हर मंदर एह सरीर है, गियान रतन प्रगट होई।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1346)
हमारा शरीर ही मालिक के रहने का असली हरि मंदिर है और उस मालिक का असली ज्ञान उसी के अंदर से प्राप्त हो सकता है
तुलसी साहिब हाथरस वाले फरमाते है (संत बानी पृष्ठ स ४४)
नकली मंदिर मस्जिदों में जाय सद अफ़सोस है।
कुदरती मस्जिद का साकिन दुख उठाने के लिए।।
जो हमने परमात्मा के रहने के स्थान बनाए है, कितना अफ़सोस है कि हम उन स्थानों में जाकर दिन रात उस परमात्मा को खोज रहे है और जिस मस्जिद यानी शरीर के अंदर वह परमात्मा रहता है, वह शरीर उस मालिक की याद में दिन रात दुख उठा रहा है। अगर कोई सच्चा गुरुद्वारा, मंदिर, मस्जिद या गिरजा है , वह केवल हमारा अपना शरीर है। यह जगह परमात्मा ने अपने रहने के लिए बनाई है और इसके अंदर वह खुद रहता है।
कबीर साहिब ने तो बड़े जोरदार लफ़जो में हमारे ख्याल को इस वहम और भ्रम से निकलने की कोशिश की है। आप समझाते है:
काकर पाथर जोड़ी के, मस्जिद लई चुनाय।
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय।।
मुल्ला चढ़ी किलकारियां, अलख न बहीरा होय।
जेहि कारण तू बांग दे, सो दिलही अंदर जोय।।
तुर्क मसिते हिन्दू देहरे, आप आप को धाय।
अलख पुरष घट भीतरे, ता का द्वार ना पाय।।
हम पत्थर और इटे इकट्ठी करके मस्जिद य मालिक के रहने की जगह बना लेते है और उसके ऊपर चढ़कर मौलवी ऊची ऊंची बांग देकर परमात्मा को पुकारता है, जैसे परमात्मा बहरा है और हमारी आवाज उस तक नहीं पहुंच सकती। आप समझाते है कि ऐ मुल्ला! वह खुदा बहरा नहीं है। जिस खुदा के लिए तू इतने जोर जोर से चिल्ला रहा है, वह तो तेरे अंदर ही मौजूद है। मुसलमान उस खुदा को मस्जिद के अंदर ढूंढ़ रहे है। हिन्दू मंदिरो में उस परमात्मा की तलाश कर रहे है। सिक्ख और ईसाई गुरुद्वारों और गिरजा में जाकर खोज रहे है। लेकिन अलख पुरुष तो उनके अपने शरीर के अंदर ही है और अंदर ही मिलेगा।
संत हमेशा से हमे रिश्तों की असलियत समझाते है, ताकि हम इनके मोह में फसकर संसार में आने के अपने असल उद्देश्य को न भुला दे।
आदि ग्रंथ (पृष्ठ स 700) पर गुरु अर्जुनदेव जी फरमाते है
कोई जाने कवन ईहा जग मीत।।
जिस होई कृपाल सोई बिधि बुझे ता की निर्मल रीति।।
मात पिता बनिता सुत बंधप इसट मीत अरु भाई।।
पूरब जनम के मिले संजोगी अंतह को न सहाई।।
आप रिश्तों कि असलियत बताते हुए सावधान करते है कि माता, पिता,पत्नी, पुत्र, मित्र, संबंधी आदि सब पिछले जन्मों के कर्मो के प्रभाव से मिलते है। उन सबके साथ हमारा लेन देन का निश्चित अवधि का संबंध होता है। ये संबंध ऐसे ही है जैसे फिल्म में कुछ अभिनेता और अभिनेत्रियां फिल्म की कहानी के अनुसार विशेष रिश्तों को निभाने के लिए इकट्ठे हो जाते है। फिल्म खत्म होते ही किसी का किसी के साथ कोई संबंध नहीं रहता। यदि कोई अभिनेता या अभिनेत्री फिल्म की समाप्ति पर किसी के साथ कोई सम्बन्ध समझे तो यह उसकी अज्ञानता है। फिल्म के दौरान सब रिश्ते एक निश्चित समय के लिए होते है।इसी तरह हर व्यक्ति का जीवन से मृत्यू तक एक विशेष फिल्म है। मौत के बाद दूसरा नाटक शुरू हो जाता है। संतो का समझाने का भाव है कि जीवन को एक नाटक समझो। नाटक के पात्र पूरी लगन से रिश्ते निभाते है, लेकिन किसी के मोह में नहीं फसते।
संत समझाते है कि संसार में लेन देन के सब फर्ज भी पूरे करो, रिश्तेदारों संबंधियों के प्रति अपनी सब जिम्मेदारी भी पूरी करो, लेकिन इन संबंधो को सच्चा, पक्का और स्थाई मत समझो।
स्वामी जी महाराज दो प्रकार के उपदेश देते है:
मित्र तेरा कोई नहीं संगियन में।
पड़ा क्यो सोवे इन ठगियन में।।
(सारबचन संग्रह 15:5:1)
आप कहते है कि संसार के रिश्तेदार सच्चे और पक्के नहीं है। ये ठगो के समान है जो तुझे तेरी परमार्थी पूंजी से वंचित कर देते है।
स्वामी जी महाराज फिर फरमाते है:
सत्संग सच्चा सतगुरु सच्चा।
नाम सच्चाई क्या कहूं गाय।।
आप समझाते है कि सतगुरु, साधु संगति और नाम या प्रभु के साथ हमारा सच्चा और पक्का रिश्ता है, क्यो कि लोक और परलोक दोनों में सफलता इस रिश्ते पर ही आधारित है।
अगर दिन में जब आप किसी भी समस्या का सामना नहीं करते है तो – आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि आप गलत रास्ते पर चल कर रहे हैं।” – स्वामी विवेकानंद
आज सुबह ये सुंदर विचार पढ़ा तो सोचा आपके साथ सांझा करू। स्वामी विवेकानन्द जी कहते है कि अगर हमारी जिंदगी बहुत अच्छी चल रही कोई प्रॉब्लम भी नहीं है तो हमको यह समझना है कि हम सही रास्ते पर नहीं है। इसका यह मतलब नहीं कि जिंदगी अच्छी जीना अच्छा नहीं है। यह उन्होंने आध्यात्मिक दृष्टिकोण से कहा है कि हम अपने असल मंजिल की ओर यात्रा न करके दुनिया के धंधों में फसे है। हमारी इस मनुष्य योनि का असल मकसद ही परमात्मा को पाना है।
आदि ग्रंथ (पृष्ठ स४३) में गुरु अर्जुन देव जी यही फरमाते है :
प्राणी तू आया लाहा लेन।।
लगा कित कुफकड़े सभ मुकती चली रैन।।
आप कहते है कि प्राणी ! तू यहां है सिर्फ इस मनुष्य जनम से लाभ कमाने के लिए, पर यहां आकर फालतू के कामो में लग गया है। क्यो यहां कमाया कुछ भी साथ नहीं जाता है तो फिर क्यो इकट्ठा करने में लगा हुआ है। इस दिन और रात का ये सिलसिला खत्म होने वाला है यानी हम हर रोज मौत के करीब जा रहे है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स २५१ पर कहा गया है कि
या जुग में तू एकह को आईया ।।
यहां भी यही लिखा है कि हम इस संसार में सिर्फ एक काम के लिए आए है । लेकिन हम उस काम को छोड़कर सब काम कर रहे है।
आपका कहने का अर्थ ये भी है कि सब जिम्मेदारी के काम करने है पर इनकी सीमा बयान कि है आपने। हमे परमात्मा की प्राप्ति को प्राथमिकता पर रखकर बाकि काम करने चाहिए।
संतों की एक सभा चल रही थी,किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संत जन जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सके।
संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था। उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे।वह सोचने लगा अहा ! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है,एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा। संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा,ऐसी किस्मत किसी किसी की ही होती है। घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा सिर्फ मिट्टी का ढेर था।किसी काम का नहीं था। कभी ऐसा नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है।फिर एक दिन एक कुम्हार आया।उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और मुझे बोरी में भर कर गधे पर लादकर अपने घर ले गया।वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाकपर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा, फिर थापी मार-मारकर बराबर किया । बात यहीं नहीं रूकी, उसके बाद आंवे के आग में झोंक दिया जलने को।
इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेजने के लिए लाया गया।वहां भी लोग मुझे ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है या नहीं ?
ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये…
मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था…
रोज एक नया कष्ट,एक नई पीड़ा देते हो। मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है…
लेकिन ईश्वर की योजना कुछ और ही थी।
किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया…तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी उसकी कृपा थी…
उसका मुझे गूंथना भी उसकी कृपा थी…
मुझे आग में जलाना भी उसकी मौज थी…
और…
बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी उसकी ही मौज थी…
अब मालूम पड़ा कि मुझ पर सब उस परमात्मा की कृपा ही कृपा थी…
नोट -बुरी परिस्थितियां हमें इतनी विचलित कर देती हैं कि हम उस परमात्मा के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं और खुद को कोसने लगते हैं , क्योंकि हम सभी में शक्ति नहीं होती उसकी लीला को समझने की…
कई बार हमारे साथ भी ऐसा ही होता है हम खुद को कोसने के साथ परमात्मा पर ऊँगली उठा कर कहते हैं कि उसने मेरे साथ ही ऐसा क्यों किया?
क्या मैं इतना बुरा हूँ ? और मालिक ने सारे दुःख तकलीफ़ें मुझे ही क्यों दी?
*लेकिन सच तो ये है कि मालिक उन तमाम पत्थरों की भीड़ में से तराशने के लिये एक आपको चुना । अब तराशने में तो थोड़ी तकलीफ तो झेलनी ही पड़ती है|
संत महात्मा प्रभु की प्राप्ति के लिए मन की निर्मलता का उपदेश देते है। हम इसके लिए आसान से आसान साधन ढूंढने की कोशिश करते है। हम समझते है कि तीर्थो में स्नान करने से मन निर्मल हो जाएगा और हम प्रभु मिलाप करने में सफल हो जायेगे। पर ऐसा सोचना ठीक नहीं है।
तीर्थ स्थान कैसे बने? प्राचीन काल में प्रभु के भक्त नदियों के नजदीक कोई जगह प्रभु भक्ति के लिए चुनते थे ताकि स्नान आदि में आसानी हो। संत महात्मा अपना आश्रम बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि उनके पास आनेवाले जिज्ञासुओं को पानी की कोई दिक्कत न हो। यह पानी प्यास बुझाने और शरीर की सफाई के लिए था ताकि जिज्ञासु सुचेत होकर सत्संग सुन सके और नाम का अभ्यास कर सके। नाम का अभ्यास करने वाले और नाम का उपदेश देनेवाले महात्माओं के बाद लोगो ने इन स्थानों को तीर्थ बना लिया और इनमे स्नान करने को ही प्रभु भक्ति या मन की निर्मलता का साधन समझना शुरू कर दिया। हम प्रभु भक्ति या में की निर्मलता का आसान से आसान तरीका ढूंढते है। मन को विषय विकारों में मोड़कर नाम कि कमाई द्वारा निर्मल करना कठिन कार्य है। इसीलिए हम लोग अज्ञानतावश तीर्थ यात्रा को मन की निर्मलता का साधन समझना शुरू कर देते है।
संत महात्मा समझाते है कि बाहरी तीर्थ शरीर की मैल उतार सकते है, लेकिन मन और आत्मा पर चढ़ी कर्मो और संस्कारों की मलीनता को दूर करने वाला सच्चा तीर्थ हमारे अपने अंतर में है।
कबीर साहिब फरमाते है (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ४८४)
अंतर मैल जे तीरथ नावे, तिस बेंकुट न जाना।।
लोक पतिने कछु न होवे, नाही राम अयाना।।
एक और जगह लिखते है…
जल कै मजनि जे गति होवे नित नित मेंढक नावह।।
जैसे मेंढक तैसे अोई नर फिर फिर जोनि आवह।।
अंतर में मैल है और हम तीर्थ नहाहे, इससे हम कभी परमात्मा से मिल नहीं सकते। एक सुंदर उदाहरण के ज़रिए आप समझाते है कि अगर जल में नहाने मात्र से गति प्राप्त होती तो सबसे पहले उस मेंढक को गति प्राप्त होती जो रोज रोज उस जल में नहाता है। पर असल में जैसे मेंढक को बार बार जन्म लेकर चौरासी के चक्कर लगाने है वैसे ही हमारा हाल है।
संत महात्मा तीर्थो का विरोध नहीं करते। वे इनकी सीमा बयान करते है। वे समझाते है की अगर हम तीर्थ स्थान को ही प्रभु भक्ति और नाम की कमाई मान लेंगे तो हम अपने परमार्थी लक्ष्य में कभी सफल नहीं हो सकते। बाहरी कर्मकाण्ड और हर प्रकार के दूसरे साधन हमारे अंदर सच्ची प्रभु भक्ति का शौक पैदा करने के लिए है। पर यदि हम तीर्थो पर जाकर संतो महात्माओं के निर्मल वचन सुने, अपना जीवन उनके उपदेशानुसार ढालने का प्रयत्न करे और पूर्ण संतो से अंतर्मुख अभ्यास की युक्ति सीखकर नाम के अंतर्मुख सच्चे तीर्थ में स्नान करे, तो हमारी बाहर की तीर्थ यात्रा भी सफल हो जाएगी।
संतो महात्माओं ने हमेशा से एकता का उपदेश दिया है। वे हमको हर प्रकार के द्वैत से ऊपर उठकर समदर्शी बनने का उपदेश देते है। संत महात्मा समझाते है कि परमात्मा ने सब इंसान एक जैसे बनाए है। मजहब, मुल्क, कोम, नस्ल और जाति पाति के सब तरह के भेद भाव इंसान के बनाए हुए है। कबीर साहिब कहते है (आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1349)
अवल अलह नूर उपाईया कुदरत के सभ बंदे।।
एक नूर ते सभ जग उपजिया कौन भले को मंदे।।
सबसे पहले परमात्मा ने रोशनी पैदा की, तब उसी रोशनी या उसकी रचनात्मक शक्ति द्वारा, उन्होंने सभी नश्वर प्राणियों को बनाया। उसी एक नूर या रोशनी से, पूरे ब्रह्मांड का विकास हुआ। यानि सारे प्राणी उसी ने बनाए है, तो फिर बला कोन अच्छा? और कौन बुरा हो सकता है उसकी नजर में?
जिन पांच तत्वों से मनुष्य शरीर बना है, वे भी समान है। हर मनुष्य में आंख, कान, हाथ, पांव आदि भी समान है और उनके अंदर रखा गया प्रभु का प्रकाश भी समान है इसीलिए सब इंसान बराबर है।
मजहब, मुल्क, कोम, नस्ल और जाति पाति के सब भेद अज्ञानता की उपज है। जो लोग अपने धर्म या जाति को बड़ा समझते है, अज्ञानता के अंधकार में फसे हुए है। जो दुसरो को जाति और धर्म के नाम पर छोटा समझते है, वे स्वय ज्ञान और प्रेम में छोटे है। वास्तव में जीव की जाति उसके कर्मो के अनुसार होती है। जाति उन लोगो की ही छोटी है, जो सच्चे शब्द या नाम की कमाई नहीं करते और द्वैत भाव तथा विषय विकारों में लिप्त है। अगर हम अपने चारो ओर नजर डाले तो हमे पता चलेगा कि पापी और गुनहगार हर धर्म में है। इसी तरह नेक इनसान भी सभी धर्मो में है। जिन जातियों को हम अज्ञानता वश छोटा समझते है, उनमें भी नेक रहनी, निर्मल आचरण और पवित्र विचारो वाले अनेक लोग है और जिन जातियों को हम अज्ञानता के कारण ऊंचा समझते है, उनमें भी पापियों, अत्याचारियों और बेईमानों की कोई कमी नहीं है।
पलटू साहिब की बानी, भाग -१ कुण्डली २१८
पलटू ऊची जाति को जो कोई करे हंकार।
साहिब के दरबार में केवल भक्ति पियार।।
संत महात्मा समझाते है कि कुल मालिक की दरगाह में जहां हमारे का हिसाब मांगा जाता है, वहां हमारा शरीर और जाति पाति साथ नहीं जाते। इसीलिए हमे ऊंची जाति, पदवी या कुल का अभिमान नहीं करना चाहिए और न ही किसी को नीची जाति का समझकर उसके साथ घृणा करनी चाहिए। कोई व्यक्ति केवल इसीलिए परमेश्वर की प्राप्ति का अधिकारी नहीं बन जाता कि उसका जन्म ऊंची जाति में हुआ है और न ही कोई जीव केवल इसीलिए प्रभु की भक्ति से वंचित रह जाएगा कि उसने नीची जाति में जन्म लिया है। जब उस परमात्मा की कोई जाति नहीं तो हमारी आत्मा, जो परमात्मा की अंश है, उसकी क्या जाति पाति हो सकती है? जीव को सच्ची महानता भक्ति, नाम की कमाई और शुभ कर्मो के कारण मिलती है, जाति पाति के कारण नहीं। तुलसी साहिब फरमाते है: (संत बानी संग्रह, भाग, पृष्ठ स २३५)
नींच नीच सब तर गए, संत चरन लोलिन।
जातह के अभिमान से, डूबे बहुत कुलीन।।
आप इशारा करते है कि परमात्मा से मिलाप का सौभाग्य केवल उन्हीं जीवों को प्राप्त होता है जो जाति पाति के भेदभाव से ऊपर उठकर, सतगुरू की बताई युक्ति के अनुसार शब्द या नाम की कमाई करते है।
मन की रचना के बारे में गुरु नानक साहिब फरमाते है (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ४१५)
ईह मन करमा ईह मन धरमा।। ईह मन पंच तत ते जनमा।।
कबीर साहिब कहते है: (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ३४२)
ईह मन सकती ईह मन सीउ।।ईह मन पंच तत को जीउ।।
गुरु नानक साहिब और कबीर साहिब यह समझा रहे है कि मन, माया (सकती) और काल (सीउ) का अंश है। यह पांच तत्वों के सूक्ष्म अंश तथा कर्मो और संस्कारों के मेल से बनता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति का मन अलग अलग होता है और हर व्यक्ति के मन की अवस्था भी निरन्तर बदलती रहती है। जैसे जैसे कर्म और संस्कार प्रकट होते है, वैसी ही व्यक्ति की मनोदशा बन जाती है।
मन का जोर त्रिलोकी तक है। इसीलिए संत महात्मा सावधान करते है कि आम इंसान तो एक तरफ, त्रिलोकी की हद में कैद बड़े बड़े तपस्वी, ज्ञानी, मुनिश्वर और देवी देवता भी मन के अधीन है। संतो महात्माओं ने अपनी वाणी में ऐसे अनेक विवरण दिए है जिनसे पता चलता है कि सैकड़ों साल हट कर्मो द्वारा साधना में लगे हुए बड़े बड़े त्यागियो को भी अंत में मन ने मार गिराया। किसी को काम ने मार गिराया, और किसी को क्रोध ने। कोई लाभ और मोह का शिकार हो गया, तो कोई अहंकार का। संत महात्मा समझाते है कि मन द्वारा बनाए गए साधनों से मन को वश करने की कोशिश करना सिर्फ अज्ञानता है।
आम तौर पर मन को काल का एजेंट कहा जाता है और यह कहा जाता है कि मन ही हमसे बुरे कर्म करवाता है। इस बात को एक दूसरे ढंग से भी समझा जा सकता है। हम आज के युग की भाषा में यह कह सकते है कि मन एक कंप्यूटर है। कंप्यूटर अपने आप कुछ नहीं करता। हम जो कुछ कॉप्यूटर की मैमोरी में फीड यानी डालते है, कंप्यूटर उसे ही स्क्रीन पर दिखाता है। इसी तरह मन हमारे खुद के पूर्व किए हुए कर्मो संस्कारों के अनुसार कार्यशील होता है। मृत्यु के समय शरीर पीछे छूट जाता है, परन्तु किए हुए सारे कर्मो का प्रभाव मन और आत्मा के साथ रहता है। अगले जन्म में शरीर बदल जाता है, किन्तु मन और आत्मा सब पूर्व संस्कारों के अधीन पुनः कर्म करते रहते है।
संत महात्मा समझाते है कि आत्मा और परमात्मा के बीच सबसे बड़ी रुकावट हमारा मन है और हम मन को वश में करके ही परमात्मा से मिलाप कर सकते है। गुरु नानक साहिब कहते है ” मन जीते जग जीत”( आदि ग्रंथ पेज न ६) आपका कहना है कि अगर हम मन को वश में कर लेते है तो हम संसार को बनाने वाले परमात्मा से मिलाप करने के काबिल हो जाते है।
स्वामी जी महाराज कहते है:
बड़ा बेरी यह मन घट में। इसी का जीतना कठीना।।
आपका कहना है कि हमने जो भी यतन करना है, अंदर बैठे मनरूपी शक्तिशाली शत्रु को वश में करने के लिए करना है। मन को वश में करने के लिए हमे मन के स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए।
संत महात्मा हमे समझाते है कि मन बहुत शक्तिशाली है। यह इन्द्रियों के भोगों और विषय विकारों का रसिया है। यह हर पल भोगों की लज्जतो की तरफ़ भागता है। यह कभी एक चीज की तरफ जाता है तो कभी दूसरी तरफ, मगर कोई भी चीज हमेशा के लिए मन को लेकर खड़ी नहीं हो सकती। केवल वह वस्तु ही मन को वश में कर सकती है जो मन से अधिक शक्तिशाली हो और जिसमें इन्द्रियों के भोगों से अधिक रस और आनंद हो। त्याग, वैराग्य या हठ कर्मो द्वारा सिर्फ मन और इसके विकार दब जरूर सकते है, लेकिन इनकी जड़ नहीं कट सकती। दबे हुए विकार, और अधिक खतरनाक हो जाते हैं। संत महात्मा समझाते है कि नाम प्रभु का रूप है और प्रभु की तरह ही शक्ति रूप, ज्ञान रूप और आनंद रूप है। नाम वह अमृत है जिसे पीकर मन की जन्मो जन्मों की इच्छाएं शांत हो जाती है।
गुरु राम दस जी फरमाते है: आदि ग्रंथ पृष्ठ स ४०
नाम मिले मन त्रीपतीए, बिन नाम ध्रिग जीवस।।
आप समझाते है कि में में जब भी तृप्ति और शांति आयेगी, नाम द्वारा आयेगी। जब भी मन वश में आएगा, नाम द्वारा ही आएगा और जब भी इसे सच्चे सुख की प्राप्ति होगी, नाम द्वारा होगी।
Note: नाम के बारे में विस्तृत जान ने के लिए आप मेरी 28 जून, 30 जून, 1 जुलाई वाली पोस्ट देख सकते है