गुरु- ज्ञान, गुरुमत

गुरु- ज्ञान, गुरुमत या संत मत का अर्थ है – गुरुओं और संतो महात्माओं द्वारा बताया गया प्रभु की प्राप्ति का मार्ग या साधन है। संत महात्मा समझाते है कि जिस परमात्मा ने संसार को चलाने के सब नियम बनाए है, उसने अपने साथ मिलाप या मार्ग या साधन भी सृष्टि के आरम्भ में स्वय बना दिया था।

आदि ग्रंथ, पृष्ठ स ११२२ पर गुरु अर्जुन देव जी फरमाते हैं: मारग प्रभ का हर किआ संतन संग जाता।।

प्रभु से मिलाप का यह मार्ग संतो का बनाया हुआ नहीं, स्वयं प्रभु का बनाया हुआ है, संत महात्मा सिर्फ इसे प्रकट करते है।

संत महात्मा हमे समझाते है कि यह मार्ग अनादि, न बदलने वाला और सबके लिए समान है। परमात्मा द्वारा बनाया गया हर नियम देश काल की सीमाओं से ऊपर होता है। इसी प्रकार परमात्मा के द्वारा अपने मिलाप के लिए बनाया गया साधन और मार्ग भी देश, जाति और धर्म के हर तरह के भेद भाव से ऊपर है।

गुरुमत अनादि है। यह भवसागर से पार होने और परमपद की प्राप्ति का एकमात्र सच्चा साधन है। गुर मत धारण किए बिना न मुक्ति मिल सकती है और न ही परम सुख की प्राप्ति हो सकती है।

रामचरित मानस (1:26:1)में गोस्वामी तुलसीदास जी समझाते है : चहुं जुग तीनि काल तिहु लोका। भए नाम जप बिसोका।। बेद पुरान संत मत एहु। सकल सुकृत फल राम सनेहु।।

सारी सृष्टि में हमेशा से नाम ही जीव की मुक्ति का साधन रहा है। वेदों, पुराणों में भी नाम की महिमा है और संत मत भी इसी बात पर जोर देता है कि नाम से लिव जोड़ना सबसे उत्तम आध्यात्मिक करनी है और जीवात्मा केवल नाम द्वारा ही परमात्मा से मिलाप कर सकती है।

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सूफी संत

शम्स तब्रेज के कलाम में आता है : यदि तू रब्ब का दीदार करना चाहता है तो उन ( संतो ) के चरणों की धूलि को अपनी आंखों का सुरमा बना क्योंकि उनमें जन्म से अंधे को भी आंखें दे सकने की सामर्थ्य है । अंधों से आपका भाव ऐसे लोगों से हैं जिनको सर्वव्यापक परमात्मा कहीं नजर नहीं आता।

यहां आंख देने का भाव वह हमे अपने अंतर का ज्ञान देते है जिससे हमे सर्वव्यापक परमात्मा नजर आने लगता है।

आदि ग्रंथ में गुरु रामदास जी

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संगति

संत कबीर

जीव पर संगति का गहरा प्रभाव पड़ता है। हम अच्छे लोगो की संगति में अच्छे और बुरे लोगो की संगति में बुरे बन जाते है। व्यावहारिक जीवन में देखते है कि अगर हम चोरों, नशा करने वालो, जुवारियो आदि की संगति में रहते है, तो हमारे अंदर भी वैसे संस्कार और वैसी आदते पैदा हो जाती है। जब बच्चा बड़ा होकर घर से बाहर पाव रखता है, तो माता पिता उसे सबसे पहले बुरे लोगो की संगति से बचने का उपदेश देते है।

संत मत में कुसंगती का अर्थ बुरे लोगो की संगति ही नहीं है। कुसंगती से भाव दुनियादारो और मनमुखो की संगति भी है। दुनियादार और मनमुख जब भी बात करते है, इस दुनिया, इसके शक्लों पदार्थो, मायावी धंधों, कोमो, मजहबों, मुल्कों के झगड़ो आदि की ही करते हैं। ऐसे लोगो की संगति में भूले भटके भी मन प्रभु भक्ति या प्रभु प्रेम की ओर जा ही नहीं सकता। जैसे काजल की कोठरी में जाने से काजल का दाग लग जाना स्वाभाविक है, इसी तरह मन्मुखो की संगति में में पर माया की मलीनता का प्रभाव होना स्वाभाविक है।

फारसी की कहावत है ” हर किह काने नमक आयद नमक शवद “

यानी जो कुछ भी नमक खान मै जाता है, नमक बन जाता है। दुर्जनो की संगति में जीव प्रभु को भूल जाता है, उसका प्रभु के नाम की ओर ध्यान ही नहीं जाता और वह कई प्रकार के पापो और विकारों में लिप्त हो जाता है। वह प्रभु द्वारा संसार मे भेजे जाने के अपने असल मकसद को भूल जाता है। नतीजा यह होता हैं कि वह माया की दलदल में धसकर सदा चौरासी की चक्की में पिसता रहता है। इसीलिए संत महात्मा साधक को प्रभु भक्ति और परमार्थ में उन्नति के लिए कुसंगति से बचने और सत्संगती में रहने का उपदेश देते है।

संतो महात्माओं ने कुसंगति को नरक का द्वार कहा है, तो सत्संग को सतलोक में पहुंचने का साधन माना है। संत समझाते है कि संतो कि संगति चंदन के वृक्ष के समान है। जिस जंगल में चंदन होता है, उसके आप पास के सब वृक्षों में से चंदन की सुगंध आने लगती है। संतो का ध्यान हमेशा प्रभु में लीन रहता है। संत प्रभु प्रेम और प्रभु भक्ति की ऐसी अलौकिक किरणे नकलती है जिनका उनकी संगति में आने वाले हर जीव पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

इसीलिए संत महात्मा हमे प्रभु प्रेम और प्रभु भक्ति से दूर ले जाने वाले लोगो की संगति से बचने और ऐसे प्रभु भक्तों की संगति खोजने का उपदेश देते है जिससे हमारा ध्यान प्रभु, प्रभु भक्ति और नाम की कमाई की तरफ जाए।

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Divine music

Vani recorded in Adi Granth has been instructed to sing according to different ragas.  When speech is sung, even if the speech is not fully understood, then that kirtan brings peace to the mind and meditation goes to the God, in whose glory the kirtan is performed.  The singing that we hear and remember the true love, and the yearning of his peace is born, that singing is blessed.  But our true benevolent benefit can only be gained by turning our attention inwards and adding live in the name of the Lord.

Guru Amardas ji has warned on page 7 in the Adi Granth: Get rid of raga nad, Hari seviye ta dargah.  Nanak Gurmukh Bram Bachariya has already expressed mind.

You do not condemn the sound of raga, you are narrating its limits.  You are preaching that there should not be any misconception that our work will be completed only by singing or singing of speech.  Kirtan of speech is the beginning, not the end.  You preach “Hari Seva” and Gurmukh Bram Bachariya, that is, do not just stop till the raga nad, but according to the Gurmukh’s preaching, keep the mind in devotion to Hari so that you can overcome ego and reconcile to God.  Guru Sahib warns that people are singing ragi from outside and people are listening, but the listener’s mind is somewhere else.  This leads to loss rather than profit.  In the same way that the farmer plows the bull to give water from the well to the fields, but they should graze his field.

Behind the eyes inside every living being, the sweet sounds of the soundless word are echoing.  According to the method explained by the Satguru, if your attention is concentrated and fixed behind the eyes, those sounds start to be heard inside.  The instruments outside are closed after getting time and those outside are also tired, but the ragas inside never stop.

The Yamadoots take the fruits of every other kind of robbery, but if the soul attaches to that serene kirtan for a moment, then the soul is liberated forever from the shackles of birth and death.

कीर्तन, राग- नाद (Divine Music)

आदि ग्रंथ में दर्ज वाणी को अलग अलग रागों के अनुसार गाने की हिदायत की गई है। जब वाणी का गायन किया जाता है तो वाणी की पूरी समझ न भी आए, तब भी उस कीर्तन से मन को शांति मिलती है और ध्यान उस परमेश्वर की तरफ जाता है, जिसकी महिमा में कीर्तन किया जाता है। जिस गायन को सुनकर हमे उस सच्चे प्रीतम की याद आए और मन में उसके मिलाप की तड़प पैदा हो, वह गायन धन्य है। परन्तु हमे सच्चा परमार्थी लाभ अपने ध्यान को अंतर्मुख करके प्रभु के नाम से लिव जोड़ने से ही प्राप्त हो सकता है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ८४९ पर गुरु अमरदास जी ने चेतावनी दी है : राग नाद छोड हरि सेविए ता दरगह पाइए मान।। नानक गुरमुख ब्रहम बीचारिए चुके मन अभिमान।।

आप राग नाद की निन्दा नहीं करते, उसकी सीमा बयान कर रहे है। आप उपदेश कर रहे है कि इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि केवल वाणी के कीर्तन या गायन द्वारा हमारा कार्य पूरा हो जाएगा। वाणी का कीर्तन शुरुवात है, अंत नहीं। आप ” हरि सेवाएं” और गुरमुख ब्रहम बीचारिए का उपदेश देते है, यानी सिर्फ राग नाद तक ही न रुके रहो, बल्कि गुरमुखो के उपदेश के अनुसार मन को हरि की भक्ति में लगाओ ताकि अहंकार को दूर करके परमेश्वर से मिलाप कर सको। गुरु साहिब सावधान करते है कि बाहर से रागी राग गा रहे होते है और लोग सुन रहे होते है, लेकिन सुनने वाले का मन कहीं ओर ही होता है। इससे लाभ की जगह हानि होती है। यह उसी तरह जिस तरह किसान कुएं से खेतों में पानी देने के लिए बैल जोतता है, पर वे उसका खेत ही चर जाए।

हर जीव के अंदर आंखो के पीछे अनहद शब्द की मीठी ध्वनियां गूंज रही है। सतगुरु की समझाई विधि के अनुसार अपना ध्यान आंखो के पीछे एकाग्र और स्थिर किया जाए तो वे ध्वनियां अंदर सुनाई देने लगती है। बाहर बाजे तो समय पाकर बंद हो जाते है और बाहर बाजे वाले भी थक जाते है , पर अंदर के राग कभी बंद नहीं होते।

हर प्रकार की दूसरी करनी का फल यमदूत लूटकर ले जाते है, पर अगर आत्मा पल भर के लिए अंदर उस निर्मल कीर्तन से जुड़ जाए तो जीवात्मा सदा के लिए जन्म मरण के बंधनों से आजाद हो जाती है।

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काल- भाग 2( Negetive Power)

आत्मा अब तक काल के देश से निकलकर सतलोक नहीं जा सकी, इसका कारण कल नहीं, बल्कि हमारे खुद के किए हुए कर्म ही है। काल तो उस परमात्मा का हुक्म मानकर, रचना के नियमो के अनुसार हमारे किए हुए कर्मो का ही फल हमे दे रहा है। वह तो परमात्मा का सच्चा सेवक है को अपने मालिक कि आज्ञा का ईमानदारी से पालन कर रहा है। प्रश्न किया जा सकता है कि परमात्मा ने काल कि रचना क्यो की?

स्वामी जी महाराज ने सारबचन छंद बंध, २६: प्रश्न २:७७ में इसका उत्तर दिया है आप फरमाते है: काल रचा हम समझ बूझ के। बिना काल नहि खोफ़ जीव के।।

आप समझाते है कि उस परमात्मा ने को कुछ किया है, उसमे भेद है और जो कुछ किया है, जीव की भलाई के लिए किया है। अगर जीव को मृत्यु या किए हुए कर्मो का फल मिलने का डर न हो तो वा ठीक रास्ते पर चलने, गलत कार्यों से बचने और जीवन को मुख्य उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करने कि कभी कोशिश नहीं करेगा।

काल न आत्मा को पैदा कर सकता है ना ही उसका विनाश का सकता हैं। वह आत्मा को केवल शरीर रूपी पिंजरे में कैद करके इस मृत्यु लोक में फसाकर रखता है। ताकि आत्मा अपने असली घर सतलोक ना जा सके। इसके लिए उसने अपने एजेंट मन को आत्मा के साथ लगाया हुआ है जो आत्मा को इन्द्रियों के घाट पर लाकर उससे तरह तरह के कर्म करवाता है और बहार्मुखी कर्मकांडो और शरीयतो में फसाकर उसे सच्ची प्रभु भक्ति की तरफ नहीं जाने देता।

आदि ग्रंथ पृष्ठ स ३८ में गुरु अमरदास जी फरमाते है: धरम राई नो हुकम है बहि सच्चा धरम विचार।। दूजे भाई दुसत आतमा अोह तेरी सरकार।।

काल का हुक्म सिर्फ उन जीवों पर ही चलता है जो परमात्मा को भुलाकर और रचना के प्रेम में खोकर यहां अनेक प्रकार के कर्मो में लगे रहते हैं।

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काल – भाग 1 (Negetive power)।

आत्मा परमात्मा की अंश है इसके अंदर अपने मूल के प्रति कुदरती कशिश है, पर इस मृत्यु लोक में कुछ ऐसी शक्तियां भी है जो जीवात्मा को रचना के प्रेम में फसाकर परमात्मा से मिलाप के रास्ते में रुकावटें पैदा करती है। इन शक्तियों को काल, मन और माया का देश कहा जाता है।

संसार परमात्मा का खेल है और काल इस खेल को जारी रखने का मुख्य साधन है। परमार्थ का यह गहरा रहस्य केवल पूर्ण संतो ने ही खोला है कि काल द्वैत, विरोध और विनाश की वह शक्ति है जो परमात्मा की मौज से संसार में कार्य कर रही है। संत महात्मा हमे समझाते है कि यह रचना भी दयाल की बनाई हुई है, काल भी दयाल का बनाया हुआ है और जिन नियमों के अनुसार यह रचना चल रही है, वह नियम भी दयाल के ही बनाए हुए है।

काल, अकालपुरूष से ही शक्ति लेकर सृष्टि की रचना करता है या यह भी कहा जा सकता है कि परमात्मा द्वारा रची गई सृष्टि पर काल का पहरा है। स्वामी जी महाराज त्रिलोकी को चौपड़ के खेल के समान बताते हुए कहते है: माया काल बिछाया जाल। अपने स्वराथ करें बेहाल।। कोई गोट न जावे घर को। यहां ही खेल खिलावे सब को।। (सारबचन संग्रह, २२:१:१७-१८)

आप कहते है कि इस खेल में एक तरफ जीवात्मा है और दूसरी तरफ काल और माया है। काल और माया ने तीन गुणों, कर्म और फल, आशा – तृष्णा और इन्द्रियों के भोगों का जाल बिछाकर जीव रूपी गोट को इसमें कैद किया हुआ है ताकि यह रचना रूपी चौपड़ को जीतकर सतलोक रूपी निज घर वापस न जा सके, क्योंकि इस तरह उनका देश सुनसान हो जाएगा।

संत हमे समझाते है कि मृत्यु लोक तो एक तरफ़, इंद्रपुरी, विष्णुपुरी और शिवपुरी पर भी काल का पहरा है। सब देवी देवता भी काल के अधीन है। इनकी पूजा और भक्ति कभी किसी को परमात्मा से नहीं मिला सकती। काल समय, परिवर्तन, मृत्यु या विनाश और कर्मो का फल देने वाली शक्ति का सूचक है। कर्मों का फल देने वाली शक्ति को काल भी कहा गया है और धर्मराज भी।

Continue…..

कर्म सिद्धांत भाग-2

कर्मो को आम तौर पर पुण्यो और पापो में बांटा जाता है। मन, वचन और कर्म के द्वारा किसी को सुख देना पुण्य है और मन,वचन और कर्म द्वारा किसी को दुख देना पाप है। मगर पुण्य कभी भी पापो का नाश नहीं कर सकते। पुण्य, पुन्यो के और पाप, पापो के लेखे में जमा होते है और दोनों प्रकार के कर्मो के भुगतान के कारण मनुष्य चौरासी का हिस्सा बना रहता है।

कर्मो को तीन भागों में बाटा गया है – प्रारब्ध, क्रियामान और संचित।

प्रारब्ध कर्म: पिछले जन्मों के आधार पर इस जन्म में भोगने के लिए मिले कर्म, प्रारब्ध कर्म कहलाते है। प्रारब्ध अटल है। “नाह नाह मिटत भावनी जो लिखी देवे निरंजना” और अनकिए लागे नहीं, किए ना बिरथा जाय।”। कर्म अवतारों को भी भोगने पड़ते है। श्री रामचन्द्र जी ने छिपकर बाली को तीर मारा था। जब आपने भगवान कृष्ण के रूप मै अवतार धारण किया, तो बाली ने भील के रूप में आप पर तीर चलाया। केवल परमेश्वर के हुक्म से जीवों के उद्धार के लिए सतलोक से मृत्यु लोक में उतरे पूर्ण संत, कर्मो के बंधन से मुक्त होते है। वे कर्मो के कारण नहीं, सतपुरूष के हुक्म से जीवों के उद्धार के लिए संसार में आते है।

क्रियमान कर्म: प्रारब्ध कर्म भुगतने हुए जो नये कर्म करते है, उन्हें क्रियमान कर्म कहते है। आज के क्रियमान कर्म अगले जन्मों का प्रारब्ध बन जाएंगे।

संचित कर्म: हम एक जन्म में अनेक कर्म करते है, पर बहुत कम कर्मो का फल भोगते है, जिस कारण हर जन्म के बिना भोगे कर्म जमा होते रहते है। इन्हे संचित कर्म कहा जाता है।

मनुष्य का असली बंधन उसके कर्म है क्योंकि जब तक सारे कर्मो का नाश नहीं होता, आत्मा बंधन मुक्त नहीं हो सकती।

कर्मो से छुटकारे का एक मात्र साधन पूर्ण सतगुरु की शरण और नाम की कमाई है। जैसे जैसे जीव सतगुरु के उपदेश के अनुसार अपनी लिव अंतर में नाम या शब्द से जोड़ता है, आत्मा पर चढ़ी कर्मो की मैल उतरती जाती है।

पलटू साहिब की बानी, भाग २, पृष्ठ स ८५

करम बंधा संसार बंधावे आप से। जमपुर बांधा जाय करम की फांस से।। कोई न सके छुड़ाय रस्सा यह मोट है। अरे हां पलटू संतन डारा काट, नाम की ओट से।।

जीव नाम की कमाई द्वारा ही कर्मो का भण्डार नष्ट करके परमात्मा से मिलाप के काबिल बन जाता है।

Quote of the Day 24.07.20

Quote of the Day
“Love is the master key which opens the gates of happiness.”
— Oliver Wendell Holmes —

हर ख़ुशी की चाभी प्यार है। प्यार में ऐसी जादूगरी है कि उससे हर खुशी मिल सकती है पर शर्त है बिना स्वार्थ का प्यार हो। जिसमे सिर्फ देने की 100% कोशिश हो ,पर पाने की तम्मना ना हो।

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