मनुष्य के सामने यह सवाल हमेशा से रहा है कि परमात्मा वास्तव में है भी या नहीं। यदि है तो उससे मिलाप कैसे हो सकता है।इस विषय पर कई ग्रंथ पोथियां लिखी गई, पर इसका सही जवाब वक्त के पूर्ण संत सतगुरु जी दे सकते है क्यो कि वे परमात्मा से मिलाप कर चुके होते […]
परमात्मा कहा है?
जीवन में सात गुरु ( seven masters)
कबीर , गुरु – गुरु में भेद है , गुरु – गुरु में भाव । सोइ गुरु नित बन्दिये , शब्द बतावे दाव ॥
( १ ) प्रथम गुरू है पिता और माता। जो है रक्त बीज के दाता ॥ ( पहला गुरू है पिता और माता)
( २ ) दुजा गुरू है भाई व दाई । जो गर्भवास की मैल छुड़ाई ।( दूसरा वह दाई है जिसने गर्भ के मैल से छुड़ाया)
( ३ ) तिजा गुरू नाम जो धारा । सोई नाम से जगत पुकारा ॥ (तीसरा वह पंडित है जिसने हमारा नाम रखा और उसी नाम से हम इस संसार में जानें जाते है)
( ४ ) चौथा गुरु जो शिक्षा दिन्हा । । तब संसार मार्ग चिन्हा ॥ (चोथा गुरु जो हमे स्कूल में शिक्षा देता है जिसे शिक्षक कहते है)
( ५ ) पांचवा गुरू जो दीक्षा दिन्हा । राम कृष्ण का सुमिरन दिन्हा ।। ( पांचवा गुरु जो हमे आध्यात्मिक दीक्षा देता है परमात्मा से मिलने की)
( ६ ) छठवां गुरू भरम सब तोड़ा । ॐकार से नाता जोड़ा ॥ (छठा गुरु शब्द या नाम (divine power) है जो हमारे अपने शरीर में है जिसके मिलने से हमारे अंतर के सारे भ्रम निकल जाते है। जिसको हम बाहर ढूंढ़ रहे है वो अपने अंतर में ही मिल जाता है। )
( ७ ) सातवां गुरू सतगुरु कहाया । जांहा का जीव ताहां पठाया। (सातवां गुरू सतगुरु है यानी वहा गुरु और परमात्मा ,गोविंद एक हो जाते है । तभी यही आकर शिष्य कह सकता है कि ” गुरु गोबिंद दोनों एक है” फिर आत्मा जहा से आती है वहीं पहुंच जाती है यानी अपने निज घर सचखंड पहुंच जाती है।)
जीते जी मरना…

कबीर साहिब इस बारे में फरमाते है:(आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1365)
कबीर जिस मरने ते जग डरे मेरे मन आनंद।।
गुरु नानक देव जी(आदि ग्रंथ पृष्ठ स 730) फरमाते है:
नानक जीवतिया मर रहीए ऐसा जोग कमाइए।।
बाइबल में सेंट पाल (बाइबल 15:31) भी कहते है “मै प्रतिदिन मरता हूं।“
अहले इस्लाम की हदीस (अहिदिसे मसनवी हदीस 352) भी कहती है
“मूतू कबल अन तमूतू।”यानि मौत से पहले मरो
प्रसिद्ध महात्मा दादू साहिब ( दादू दयाल की बानी, भाग -1 पृष्ठ स 191) अपनी वाणी में फरमाते है
जीवत माटी है रहें साई सनमुख होई।
दादू पहिली मर रहे पीछे तो सब कोई।।
गुरु अमरदास जी फरमाते है(आदि ग्रंथ पृष्ठ स 116)
सतगुरु सेवे ता मल जाय।।
जीवत मरे हर सिउ चित लाए।।
हर मजहब के संतो महात्माओं ने अपने अपने समय और बाणियो में एक ही बात को अलग अलग तरीके से समझाया है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए हमे जीते जी मरना पड़ेगा। यानि जब हम अपने शरीर के नौ द्वारो में से ख्याल निकालकर आंखो के पीछे एकाग्र करते है जिससे हम हमारी चेतन शक्ति को पूरे शरीर से निकालकर आंखो में मध्य इकट्ठी हो जाती है तो पूरा शरीर सुन्न हो जाता है, संतो ने इसे है जीते जी मरना कहा है। इस युक्ति से हम अपने असली घर के दरवाजे पर आ जाते है। हमारा असली घर सचखंड है जहा परमात्मा का निवास है। उसका दरवाजा आंखो के पीछे तीसरा तिल है।
हजरत ईसा भी इसी ओर इशारा करते है जब वे कहते है, “ढूंढो और तुम्हे मिलेगा, खटखटाओ और वह तुम्हारे लिए खोला जाएगा।” (बाइबल मेथयू 7:7)
सही सोच की ओर….

स्वामी विवेकानंद ने कहा है: “संसार का सबसे महान विजेता भी जब अपने मन को वश में करने की कोशिश करता है तो अपने आप को एक बच्चे की तरह असमर्थ पाता है। उसे इस मन रूपी संसार पर विजय प्राप्त करनी है – जो इस संसार से बड़ा है तथा जिसे जीतना और भी मुश्किल है।”
संत महात्मा जान बूझकर ऐसे उदाहरण देते है जो हमे गफलत की नींद से जगाते है, हमे झ्टका देते है, हमे चोक्कने होकर गहराई से सोच विचार करने पर मजबूर करते है। जब फकीर और दरवेश भी, जो कुछ हद तक रूहानी तरक्की कर चुके होते है, कमजोरियों का शिकार हो जाते है तो फिर हमारी क्या बिसात है? हमने तो अभी रूहानियत की पहली सीढी पर भी पाव नहीं रखा है। रूहानी तरक्की न होने के कारण हम बहुत कमजोर हो गए है क्योंकि हम मेडिटेशन द्वारा अपना बचाव नहीं कर सकते। जरा सोचो! हम कितने कमजोर है और हमारा मन कितना खतरनाक है!
एक कहावत है: ” गुरु केवल मार्गदर्शक ही नहीं है। गुरु आग कि तरह है जिसमें से हमे गुजरना है ताकि हमारे अंदर की सब अशुद्धियां जल जाए, खालिस सोना निकल आए।” (Based on Osho, Hari Om tat sat: The Divine sound-that is the thuth; Cologne: Renal Publishing house, 1989,p.64)
रूहानी मार्ग पर चलने का मतलब है – निर्मल होना, पूरी तरह पिस जाना अपने अहंकार को मिटाना और अपने अंदर बदलाव लाना। यह सफर कठिनाइयों से भरा है, मुश्किल है। सतगुरु का मकसद है सारी मलीनता दूर करके शुद्ध सोना बनाकर, अपने शिष्यों को निज घर वापस ले जाना। हमे मेडिटेशन द्वारा मन को काबू करके इसे अंतर्मुख करने की जरूरत है ताकि हम सारी मलीनताओ को जलाकर मन को साफ़ और निर्मल कर सके।
श्री राम कृष्ण परमहंस ने कहा है: ” जिस तरह सरसो के दाने जब किसी फटे लिफाफे में से निकलकर इधर उधर बिखर जाते है तब उन्हें इकट्ठा करना मुश्किल होता है, उसी तरह मनुष्य का मन जब कई दिशाओं में भागता है और कई दुनियावी बातो में उलझा रहता है, तब इसे एकाग्र करके टिकाना कोई आसान काम नहीं है।”
पाठ आध्यात्म की नजर से
अक्सर देखने को मिलता है कि साधारण व्यक्ति ही नहीं, ग्रंथो शास्त्रों के ज्ञाता, महान विद्वान और प्रवक्ता भी इन शास्त्रों की खूब जोर शोर से व्याख्या करते है, परन्तु उनका अपना जीवन शास्त्रों में दिए उपदेश से बिल्कुल उलट होता है। संतो महात्माओं ने इस प्रकार के पाठ विचार करने वालों को चंड़ुल पक्षी कहा है, जो जिसकी बोली सुनता है उसकी नकल कर लेता है, लेकिन उससे उसकी अपनी अवस्था में कोई अंतर नहीं आता। जब तक हम सोच समझकर पाठ नहीं करते और ग्रंथो शास्त्रों में दिए गए उपदेश के अनुसार अपने जीवन को नहीं ढालते, न तो हमारी अज्ञानता का नाश हो सकता है और न ही हमे कोई परमार्थी लाभ प्राप्त हो सकता है। धर्म ग्रंथो में से इनकी रचना करनेवाले महात्माओं के रूहानी अनुभवों का वर्णन है। हमे इनके पाठ का तभी लाभ है जब हम भी अंतर में रूहानी चढ़ाई द्वारा वही अनुभव प्राप्त करे।
गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं
जो प्राणी गोविंद धिआवे।।
पड़िया अनपड़िया परम गति पावे।।
यदि एक व्यक्ति बिल्कुल अनपढ़ है और उसने कभी संसार के किसी ग्रंथ शास्त्र का नाम भी नहीं सुना, लेकिन अगर वह अपने अंदर अनहद शब्द को सुनता है, तो वह संसार का सबसे उत्तम पाठी और विद्वान है।
कबीर साहिब कहते है
पोथी किताबे बाचता, औरो को नित समझवता।
त्रिकुटी महल खोजे नहीं, बक बक मरा तो क्या हुआ।।
आप समझाते है कि असल फायदा धर्म ग्रंथो के पाठ से नहीं, रूहानी अभ्यास द्वारा आत्मा को ऊंचे रूहानी मंडलों में ले जाने से होता है।
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निंदा आध्यात्म की नजर से..

गुरु अर्जुन देव जी (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ३१५) फरमाते है:
अवखध सभे कितीअन, निंदक का दारू नाहि ।।
सब किए की माफ़ी है पर निंदा रूपी अपराध की माफ़ी बहुत मुश्किल है। संत मत में रूहानी तरक्की के लिए अवगुणों का त्याग करने और गुणों को धारण करने का उपदेश दिया जाता है। परमार्थी के जीवन का उद्देश्य दुनियादारी से अलग है। इस आदर्श की प्राप्ति के लिए उसकी सोच, रहनी और करनी भी दुनियादारी से अलग होनी चाहिए। संत महात्मा सच्चे परमार्थी को निंदा के अवगुण का त्याग करने का उपदेश देते है क्योंकि यह रूहानी तरक्की के रास्ते में बहुत बड़ी रुकावट है।
निंदा के पीछे अहंकार का भाव छिपा होता है। जिसकी हम निंदा करते है, उसे हम बुरा या छोटा समझते है और अपने आपको अच्छा या बड़ा समझते है। संत महात्मा हमे अपना दृष्टिकोण सुधारने की हिदायत करते है। वे समझाते है कि सबको पैदा भी एक ही परमात्मा ने किया है और सबके अंदर उस एक का ही निवास है, इसीलिए रूहानी दृष्टि से कोई भी बुरा नहीं है और किसी को बुरा कहना, प्रभु को बुरा कहना है। यही कारण है कि संतो महात्माओं ने निंदा को घोर पाप कहा है। उनका असल भाव यह है कि अहंकार सबसे बड़ा अवगुण है। निंदा का जन्म अहंकार से होता है इसीलिए निंदा बहुत बड़ा दोष है।
निंदा करने वाला हमारे लिए फायदा करते है जिसको अन्य संतो ने भी बताया है
कबीर साहेब (कबीर साखी संग्रह पृष्ठ स १६०)
निंदक दूर न कीजिए, दीजे आदर मान।
निर्मल तन मन सब करे, बके आनही आन।।
मीरा बाई जी ने (मीरा सुधा सिंधु, पृष्ठ स २९५)
निंदा म्हारी भले करजो, लेसी पलो बिछाय।।
बिना साबुन और पानी के सबही मेल धुल जाय।।
गुरु और गोविंद एक ही है
गुरु और गोविंद एक ही है
संत दादू दयाल जी फरमाते है:
जहां राम तह संत जन, जह साधू तह राम।
दादू दून्यू एकठे, अरस परस बिश्राम।।
सच्चे संत परमात्मा में मिलकर परमात्मा रूप हो चुके होते है। अतः परमात्मा कि प्राप्ति संतो द्वारा है हो सकती है और संत परमात्मा की कृपा से ही मिलते है। स्वय भगवान का यह कहना है कि जिस तरह दूध में मिलकर पानी और जल में मिलकर नमक एकाकार हो जाते है, उसी तरह भगवान के प्रेम में डूबा हुआ सच्चा भक्त भगवान बन जाता है।
अनंत सुख सागर के निवासी, नाम के रंग में सरोबार, हंस स्वरूप महात्मा दयावश केवल परोपकार के लिए इस संसार में आते है।
“साधू संगति हरि मिले, हरि संगत थे साध।।”
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोबिंद दियो दिखाय।।
मर्द का दर्द दिखता कहा है?
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