ज्योतिष आद्यात्म की नजर से…

ज्योतिष द्वारा लोग भविष्य में घटनेवाली शुभ और अशुभ घटनाओं का पता लगाने का प्रयत्न करते है।लोग ज्योतिष विद्या द्वारा यह जानने का प्रयत्न करते है कि किस काम के लिए कौन सी घड़ी या कोन सा मुहूर्त शुभ है। इसी तरह वे यह जानने की भी कोशिश करते है कि किन स्थानों पर जाना और किन लोगो के साथ संबंध बनाना शुभ या अशुभ होगा।

पर आजकल ज्योतिष एक व्यवसाय बन गया है। अधिकतर ज्योतिष लोगो के मनोविज्ञान से लाभ उठाने का प्रयत्न करते है। जरूरी नहीं कि ज्योतिष का ज्योतिष ठीक हो। उसके गणित या हिसाब में गलती हो सकती है, जो जन्म पत्री आदि हम लेकर जाते है, वह गलत हो सकती है और अगर ज्योतिष को ठीक बात का पता चल भी जाय तो भी वह डरते हुए पूरा सत्य नहीं बताता।

जिस तरह किसी व्यक्ति को नशे की आदत पड़ जाती है और वह बार बार नशा करता है, उसी तरह हमे ज्योतिषों के पास जाने की आदत पड़ जाती है। अधिकतर ज्योतिषी इसका पूरा लाभ उठाते है। ऐसे ज्योतिष बहुत कम है, जो ज्योतिष को एक धंधे, व्यापार या आजीविका के साधन के रूप में नहीं, केवल एक विज्ञान के रूप में इस्तेमाल करते है। जिस तरह नशा करने से मनोबल निर्बल होता जाता है, उसी तरह ज्योतिष द्वारा मनोबल निर्बल हो जाता है और हमारी हालत से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।

ज्योतिष विद्या गलत नहीं है। लेकिन सच्चे ज्योतिष बहुत कम होते है। वास्तव में ज्योतिष से कोई लाभ नहीं हो सकता क्योंकि ज्योतिष भविष्यवाणी भले ही कर ले, पर होनी को नहीं टाल सकते।

गुरु राम दास जी कहते है:(आदि ग्रंथ पृष्ठ स ११३५)

  • मता मसूरत तां किछु किजै, जे किछ होवै हर बाहर।।
  • जो किछ करे सोई भल होसी, हर धिआवहू अनदिन नाम मुरारि।।

जो कुछ होना है, प्रभु की रजा के अनुसार होना है और जो कुछ होना है, वह अटल है। तो फिर लग्न, मुहूर्त या भविष्य के बारे में सोचकर परेशान होने का क्या लाभ है?

कबीर साहिब की शब्दावली में भाग १ पेज न ५५ पर लिखा है:

  • करम गति टारे नहि टरी।।
  • मुनि बशिष्ठ से पंडित ज्ञानी, सोध के लगन धरी।
  • सीता हरण मरण दसरथ को, बन में बिपती परी।।

आप समझाते है कि भगवान राम की शादी का मुहूर्त मुनिवर वशिष्ठ ने निकाला था, लेकिन फिर भी रावण सीता को उठाकर ले गया, राम के पिता दशरथ की मृतयु हो गईं और राम को चौदह वर्ष का वनवास मिला। वशिष्ट जैसे महान ऋषि भी होनी को टाल न सके।

महात्मा जल्हण हास्यमय शैली में कहते है ( वाणी भगत जल्हण, पृष्ठ स ५)

  • घर वैंदा दे पिटना, घर ब्रह्मण दे रंड।
  • चल जल्हण घर आपने, साहा वेख न संग।।

ज्योतिष दूसरों के प्रारब्ध के बारे में भविष्यवाणी करते है, लेकिन किसी ज्योतिष कि बहु विधवा हो चुकी है और किसी की बेटी। इसीलिए ज्योतिष के भ्रम में पड़ना घोर अज्ञानता है।

हमारा ज्योतिषयों के पास जाना इस बात का सबूत है कि हमे न तो प्रभु में भरोसा है और न ही अपने आप में विश्वास है। यदि ज्योतिषियों का बताया हुआ उपाय होनी को टाल सकता है तो फिर हमे प्रभु की भक्ति छोड़कर ज्योतिषियों की भक्ति में लग जाना चाहिए।

गुरु अर्जुन देव जी फरमाते हैं: ( आदि पृष्ठ स १३६)

  • माह दिवस मूरत भले, जिस को नदर करे।।
  • नानक मंगे दरस दान, किरपा करह हरे।।

सब महीने, दिन और मुहुर्त उस प्रभु के बनाए हुए है, इसीलिए वे सब ही उत्तम है। कोई भी समय अच्छा या बुरा नहीं होता। हमारी वृती या दृष्टि ही अच्छी या बुरी होती है। जिस समय भी हम कोई शुभ कार्य करते है और जिस समय भी हमारा ध्यान प्रभु की भक्ति या नाम की कमाई कि और जाता है, वही समय धन्य है।

जीवन और आध्यात्म

गुरु नानक साहिब फरमाते है:

  • जैसे जल मह कमल निरालम मुरगाई नै साने।।
  • सुरत सबद भाव सागर तरिए नानक नाम वाखने।।

जिस तरह मुरगाबी पानी में रहती है, जब चाहती है, सूखे परो से उड़ जाती है। कमल का फूल पानी से बाहर होता है, जड़े पानी में होती है। इसी तरह हमे भी अपनी आत्मा को शब्द या नाम से जोड़कर इस भवसागर से पार हो जाना है। दुनिया में रहते हुए भी दुनिया के मैल में नहीं लीबड़ना हैं।

जो भेखि लोग है, वे बेटे बेटियों को त्यागकर जंगलों पहाड़ों में छिप जाते है। भगवे, पीले, नीले कपड़े पहन लेते है। वहा झोपड़ियों बनाकर बैठ जाते है। गुरु साहिब कहते है कि इसका क्या फायदा है? उनके मन में वही इच्छाएं, वही तृष्णाए है जिन्हे वे अंदर दबाए रखते ही। वहा रहने का क्या फायदा? उन्हें हर चीज वहा भी चाहिए।

हम देखे, हमे दुनिया में किस चीज की जरूरत है? हमारे पेट को खाने की जरूरत है, शरीर ढकने के लिए हमे कपड़े की जरूरत है, सिर पर किसी छत कि जरूरत है। क्या जंगलों पहाड़ों में जाकर हमारा पेट खाना नहीं मांगता? जंगलों पहाड़ों में जाकर हमे कपड़े की जरूरत नहीं पड़ती? अपनी है हलाल की कमाई छोड़ी, बाल बच्चों का खाना छोड़ा, लोगो के आगे हाथ फैला फैलाकर, मांगकर पेट भरना पड़ा। पेट ने तो वहां भी लिहाज नहीं किया। वहा जाकर मांगना शुरू कर दिया। सफ़ेद कपड़े उतारकर भगवें पहन लिए, तन को फिर भी ढकना पड़ता है। अपने घर का सुख, आराम छोड़ेगे, कोई आश्रम ढूंढेंगे, मंदिर, गुरुद्वारा ढूंढेंगे, झोपड़ी बनायेगे, गुफा बनाएंगे, सिर पर तो फिर भी छत की जरूरत पड़ती है। छूटती कोन से चीज है? उलटा अपाहिज होकर बैठ जाते हैं।

गुरुबाणी में आता है आदि ग्रंथ पृष्ठ स १४२१

  • जोग न भगवी कपड़े,जोग न मैले वैस।।
  • नानक घर बैठेया जुगत पाइए, सतगुरु के उपदेश।।

ना तो जोग यानी सच्ची भक्ति भगवे कपड़े को पहनने से आती है और ना ही परमात्मा का मैले कपड़े पहनने से पाया जा सकता है यानी कई कई दिनों तक न नहाना पसंद है। महात्मा समझाते है कि अगर परमात्मा कि दया से पूरा सतगुरु मिले और जब हम उनके उपदेश पर चले तो घर में बैठकर ही प्रभु को पा सकते है।

महात्मा यह नहीं कहते कि बेटे बेटियों को त्यागकर, जंगलों पहाड़ों में छिपकर बैठ जाओ। दुनिया में रहना है, सुरमे बहादुर बनकर रहना है और दुनिया में रहते हुए भी दुनिया कि मैलो में नहीं लीबड़ना है।

दो हीरे

एक सौदागर को बाज़ार में घूमते हुए एक उम्दा नस्ल का ऊंट दिखाई पड़ा!
.सौदागर और ऊंट बेचने वाले के बीच काफी लंबी सौदेबाजी हुई और आखिर में सौदागर ऊंट खरीद कर घर ले आया!_
.घर पहुंचने पर सौदागर ने अपने नौकर को ऊंट का कजावा ( काठी) निकालने के लिए बुलाया..!
.कजावे के नीचे नौकर को एक छोटी सी मखमल की थैली मिली जिसे खोलने पर उसे कीमती हीरे जवाहरात भरे होने का पता चला..!_
.नौकर चिल्लाया,”मालिक आपने ऊंट खरीदा, लेकिन देखो, इसके साथ क्या मुफ्त में आया है!”_
.सौदागर भी हैरान था, उसने अपने नौकर के हाथों में हीरे देखे जो कि चमचमा रहे थे और सूरज की रोशनी में और भी टिम टिमा रहे थे!_
.सौदागर बोला: ” मैंने ऊंट ख़रीदा है, न कि हीरे, मुझे उसे फौरन वापस करना चाहिए!” .नौकर मन में सोच रहा था कि मेरा मालिक कितना बेवकूफ है…!
.बोला: “मालिक किसी को पता नहीं चलेगा!” पर, सौदागर ने एक न सुनी और वह फौरन बाज़ार पहुंचा और दुकानदार को मख़मली थैली वापिस दे दी!_
.ऊंट बेचने वाला बहुत ख़ुश था, बोला, “मैं भूल ही गया था कि अपने कीमती पत्थर मैंने कजावे के नीचे छुपा के रख दिए थे!_
.अब आप इनाम के तौर पर कोई भी एक हीरा चुन लीजिए!_
.
“सौदागर बोला,” मैंने ऊंट के लिए सही कीमत चुकाई है इसलिए मुझे किसी शुक्राने और ईनाम की जरूरत नहीं है!
.जितना सौदागर मना करता जा रहा था, ऊंट बेचने वाला उतना ही ज़ोर दे रहा था!_
.आख़िर में सौदागर ने मुस्कुराते हुए कहा: असलियत में जब मैंने थैली वापस लाने का फैसला किया तो मैंने पहले से ही दो सबसे कीमती हीरे इसमें से अपने पास रख लिए थे!_
इस कबूलनामें के बाद ऊंट बेचने वाला भड़क गया उसने अपने हीरे जवाहरात गिनने के लिए थैली को फ़ौरन खाली कर लिया!
.पर वह था बड़ी पशोपेश में बोला,”मेरे सारे हीरे तो यही है, तो सबसे कीमती दो कौन से थे जो आपने रख़ लिए?”
_सौदागर बोला:…“मेरी ईमानदारी और मेरी खुद्दारी.”

🌹हमें अपने अन्दर झांकना होगा कि हम में से किस किस के पास यह 2 हीरे है।🙏🏻

🌹जिन जिन के पास यह 2 हीरे है वह दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।

मैं ही कृष्ण मैं ही कंस हुँ।

मैं ही कृष्ण मैं ही कंस हुँ।
(दिल को छूने वाली कहानी)

एक चित्रकार था, जो अद्धभुत चित्र बनाता था।
लोग उसकी चित्रकारी की तारीफ़ करते थे।

एक दिन कृष्ण मंदिर के भक्तों ने उनसे कृष्ण और कंस का एक चित्र बनाने की इच्छा प्रगट की।

चित्रकार तैयार हो गया आखिर भगवान् का काम था, पर उसने कुछ शर्ते रखी।

उसने कहा कृष्ण के चित्र लिए नटखट बालक और कंस के लिए एक क्रूर भाव वाला व्यक्ति लाकर दे,
मुझे योग्य पात्र चाहिए, अगर वे मिल जाए तो में आसानी से चित्र बना दूंगा।

भक्त एक सुन्दर बालक ले आये।
चित्रकार ने उस बालक को सामने रख बाल कृष्ण का एक सुंदर चित्र बनाया।

अब बारी कंस की थी पर क्रूर भाव वाले व्यक्ति को ढूंढना थोडा मुस्किल था।
जो व्यक्ति कृष्ण मंदिर वालो को पसंद आता वो चित्रकार को पसंद नहीं आता उसे वो भाव मिल नहीं रहे थे…

वक्त गुजरता गया।
आखिरकार थक-हार कर सालों बाद वो अब जेल में चित्रकार को ले गए, जहा उम्र कैद काट रहे अपराधी थे।
उन अपराधीयों में से एक को चित्रकार ने पसंद किया और उसे सामने रखकर उसने कंस का चित्र बनाया।

कृष्ण और कंस की वो तस्वीर आज सालों के बाद पूर्ण हुई।

कृष्ण मंदिर के भक्त वो तस्वीरे देखकर मंत्रमुग्ध हो गए।

उस अपराधी ने भी वह तस्वीरे देखने की इच्छा व्यक्त की।
उस अपराधी ने जब वो तस्वीरे देखी तो वो फुट-फुटकर रोने लगा।

सभी ये देख अचंभित हो गए।
चित्रकार ने उससे इसका कारण पूछा,

तब वह अपराधी बोला “शायद आपने मुझे पहचाना नहीं,
मैं वो ही बच्चा हुँ जिसे सालों पहले आपने बालकृष्ण के चित्र के लिए पसंद किया था।
मेरी गलत संगत और मेरे कुकर्मो से आज में कंस बन गया, इस तस्वीर में मैं ही कृष्ण, मैं ही कंस हुँ।

हमारी संगत और हमारे कर्म ही हमे अच्छा
और बुरा इंसान बनाते है।

दरद न जाने कोय

मीरा बाई का शब्द

  • हेरी मै तो प्रेम दीवानी, मेरो दरद न जाने कोय।
  • सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय।
  • गगन मंडल में सेज पिया की, किस विध मिलना होय।
  • घायल की घायल जानें, की जिन लाई होय।
  • जौहर की गति जौहर जाने, की जिन जौहर होय।
  • दरद की मारी बन बन डोलू बेद मिला नहीं कोय।
  • मीरा की प्रभु पीर मिटेगी, जब बैद सावलिया होय

मीरा बाई अपने प्रियतम के वियोग में व्याकुल है। अपनी विरह व्यथा में उन्हें ऐसा महसूस होता है मानो उनकी सेज सूली पर बिछी हुई है। जिसकी वजह से उन्हें न नींद आती है और न ही चेन मिलता है। प्रियतम प्रभु से मिलाप प्राप्त करना भी उन्हें असंभव सा लगता है, क्योंकि उनका वास तो आंखो के केंद्र से ऊपर सूक्ष्म मंडलों में है और जहा वे पहुंच नहीं पा रही है। वे कहती है कि घायल की पीड़ा कोई घायल ही जान सकता है। या फिर वही जान सकता है जिसने चोट लगाई है, क्योंकि उस पता है कि उसने कितना गहरा आघात किया है। जौहर करने वाली औरत के प्रेम, उत्साह और जोश को वही औरत जान सकती है जिसे जौहर द्वारा पाने प्राणों की आहुति देकर दूसरे लोक में अपने प्यारे पति से मिलाप की उत्कंठा हो। पद के अंत में मीरा बाई कहती है कि उनकी वियोग की पीड़ा का उपचार सिवाय प्रियतम प्रभु के और कोई नहीं कर सकता।

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो का अनुसंधान )

इसे पढ़े और सेव कर सुरक्षित कर लेवे। वाट्सअप पर ऐसी पोस्ट बहोत कम ही आती है।👇
विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो का अनुसंधान )

■ क्रति = सैकन्ड का 34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुति = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुति = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 76 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महाकाल = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (प्रयागराज), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।

आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।

नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।

दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।

उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर… हैं ।
यह आपको पसंद आया हो तो इस महान भारतीय सनातन का ज्ञान भण्डार अपने बच्चों को समझाएं एंव अपने बन्धुओं को भी शेयर जरूर कर अनुग्रहित अवश्य करें यह संस्कार का कुछ हिस्सा हैं।
फिर देखो आनंद ही आनंद है।

खूंटी का बंधन

A story to open eyes of many…
खूंटी का बंधन

*एक रात एक बड़ी घनी अंधेरी रात में एक काफिला एक रेगिस्तानी सराय में जाकर ठहरा। उस काफिले के पास सौ ऊंट थे। उन्होंने ऊंट बांधे, खूंटियां गड़ाईं, लेकिन आखिर में पाया कि एक ऊंट अनबंधा रह गया है। उनकी एक खूंटी और एक रस्सी कहीं खो गई थी। आधी रात, बाजार बंद हो गए थे। अब वे कहां खूंटी लेने जाएं, कहां रस्सी! तो उन्होंने सराय के मालिक को उठाया और उससे कहा कि बड़ी कृपा होगी, एक खूंटी और एक रस्सी हमें चाहिए, हमारी खो गई है। निन्यानबे ऊंट बंध गए, सौवां अनबंधा है–अंधेरी रात है, वह कहीं भटक सकता है। उस बूढ़े आदमी ने कहाः घबड़ाओ मत। मेरे पास न तो रस्सी है, और न खूंटी। लेकिन बड़े पागल आदमी हो। इतने दिन ऊंटों के साथ रहते हो गए, तुम्हें कुछ भी समझ न आई। जाओ और खूंटी गाड़ दो और रस्सी बांध दो और ऊंट को कह दो–सो जाए। उन्होंने कहाः पागल हम हैं कि तुम? अगर खूंटी हमारे पास होती तो हम तुम्हारे पास आते क्यों? कौन सी खूंटी गाड़ दें? उस बूढ़े आदमी ने कहाः बड़े नासमझ हो, ऐसी खूंटियां भी गाड़ी जा सकती हैं जो न हों, और ऐसी रस्सियां भी बांधी जा सकती हैं जिनका कोई अस्तित्व न हो। तुम जाओ, सिर्फ खूंटी ठोकने का उपक्रम करो। अंधेरी रात है, आदमी धोखा खा जाता है, ऊंट का क्या विश्वास? ऊंट का क्या हिसाब? जाओ ऐसा ठोको, जैसे खूंटी ठोकी जा रही है। गले पर रस्सी बांधों, जैसे कि रस्सी बांधी जाती है। और ऊंट से कहो कि सो जाओ। ऊंट सो जाएगा। अक्सर यहां मेहमान उतरते हैं, उनकी रस्सियां खो जाती हैं। और मैं इसलिए तो रस्सियां-खूंटियां रखता नहीं, उनके बिना ही काम चल जाता है। मजबूरी थी, उसकी बात पर विश्वास तो नहीं पड़ता था। लेकिन वे गए, उन्होंने गड्ढा खोदा, खूंटी ठोकी–जो नहीं थी। सिर्फ आवाज हुई ठोकने की, ऊंट बैठ गया। खूंटी ठोकी जा रही थी। रोज-रोज रात उसकी खूंटी ठुकती थी, वह बैठ गया। उसके गले में उन्होंने हाथ डाला, रस्सी बांधी। रस्सी खूंटी से बांध दी गई–रस्सी, जो नहीं थी। ऊंट सो गया। वे बड़े हैरान हुए! एक बड़ी अदभुत बात उनके हाथ लग गई। सो गए। सुबह उठे, सुबह जल्दी ही काफिला आगे बढ़ना था। उन्होंने निन्यानबें ऊंटों की रस्सियां निकालीं, खूंटियां निकालीं–वे ऊंट खड़े हो गए। और सौवें की तो कोई खूंटी थी नहीं जिसे निकालते। उन्होंने उसकी खूंटी न निकाली। उसको धक्के दिए। वह उठता न था, वह नहीं उठा। उन्होंने कहाः हद हो गई, रात धोखा खाता था सो भी ठीक था, अब दिन के उजाले में भी! इस मूढ़ को खूंटी नहीं दिखाई पड़ती कि नहीं है? वे उसे धक्के दिए चले गए, लेकिन ऊंट ने उठने से इनकार कर दिया। ऊंट बड़ा धार्मिक रहा होगा। वे अंदर गए, उन्होंने उस बूढ़े आदमी को कहा कि कोई जादू कर दिया क्या? क्या कर दिया तुमने, ऊंट उठता नहीं। उसने कहाः बड़े पागल हो तुम, जाओ पहले खूंटी निकालो। पहले रस्सी खोलो। उन्होंने कहाः लेकिन रस्सी हो तब…। उन्होंने कहाः रात कैसे बांधी थी? वैसे ही खोलो। गए मजबूरी थी। जाकर उन्होंने खूंटी उखाड़ी, आवाज की, खूंटी निकली, ऊंट उठ कर खड़ा हो गया। रस्सी खोली, ऊंट चलने के लिए तत्पर हो गया। उन्होंने उस बूढ़े आदमी को धन्यवाद दिया और कहाः बड़े अदभुत हैं आप, ऊंटों के बाबत आपकी जानकारी बहुत है। उन्होंने कहा कि नहीं, यह ऊंटों की जानकारी से सूत्र नहीं निकला, यह सूत्र आदमियों की जानकारी से निकला है। _आदमी ऐसी खूटियों में बंधा होता है जो कहीं भी नहीं हैं।
और ऐसी रस्सियों में जिनका कोई अस्तित्व नहीं है। और जीवन भर बंधा रहता है। और चिल्लाता हैः
मैं कैसे मुक्त हो जाऊं ?
कैसे परमात्मा को पा लूं, कैसे आत्मा को पा लूं?
मुझे मुक्ति चाहिए, मोक्ष चाहिए–चिल्लाता है।
या कोई भी काम जो करना चाहता है लेकिन कर नही पाता
*और हिलता नहीं अपनी जगह से, क्योंकि खूंटियां उसे बांधे हैं।*
वह कहता हैः कैसे खोलूं इन खूटियों को?

Living in false illusions

These are invisible chains confine/stop us to unlock true potential of our life in all walks of life …

प्रेम और भक्ति का स्त्रोत

“यदि परमात्मा कि दया न हो तो हमे उससे बिछुड़ने का दुख महसूस ही नहीं होता और न ही वापस अपने असली घर जाने की इच्छा होती है। उस कुल मालिक की कृपा के बिना न तो हमारा सतगुरु से मिलाप हो सकता है और न ही हम उसके बताएं हुए मार्ग पर चल सकते है।” – महाराज चरन सिंह

अनंत जन्मों के शुभ कर्मो और परमात्मा की दया मेहर द्वारा हमे सतगुरु की संगति प्राप्त होती है। हमारे जन्म लेने के समय से सतगुरु हमारे अंग संग रहते है। सतगुरु हमारे सच्चे साथी है। जब भी हम पर दुख और निराशा छा जाती और हमारी परिस्थिति बद से बदतर हो जाती है, सतगुरू हमारे साथ रहते है। सतगुरु इस प्रतीक्षा में है कि कब हमे इस भ्रम का ज्ञान हो जिसमें हम जिंदगी बिता रहे है।

“सतगुरु केवल शिष्य के जीवन में ही उसका मार्ग दर्शन नहीं करता, बल्कि शिष्य की मृत्यु के समय और मृत्यु के बाद भी उसके साथ रहता है” – महाराज चरन सिं

देहधारी सतगुरू हमे परमात्मा रूपी परम सत्य के साथ जोड़ने वाली कड़ी है। संत हमे बार बार इस बात पर जोर देते है कि सबसे पहले यह निश्चिंत कर लेना जरूरी है कि संत मत के उपदेश हमारी समझ में आ गए है, यह उपदेश तर्क की कसौटी पर खरे उतरते है और हमे इसमें सच्चाई नजर आती है। ऐसा नहीं करेंगे तो न ही इस उपदेश के साथ और न ही सतगुरु के साथ पूरा न्याय कर सकेगे। सभी शंकाओं का समाधान हो जाने पर हमे पूरा भरोसा हो जायेगा कि यह मार्ग भी सही है और इस मार्ग पर ऑगुवाई करनेवाला गुरु भी पूर्ण है। पूरा विश्वास होने पर हमे दृढ़ता से अपना भजन सिमरन निरंतर करते रहने में सहायता मिलेगी और भजन सिमरन में निरंतरता से हमे संतुलन, शांति और स्थिरता प्राप्त होगी जो हमारी रूहानी उन्नति में सहायक सिद्ध होगी।

हमे अपने अंदर सतगुरु के उपदेश का अंत तक पालन करने की दृढ़ता और धेर्य पैदा करना है और इस बात का ध्यान रखना है कि महत्व उनके व्यक्तित्व से अधिक उनके उपदेश की सत्यता का है। इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि सतगुरु देह स्वरूप में हम इतना न खो जाए कि यह भी भूल जाएं कि हमारा वास्तविक सतगुरु नाम या शब्द रूप है।

मांगने योग्य दात

संतान, संपत्ति, शोभा, आदर आदि कई चीजों के लिए हमारे हाथ प्रार्थना में उठते रहते है, पर इस दिशा में प्राप्तियों का नतीजा अंत में दुखो, क्लेशों में निकलता है: “देदा दे लेदे थक पाहि” (आदि ग्रंथ पृष्ठ स २) अगर दातार प्रभु से कुछ मांगने की कामना हो तो और सब कुछ छोड़कर एक नाम ही मांगना चाहिए, क्योंकि नाम के मिलने से सब कुछ मिल जाता है, हर प्रकार की भूख मिट जाती है:

गुरू अर्जुन देव जी फरमाते है : विण तुध होर जे मंगण सिर दुखा कै दुख।। देह नाम संतोखिया, उतरे मन की भुख।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ९५८)

धर्म पुस्तकों ने अमृत की बहुत ही बड़ाई की है, खासकर इसीलिए कि उसे पीने वाला मरता नहीं, जब कि नाम एक साधारण मनुष्य को देवता, खुद प्रभु बना देने का सामर्थ्य रखता है, और यह नाम के अनेक गुणों में से एक है। नाम को साधारण नामों से अलग करने के लिए अमृत नाम कहा जाता है क्योंकि उसके योग्य, उस पर पूरी तरह फ़बने वाला कोई विशेषण आज तक किसी को सूझा ही नहीं।

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