परमेश्वर तक पहुंचना कोई हंसी मजाक की बात नहीं।वह तो मानो किसी मजबूत किले में बैठा हुआ है और वह क़िला है मोटी पथरीली दीवारों और वज्र के मजबूत कपाटोवला। न दीवारे ढह सकती है, न कपाट ही टूटते है।इसलिए उसके अंदर जाने के लिए कोई उपाय नहीं बनता। हां, अगर एक सीढ़ी मिल जाए, […]
त उन मुरली की टेरहि सुनि सुनि , रहीं गोपिका मोहि ॥ जहँ अधर डाली हंसा बैठा , चूगत मुक्ता हीर ।
आनँद चकवा केल ‘ करत है , मानसरोवर तीर ॥
सब्द धुन मिदंग बाजै , बारह मास बसंत ।
अनहद ध्यान अखंड आतुर , धरत सबही संत ॥
कान्ह गोपी नृत्य करते , चरन बपु बिना ।
नैन बिन दरियाव देखै , अनंद रूप घना ॥
इस पद में दारेया साहिब ने अपने आंतरिक अनुभव के आधार पर अलौकिक मंडलों की ओर थोड़ा – सा संकेत किया है । आप कहते हैं कि गगन मंडल के बीचो – बीच शब्द की मुरलो जैसी सुरीली धुन उठ रही है । इसी शब्द से त्रिलोको की रचना हुई है । आत्मारूपो चकवे दशम द्वार में मानसरोवर के किनारे कलोल कर रहे हैं । यहाँ मृदंग जैसी शब्द को ध्वनि गूंज रही है और यहाँ सदा बसंत ऋतु रहती है । सभी संत वहाँ शब्द धुन के अखंड ध्यान में मग्न हैं । वहाँ आत्मारूपी गोपियाँ शब्दरूपी कृष्ण के साथ नृत्य कर रही हैं । दरिया साहिब कहते हैं कि उस परम आनंद का यह नज़ारा इन बाहरी आँखों के बिना ही दिखाई देता है ।
यह बानी (दरिया साहिब की बानी और जीवन चरित्र, पृष्ठ 45-46) में से है
कबीर साहिब हमारी पूरी अवस्था अपनी बानी के जरिए बयान कर रहे है जब लग तेल दीवे मुख बाती तब सुझे सभ कोई।। तेल जले बाती ठहरानी सुन्ना मंदर होई।। रे बावरे तुह घरी न राखै कोई।। तू राम नाम जप सोई।। का की मात पिता कहूं का को कवन पुरख की जोई।। घट फूटे […]
आगरा के महान संत स्वामी जी महाराज अपनी बानी में फरमाते है: “नर देही तुम दुर्लभ पाई। अस औसर फिर मिले न आय।। “आप मनुष्य जन्म की महत्ता के बार में बता रहे है कि ऐसा दुर्लभ मौका हमें मिला है, फिर ऐसा मौका मिले या ना मिले , इसीलिए इसका हम फायदा उठाना है। […]
चल सूवा । तेरे आद राज ‘ , पिंजरा में बैठा कौन काज ॥ बिल्ली का दुख दहै जोर , मारै पिंजरा तोर तोर ॥
मरने पहले मरी धीर , जो पाछे मुक्ता सहज छीर ।। सतगुरु सब्द हृदै में धार , सहजाँ सहजाँ करो उचार ॥ प्रेम प्रवाह धसै जब आभ , नाद प्रकासै परम लाभ ।।
फिर गिरह बसावो गगन जाय , जहँ बिल्ली मृत्यु न पहुँचै आय ॥
आम फलै जहँ रस अनंत , जहँ सुख में पावौ परम तंत ॥ झिरमिर झिरमिर बरसै नूर , बिन कर बाजै ताल तूर ।। जन दरिया आनंद पूर , जहँ बिरला पहुँचै भाग भूर ॥
दरिया साहब की बानी और जीवन – चरित्र , पृ . 39-40
इस पद में दरिया साहिब ने जीव की तुलना तोते से करते हुए शरीर को एक पिजरा माना है । जिस तरह पिंजरे में बंद तोते को हर पल बिल्ली का डर रहता है , उसी तरह शरीररूपी पिंजरे में कैद जीवात्मा को हर क्षण भर सकता है । उसी तरह जीव सतगुरु द्वारा दिए गए सुमिरन का हृदय से बात का भय सताता है । तोता पिंजरे को त्यागकर ही आसमान में उड़ान जाप करते हुए , मौत से पहले मरकर इस शरीररूपी पिंजरे से आज़ाद हो सकता है । कोई विरला ख़ुशक़िस्मत जीव ही परम आनंद की इस अवस्था को प्राप्त करके जन्म – मरण के भय से आज़ाद हो सकता है ।
1.तोता 3. परम तंत – परम तत्त्व 2. आद राज – मूल देश – 4.बिन … तूर – हाथों के बिना तूर बज रहा है भाव शब्द की तूर जैसी ध्वनि सुनाई देती है ।
भजन सिमरन (meditation) मन की मौत है। मन तुम्हे सिमरन करने से बचाएगा। वह हजार बहाने खोजेगा। वह कहेगा कि इतनी सुबह, इतनी सर्द सुबह, कहां उठ कर जा रहे हो? थोड़ा विश्राम कर लो। रात भर वेसे तो नींद नहीं आई, और अब सुबह से भजन सिमरन ? वेसे तो थके हो, अब और थक जाओगे। शांत पड़े रहो। कल कर लेना । इतनी जल्दी भी क्या है? कोई जीवन खत्म थोड़े होने जा रहा है? हजार बहाने मन खोजता है। कभी कहता है, शरीर ठीक नहीं, तबियत जरा ठीक कर लूँ कभी कहता है, घर में काम है कभी कहता बाज़ार है, दूकान है नौकरी है समय नहीं मिलता कभी कहता अभी उम्र नहीं हुई। कभी कहता सेवा सत्संग तो चल ही रहा है हज़ार बहाने खोजता है भजन-सिमरन से बचने की मन पूरी कोशिश करता है। क्योंकि ये सूरत शब्द योग ही एक सीधा रास्ता है जो मालिक तक पहुँचाता है जीवन के लक्ष्य का प्रयोजन पूरा करता है, मन सीधा चल नहीं सकता। टेड़ी चाल का नाम मन है। जैसे ही चाल सीधी हुई की मन गायब परमात्मा से लोग वंचित है इसलिए नहीं कि वह बहुत कठिन है, इसलिए वंचित है कि वह बहुत सरल है इसलिए वंचित नहीं की बहुत दूर है, इसलिए वंचित है की बहुत पास है।
मनुष्य जन्म- एक अवसर part 1 आदि ग्रंथ मे पृष्ठ सं 1075 गुरु अर्जुन देव जी फरमाते है: “लाख चौरासी जोन सबाई।। मानस को प्रभ दी वड आई।।इस पौड़ी ते जो नर चुंके, सो आई जाइ दुख पाईदा।।” इन्सान को दूसरे जीवों के मुकाबले श्रेष्ठ बुद्धि इसीलिए मिली है कि वह इस चरण में अपनी […]
परमात्मा की खोज हर एक महात्मा हम यही उपदेश देता है कि जब तक हमारी आत्मा अपने असल में जाकर नहीं समाती, तब तक इसका जन्म मरण के दुखो से छुटकारा नहीं हो सकता। इसीलिए हर एक को परमात्मा की खोज है। हम सब दुनिया के जीव अपनी अपनी अक्ल के अनुसार हजारों स्थानों पर […]
हमारे मन में कुदरती ही यह विचार आता है कि अगर परमात्मा हर एक के अंदर है तो हमे अपने अंदर नजर क्यो नही आता? हमारे अंदर किस चीज की रुकावट है? वह रुकावट किस प्रकार दूर हो सकती है? गुरु अर्जुन देव फरमाते है:
अंतर अलख न जाई लखया, विच परदा हउमे पाई।।
अंतर में अलख यानी परमात्मा तब तक दिखाई नहीं देता जब तक हउमे यानी अहंकार का बारीक पर्दा है।हमने अपने आपको उस परमात्मा से अलग समझा है। हमने अपनी अलग हस्ती बना रखी है।मेरी ओलाद है, मेरी जायदाद, मेरी धन दौलत, ये मेरा, ये भी मेरा, ये मेरी वजह से है, ये में ना करता तो ऐसा हो ही नहीं सकता। ये सब हउमे यानी अहंकार की भावना है।ये सब असल में उस परमात्मा का है। जब तक तू ही तू की भावना नहीं आयेगी तब तक अंतर में कुछ भी नहीं दिखता।
एका संगत इकत गृह बसते, मिल बात न करते भाई।।
आत्मा और परमात्मा शरीर में दोनों इकट्ठे ही रहते है और एक ही घर में दोनों निवास करते है, लेकिन आपस में मिलाप नहीं है। एक साथ रहते हुए कभी आत्मा ने परमात्मा को नहीं देखा। परमात्मा जरूर हमारे शरीर के अंदर है, लेकिन हमारे और मालिक के दरमियान हउमे की बड़ी जबरदस्त रुकावट है।
गुरु नानक देव जी फरमाते है:
जीवन मुकत सो आखिये, जिस विचहु हउमे जाइ।।
हम जीते जी मुक्ति प्राप्त कर सकते है, अगर हमारे अंदर से हउमे की रुकावट दूर हो जाए।
परमात्मा की भक्ति के पांच सिद्धांतभगवान की सच्ची भक्ति विकसित करने के लिए मार्गदर्शन करने के लिए ” भक्ति के पांच सिद्धांत” है। ये सिद्धांत स्पष्ट करते है कि ईश्वर के भक्त है को दुनिया को दूसरी दृष्टि के अनुसार देखने आते है, ईश्वर के प्रेम, दया और अनुग्रह के साथ। आइए एक एक करके […]