सबसे बड़ा कौन ?

गुरु और मालिक में कोई अंतर नहीं , दोनों वास्तव में एक ही हैं । महाराज सावन सिंह

एक पादरी हमेशा बड़े महाराज जी के साथ बहस करता रहता था । एक बार जब आप ब्यास स्टेशन पर उतरे , तो वह बोला कि एक सवाल का जवाब दो । आपने कहा , ‘ बड़ी ख़ुशी से जो पूछना है , पूछो । ‘ उसने कहा मुझे बताओ कि गुरु नानक साहिब बड़े हैं या कबीर साहिब बड़े हैं या बाबा जैमल सिंह जी ? बड़े महाराज जी ने कहा , ‘ भाई ! सभी को मेरे सामने खड़ा कर दो , मैं बता दूँगा कि कौन बड़ा है । ‘ वह कहने लगा , ‘ यह तो मैं नहीं कर सकता । ‘ तब आपने कहा , ‘ भाई ! मैंने तो बाबा जैमल सिंह जी को देखा है , मैं तो उनके बारे में ही कुछ कह सकता हूँ , लेकिन जिनके मैंने कभी दर्शन नहीं किये , उनकी आपस में तुलना करना मेरे लिए नामुनासिब है । ‘

सभी संत – सतगुरु एक ही धाम से आते हैं , उनकी तुलना का सवाल ही पैदा नहीं होता ।

बकरा और बंदर

मन लज़्ज़त का आशिक़ है , जब इसे पहले से कोई अच्छी चीज़ मिल जाये तो यह पहली को छोड़ देगा , दूसरी के पीछे दौड़ेगा । इसे दुनिया की करोड़ों लज़्ज़तें दें , मन वश में नहीं आता । महाराज सावन सिंह

एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर बड़े महाराज जी से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी । अपनी दीनता को दर्शाते हुए उसने अपने गले में जूतों की माला डाल रखी थी । बड़े महाराज जी ने उससे पूछा कि शरीर को सज़ा देने का क्या फ़ायदा अगर असली मुजरिम मन , आज़ाद घूमता फिरे ? अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए आपने यह कहानी सुनायी :

एक स्त्री ने एक बकरा और एक बंदर पाल रखा था और उन दोनों को उसने घर के पास बाँधा हुआ था । एक दिन उसने बड़े प्रेम के साथ खाना बनाया और दही लेने के लिए बाज़ार चली गयी । बंदर ने अपने हाथों से अपनी रस्सी खोलकर , रोटियाँ खाकर बकरे की रस्सी खोल दी और अपने गले में उसी तरह अपनी रस्सी डाल ली । जब वह स्त्री वापस आयी तो देखा कि खाना नहीं है और बकरा खुला फिर रहा है । लगी बकरे को मारने । कोई सज्जन यह सब देख रहा था । उसने कहा कि यह बकरा बेक़सूर है , सारा क़सूर उस बंदर का है ।

सो अपनी कामना पूरी करने के लिए यह मनरूपी बंदर सब कुछ कर लेता है । असली क़सूर तो मन का होता है लेकिन सज़ा बेचारे शरीर को भुगतनी पड़ती है ।

रूस का बादशाह पीटर

गुरु स्थूल शरीर में ही सीमित नहीं होता । लोगों की रहनुमाई करने , उन्हें समझाने , उनसे हमदर्दी दिखाने , उनसे प्रेम करने , उनमें विश्वास और भरोसा पैदा करने , उनमें अपने अंदर शांति और आनंद की तलाश का शौक़ पैदा करने , उन्हें रास्ता दिखाने , उन्हें एक मिसाल बनकर समझाने , उनमें दैवी गुण पैदा करने और उन्हें इस स्थूल शरीर से निकालकर सूक्ष्म शरीर में ले जाने के लिए गुरु इनसानी चोला धारण करता है । महाराज सावन सिंह

रूस का बादशाह पीटर अपने देश की उन्नति के लिए बहुत उत्सुक था । इसी कारण वह बहुत समय तक यूरोप के देशों में रहा ताकि वह उन देशों की उन्नति के अनुरूप रूस को भी आगे की ओर ले जा सके । इसी समय के दौरान वह एक मज़दूर का भेष बनाकर हॉलैंड देश में गया और वहाँ बहुत समय तक जहाज़ों का काम सीखता रहा । पूरा कारीगर बन गया । वहाँ उसको वे रूसी भी मिले जिनको उसने विद्रोह के अपराध में देश – निकाला दिया हुआ था । वहाँ रहकर उनका चाल – चलन ठीक हो चुका था । अब बादशाह ने तो उन्हें पहचान लिया , लेकिन वे बादशाह को मज़दूर के भेष में न पहचान सके । बादशाह ने उनसे पूछा कि आप कौन हैं और कहाँ से आये हैं ? उन्होंने उत्तर दिया कि हम रूसी हैं और रूस से निकाले गये हैं ।

बादशाह ने कहा , ‘ मैं भी रूस से आया हूँ । ‘ इतना कहना था कि उनका आपस में बहुत प्यार हो गया । जब बादशाह वापस आने लगा तो उनसे बोला कि चलो , आप भी मेरे साथ चलो ; मेरी बादशाह के साथ दोस्ती है । मैं आपकी सिफ़ारिश कर दूंगा , वह आपको कुछ नहीं कहेगा । उन्होंने मान लिया । जब रूस के बंदरगाह पर पहुँचे तो आगे बड़े – बड़े अफ़सर बादशाह के स्वागत के लिए खड़े थे । खूब बाजे बजने लगे , आतिशबाज़ियाँ चलने लगीं कि उनका बादशाह आ गया है । जब उन्होंने देखा कि यह तो वही है जो हमारे साथ मज़दूरी करता था तो हैरान रह गये !

ठीक इसी तरह संत हमारे बीच आकर रहते हैं और हमारे जैसा ही जीवन बिताते हैं , लेकिन जब हमारी आँखें खुलती हैं , तब पता चलता है कि वह कौन हैं और किस हस्ती के मालिक हैं ।

सिकंदर महान की अंतिम इच्छा

मेरे आगे मैं खड़ा , ता भै रह्या लुकाइ । दादू परगट पीव है , जे यहु आपा जाइ ॥ संत दादू दयाल

सिकंदरे – आज़म , जिसको विश्व विजयी कहते हैं , जब सारी दुनिया को जीतता हुआ भारत के उत्तर – पश्चिम में ब्यास नदी के पास आया , तो फ़ौज ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया । मजबूर होकर वह वापस लौट पड़ा । उसने ज्योतिषियों से पूछा कि मेरी मौत कब होगी ? ज्योतिषी समझदार थे । उन्होंने हिसाब लगाकर देखा कि उम्र बहुत थोड़ी है ; क़रीब – क़रीब ख़त्म हो चुकी है । अब झूठ कहना नहीं और सच कहने से अपनी जान का डर था । सोच – विचारकर कहा कि आपकी मौत तब होगी जब आसमान सोने का और ज़मीन लोहे की होगी । सिकंदर ख़ुश हो गया और कहने लगा , ‘ फिर क्या फ़िक्र है , मुझे तो कभी मरना ही नहीं । जब आसमान सोने का और ज़मीन लोहे की होगी , तब मैं मरूंगा । ‘

जब वह पश्चिमी फ़ारस जाते हुए सीस्तान के रेगिस्तान में से गुज़र रहा था तो उसे मलेरिया हो गया । पीछे – पीछे फ़ौज थी , आगे – आगे आप खुद और वज़ीर । ज्यों – ज्यों आगे बढ़ता गया , बुख़ार तेज़ होता गया । फ़ौज पीछे रह गयी । आख़िर वज़ीर से कहने लगा , वज़ीर ! मुझे तो बुख़ार हो गया है । वज़ीर ने कहा कि बादशाह सलामत ! दो – चार मील आगे चलो , कोई पेड़ आ जाये जहाँ आराम किया जाये । जब आगे गये तो बुख़ार बहुत तेज़ हो गया । वज़ीर से कहने लगा , अब बुख़ार बहुत तेज़ हो गया है । वज़ीर ने इधर – उधर देखा , कहीं छाया का नामो निशान नहीं था । कहने लगा कि दो – चार मील और चलो , शायद कोई पेड़ आ जाये ।

जब दो – चार मील और चले तो बुख़ार इतने ज़ोर का हो गया कि बादशाह बरदाश्त न कर सका और घोड़े से उतर पड़ा । बोला कि यह लो ,पकड़ो घोड़े को , मैं आगे एक क़दम भी नहीं चल सकता । अब वज़ीर के पास क्या था जो नीचे बिछाता ? वज़ीर ने अपना ज़िरहबख्तर ( कवच ) उतारकर बिछा दिया और बादशाह उसके ऊपर लेट गया । ज़िरहबख्तर लोहे का एक कोट होता है जिसको बादशाह या वज़ीर आदि लड़ाई के वक़्त पहनते हैं । अंदर रेशम की तहें होती हैं ताकि लोहा जिस्म को न चुभे और गोली या हथियार की चोट का असर भी न हो । दोपहर का वक़्त था । गर्मी ज़ोरों की थी । पेड़ों का कहीं नाम नहीं था , वज़ीर क्या करता ? छाया के लिए उसने बादशाह की सोने की ढाल ऊपर कर दी । अब जब मौत आती है तो आदमी को पता चल जाता है । सोचने लगा ज्योतिषियों का कहना सच हो गया । इस समय ज़मीन लोहे की और आसमान सोने का है , अब मेरी मौत होगी ।

इतने में सारी फ़ौज और हकीम वहाँ पहुँच गये । बादशाह ने कहा , ‘ मेरी नब्ज़ देखो । ‘ नब्ज़ देखकर उन्होंने कहा कि जनाब ! अब आप बच नहीं सकते । उसने कहा , ‘ मैं अपना आधा राज्य देता हूँ , मुझे एक बार मेरी माँ से मिला दो । ‘ हकीमों ने कहा , ‘ यह मुमकिन नहीं क्योंकि हमारे पास अब कोई इलाज नहीं है । ‘ बादशाह ने फिर कहा कि मैं अपना सारा राज्य देता हूँ , मुझे एक बार माँ से मिला दो ; मैं माँगकर रोटी खा लूँगा । उन्होंने कहा कि आपकी उम्र की अवधि पूरी हो गयी है , अब एक स्वाँस भी नहीं मिल सकता । इस पर वह महान सिकंदर बच्चे की फूट – फूटकर रोया ।

एक दिन में लगभग चौबीस हज़ार साँस होते हैं । एक – एक साँस करोड़ – करोड़ रुपये का है , जिसको हम हँसने – खेलने और निकम्मी बातों में गँवा देते हैं । मनुष्य – जन्म का फायदा उठाना चाहिए और मालिक से मिलने का उपाय करना चाहिए ।

मनसूर और फूल की चोट

कहा भइओ जर तन भइओ छिन छिन । प्रेम जाए तउ डरपे तेरो जन ‘ गुरु रविदास

अनलहक ‘ जिसका अर्थ है कि मैं खुदा हूँ , कहने पर हजरत मनसूर को बादाद में सूली पर चढ़ाने की सज़ा सुनायी गयीं । उस पर जोर डाला गया कि वह ‘ अल्लाह हू हक ‘ कहे , पर मनसूर ने यह कहने से इनकार कर दिया । जब मनसूर को सूली पर चढ़ाने लगे तो हुक्म हुआ कि पहले इसको पत्थर मारे जायें । उसे बग़दाद शहर के चौक में ले जाया गया और लोगों को उसे पत्थर मारने का हुक्म दिया गया । जब लोगों ने पत्थर मारे , वह चुपचाप खड़ा रहा , उफ़ तक न की । शेख शिबली मनसूर का दोस्त भी था और उसके राज़ और उसकी शक्ति से भी वाकिफ़ था । उसने सोचा कि अगर मैंने पत्थर मारा तो उचित नहीं , क्योंकि यह फ़कीर है और अगर शरहवालों अर्थात मुसलमानों के कर्मकांड में विश्वास रखनेवालों का खयाल करूं तो मारना ही पड़ेगा ।

आखिर उसने फूल मारा । जब मनसूर को फूल लगा तो वह कराह उठा , ‘ हाय ! ‘ शिबली ने पूछा कि तूने हाय क्यों की ? मनसूर ने उत्तर दिया कि तू मेरे राज़ को जानता था , लोग नहीं जानते थे , इसलिए मुझे तेरे फूल की चोट लोगों के पत्थरों की चोट से भी ज्यादा लगी ।

जब उसे सूली पर चढ़ाने लगे तो पहले उसके हाथ काट दिये गये । उसने कहा मुझे इन हाथों का कोई फ़िक्र नहीं । मेरे पास वे हाथ हैं कि एक यहाँ और एक किंगराए अर्श * पर है । फिर पैर काट दिये गये । वह बोला कि मेरे पास वे पैर हैं कि एक यहाँ और एक परमात्मा की दरगाह में है ।

आग का मोल

अखी काढ धरी चरणा तल सभ धरती फिर मत पाई ॥ गुरु रामदास

कहा जाता है कि शेख़ फ़रीद का एक शिष्य बहुत नेक – पाक था । जब वह बाज़ार जाता तो एक वेश्या उसका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए उससे मज़ाक किया करती । वह बेचारा दूसरी ओर ध्यान कर लेता । ज्यों – ज्यों वह दूसरी तरफ़ ध्यान करता , वह और मज़ाक़ करती । ज्यों – ज्यों ध्यान हटाता , वेश्या और छेड़ती ।

एक दिन फ़रीद साहिब ने उस शिष्य से कहा कि आग चाहिए । उस ज़माने में लोग अंगारों को राख में दबाकर रखते थे और जब आग की ज़रूरत पड़ती तो अंगारों को निकालकर इस्तेमाल कर लेते । उसने गली और मुहल्ले में पूछा , बहुत घूमा लेकिन आग न मिली । बाज़ार में गया , देखा कि वही वेश्या हुक़्क़ा पी रही है । अब सोचता है कि इसकी मुझसे पहले ही दुश्मनी है । पर पीर का हुक्म है । ऊपर मकान पर चढ़ गया । वेश्या ने उसे देखकर पूछा कि क्या बात है ? वह बोला , ‘ माई जी ! आग चाहिए । ‘ वह मज़ाक़ के साथ कहने लगी कि आग की क़ीमत आँख है । आँख निकालकर दे जाओ और आग ले जाओ । उसने फ़ौरन अँगुली डालकर आँख निकालकर आगे रख दी । वेश्या डर गयी और आग दे दी । मन में सोचने लगी , मैंने तो मज़ाक़ में कहा था । खैर वह पट्टी बाँधकर फ़रीद साहिब के पास आ गया ।

उन्होंने पूछा , ‘ आग ले आये हो ? ‘ जवाब दिया , ‘ हाँ हुजूर , ले आया हूँ । ‘ फ़रीद साहिब ने कहा कि यह आँख पर पट्टी क्यों बाँधी है ? बोला , ‘ आँख ‘ आयी ‘ हुई है और दुखती है । ‘ उन्होंने कहा , ‘ अगर आयी हुई है तो पट्टी खोल दे । ‘ जब पट्टी खोली तो आँख पहले की तरह सही सलामत थी ।

मालिक हमेशा अपने भक्तों की लाज रखता है ।

हमारे प्यार का खोखलापन

परमेश्वर मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है ; मैं किससे डरूँ ? परमेश्वर मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ है , मैं किसका भय खाऊँ ? साम्ज़

एक बुढ़िया थी । उसकी एक जवान लड़की थी । इत्तफ़ाक़ से वह लड़की सख़्त बीमार हो गयी । बहुत इलाज करवाया लेकिन फ़ायदा न हुआ । बुढ़िया कहने लगी कि हे परमात्मा ! इसकी जगह मैं मर जाऊँ , यह बच जाये । मैं तो बूढ़ी हूँ । दुनिया में बहुत कुछ देख चुकी हूँ , यह जवान है ; यह न मरे । बार – बार यही कहती ।

एक दिन बाहर का दरवाज़ा खुला रह गया । कहीं से एक आवारा गाय छूटकर अंदर आ घुसी । रास्ते में एक देग पड़ी हुई थी । गाय ने खाने के लिए ज्यों ही देग में मुँह डाला , उसके सींग उसमें फँस गये । लगी घबराकर इधर – उधर दौड़ने । अब देग के नीचे का काला हिस्सा सामने था । जब गाय ने दो | चार चक्कर लगाये तो बुढ़िया डर गयी और समझी कि मौत का फ़रिश्ता आ गया है । कहने लगी , ‘ मैं तो बूढ़ी हूँ , लड़की वह सामने पड़ी है , उसको ले जा । ‘

सो मनुष्य बातें कुछ करता है और दिल में कुछ और होता है । लेकिन सच्चा सत्संगी नित्य मरता है और उसे अपनी मौत की इतनी ख़ुशी होती है जितनी किसी को अपनी शादी की भी नहीं होती ।

व्यर्थ गयी कमाई

जनम जनम की इस मन कउ मल लागी काला होआ सिआह ॥ खंनली धोती उजली न होवई जे सउ धोवण पाह ॥ गुरु अमरदास

पराशर जी सारी उम्र योगाभ्यास में रहे । पूर्ण योगी होकर घर को वापस आ रहे थे । रास्ते में एक नदी पड़ती थी । जब वहाँ आये तो मल्लाह से कहा कि मुझे पार उतार दो । मल्लाह ने कहा कि हम रोटी खा लें , रोटी खाकर तुम्हें पार उतार देंगे । पराशर जी कहने लगे , धूप चढ़ जायेगी , मुझे जल्दी पार पहुँचा दो , नहीं तो मैं श्राप दे दूंगा । अब जो काम माँ – बाप करते हैं , बच्चे भी बड़ी आसानी से कर लेते हैं । मल्लाह की लड़की ने बाँस लिया , नाव की रस्सी खोली और कहा , पिता जी , मैं इन्हें पार उतारकर आती हूँ ।

अब ऋषि सारी उम्र जंगलों में रहा , औरत की शक्ल नहीं देखी थी । देखकर मन चलायमान हो गया । अपना बुरा विचार प्रकट किया । लड़की ने कहा कि हम लोग मछुए हैं , मेरे मुँह से आपको बदबू आयेगी । ऋषि ने कहा कि योजन गंधारी हो जा । उसके मुँह से चार – पाँच मील तक ख़ुशबू आने लगी । लड़की बोली , सूर्य देवता देख रहे हैं कि हम पाप करने लगे हैं , ये हमारी गवाही देंगे । ऋषि ने पानी की चुल्ली भरकर मारी और चारों ओर धुंध कर दी । लड़की फिर कहने लगी कि यह जल वरुण देवता हैं , यह देख रहे हैं । ऋषि ने रेत की मुट्ठी लेकर दरिया में फेंक दी और कहा , रेत बन जा । पानी की जगह रेत हो गयी ।

देखो ! मन कितना ख़तरनाक है । पूर्ण गुरु की शरण न लेने के कारण महात्मा अपने मन को नहीं रोक सके बल्कि योग द्वारा प्राप्त अपनी सारी कमाई नष्ट कर दी ।

कबीर साहिब और रानी इन्दुमती

संत जब तक शरीर में रहते हैं , यह नहीं कहते कि हम गुरु हैं । वे दीनता और नम्रता रखते हैं । महाराज सावन सिंह

रानी इन्दुमती , संत कबीर जो काशी में कपड़ा बुनकर अपनी जीविका कमाते थे , की अनन्य भक्त थी । जब कबीर साहिब रानी इन्दुमती को सचखंड ले गये तो उसने देखा कि वहाँ भी वही कबीर साहिब कुलमालिक हैं । कहने लगी , अगर आप मुझे मृत्युलोक में ही बता देते तो इतनी मेहनत करने की क्या ज़रूरत थी ? कबीर साहिब ने कहा , ‘ क्या तू वहाँ मुझे मानती ? कह देती कि एक मनुष्य है जो कहता है कि मैं सतपुरुष हूँ । ‘

अगर संत कह दें कि हम ऐसे हैं तो कोई माने ही नहीं । संत जो ताक़त लेकर आते हैं , उसको ज़ाहिर नहीं करते बल्कि चुप रहते हैं । सो मतलब यह है कि लोगों को संतों की ख़बर नहीं होती कि वे क्या हैं , किस देश से आते हैं ? अगर ख़बर होती तो क्या गुरु नानक देव जी से चक्की पिसवाते , दूसरे संतों से भी ऐसा व्यवहार करते ?

Spiritual link (Nov Dec 2020) by RSSB

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