“निमाणा-निताणा”

एक बार एक सत्संगी दरबार साहिब आ रहा था।लंगर के लिये कुछ रसद भी साथ उठा कर आ रहा था। यह गुरु अर्जुन देव जी के समय की बात है। गर्मी के दिन थे।अमृतसर शहर से थोड़ा पहले वह एक बृक्ष की छावं में आराम करने बैठा।

गुरु के दर्शन के लिए वह पहली बार आ रहा था, सो गुरु साहब को पहचानता नही था। बोझ उठा कर दूर से चल कर आ रहा था, थक गया था, बृक्ष के नीचे बैठ कर वह अपने पैर दबाने लगा। गुरु अर्जन देवजी का भी उधर से गुजरना हुआ। उसी बृक्ष के नीचे वो भी बिश्राम के लिये रुके।

उस व्यक्ति को पैर दबाते देख कर गुरु साहब पूछते है कि साईं क्या बात है, पैर क्यूँ दबा रहे हैं? वह व्यक्ति बोला कि दूर से चल कर आ रहा हूँ, लंगर के लिए कुछ रसद भी चक के लाया हूँ, थक गया हूँ, इस लिए पैर दबा रहा हूँ। गुरु अर्जुन देवजी ने देखा कि उस गर्मी में भी वह इतना बोझ चक के आ रहा है, सच में थक गया होगा, तो गुरु साहब ने कहा, साईं लाओ मैँ आपके पैर दबा देता हूं। और गुरु अर्जुन देव जी उस व्यक्ति के पैर दबाने लगे। फिर जब बिश्राम के बाद चलने लगे तो गुरुजी उनसे कहते हैं कि लाइए में आप का रसद का बोझ उठा चलता हूं, मैं भी दरबार साहब जा रहा हूँ। वो व्यक्ति सोचने लगा कि शायद यह कोई मज़दूर होगा, इसके साथ मजदूरी की बात पहले ही तय की जानी चाहिये। पर गुरु साहब कहने लगे की कोई बात नही जितनी चाहे दे देना।दरबार साहिब पहुंच कर गुरु साहब उसका बोझ उसको थमा कर चल पड़े। वह व्यक्ति पुकारता रहा कि मजदूरी ले लो मजदूरी ले लो। शाम जब सत्संग के समय उस व्यक्ति को दर्शन का मौका मिला तो गुरूसाहब को वह पहचान गया, और रो रो कर गुरूसाहब के चरणों मे गिर पड़ा, कहने लगा मालिक गुनाह बक्श दो, गुनाह बक्श दो। गुरु साहब मुस्करा कर कहने लगे, साईं आप दरबार साहिब गुरु के दर्शन के लिए आ रहे थे, मैंने तो आप की सहायता करके पुण्य कमाया है, मैं तो खुद आपका शुक्रगुज़ार हूँ, जो आप ने मुझे पुण्य कमाने का अवसर दिया।
इस लिये गुरबाणी में आता है-
“माण होंदया होइ निमाणा, ताण होंदया होइ निताणा।”
अर्थात, अगर आपका समाज मे कुछ आदर मान है तो निवां रहे, और अगर आप के पास शक्ति है तो निशक्त बना रहे।

कुछ दिन बाद वापिस ले ली जायेॅगी

क्यूंकि मान और शक्ति दोनो ‘उसकी’ दी हुई हैॅ मौत के वक्त ले ली जाएगी

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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