुछ हुवा, कोई अन्दर रोशनी आई | तो वो शर्म से मुह हिला देते थे | कि कुछ नहीं मिला | जैसे पानी एक लफ्ज है पानी पीना अलग है | सिर्फ पानी पानी कहने से सिर्फ जबान ही थकती है ,प्यास नहीं बुझती,… पानी पीने से प्यास बुझ जाती है | 

कबीर सा. बिन देखे बिन दरस परस बिन, नाम लिए का होई |धन के कहें धनी जो होई, निर्धन रहे न कोई ||

ऐसे ही यह कबीर सा के भी वचन है आप भी हमें यहाँ उदाहरन के जरिये समझा ते है कि सिर्फ धन धन करने से कोई भी आदमी धनी नहीं हो जाता है उसके लिए उसे मेहनत करनी पड़ती है | सालो साल मेहनत की गई मेहनत के बाद वह धनवान बनता है | ऐसे ही अगर हम बिन किसी को देखे जाने किसी भी लफ्जी नामो से उस परमात्मा से नहीं मिल सकते है | जब तक मालिक से जुड़ा न जाये, तब तक खाली नाम लेने का क्या लाभ | ऐसे ही केवल धन धन जपने से हम धनी बनते तो संसार में कोई निर्धन ही नहीं होता |   

बड़े हुजुर का उदाहरण कि उन्होंने में २२ साल तक खोज की …गुरु ग्रन्थ , जप जी पढ़ते थे 

बाबा जी महाराज का उदारण कि उन्होंने भी सालो साल खोज की ..

गुरु अमरदास जी का उदाहरण उन्होंने भी 72 वर्ष तक बाहर के नामो का जप किया पर परमात्मा से मिलाप नहीं हुवा | 

सा. बुल्लेशाह ने भी ४० साल तक किताबो की खोज की |….

स्वामी जी : वर्ण जप जप पचे भेखी | मिले कुछ फल, नहीं नेकी |

कि इन लफ्जो को, इन वर्णात्मक नामो को जप जप कर थक गए सारे | पर उसका कोई भी फल नहीं मिला उनको | 

अब इन वर्णात्मक नामो को जपने से किसी को नाम नहीं मिला तो असल नाम है क्या वो हमें कैसे मिलेगा ये आप अगली कड़ी में खोलकर समझा रहे है |  

क्यों कि उनको न ही सच्चे नाम का ज्ञान है, ना ही इसको पाने का तरीका| तो तरीका क्या है ? जिसके करने से कुछ फल मिले |

म-३ राम राम सभ को कहे, कहिये राम न होय | गुर परसादी राम मन वसे, ता फल पावे कोए |

आप भी यही कह रहे है कि सिर्फ अपनी मर्जी से राम राम जपने से, वो राम जो ताकत है जो हर जगह रमा हुवा है |वह नहीं मिलते | जब तक हम किसी वक़्त के पूर्ण गुरु के पास नहीं जाते | जब हम गुरु के शरण में जाते है तो हमें बताते है कि नाम हमारे अन्दर पहले से मोजूद है पर गुप्त है ,उस नाम का भेद हमें देते है | उसको पाने का  तरीका  सिमरन, ध्यान और भजन  की विधि हमें समझाते है | साथ ही हमें परमार्थ पर चलने की चार शर्तो का वादा, भी हमसे लेते है | (जिसमे शाकाहारी भोजन, नशे से दूर रहना, निर्मल सदाचार जीवन जीना, और नाम की कमाई काम से कम ढाई घंटे करना )  जैसे किसी घर में पहले से धन गडा हो पर हमें उसका पता नही हो | तो हम उसे कभी बाहर ढूंढते है तो कभी और कही | पर अगर कोई भेदी आकर हमें ये बताए की , वो धन हमारे अपने घर में ही है | और इस जगह है तो हम उस धन को आसानी से निकाल सकते है और धनवान बन सकते है|  ऐसे ही गुरु हमें नाम का भेद देते है कि नाम हमारे अपने अन्दर है | और उसे गुरु के कहें अनुसार जब हम कमाई करते है तो हम सच्चे नाम का पाने के काबिल बनते है | 

for more post click here

contact us : bloggerpradeep.com

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started