ये मध्यम वर्गीय के ऊपर बनाया गया वीडियो है। बहुत इंस्पायर करता है। दिल को छू लेने वाला है।
Quote of the Day
Quote of the Day
“The future has several names. For the weak, it is impossible; for the fainthearted, it is unknown; but for the valiant, it is ideal.”
— Victor Hugo —
कर्म सिद्धांत भाग-1

संसार में सभी संतो ने कर्मो और फल के सिद्धांत को बताया है। संतो महात्माओं ने संसार को कर्म भूमि या “करमा संदडा खेत” (गुरु नानक देव जी , आदि ग्रंथ पृष्ठ स १३४ में कहा है।)
तुलसी दास, रामचरितमानस (२:२१८:२) में उन्होंने कहा है: “करम प्रधान बिस्व कर राखा। जो जस करई सो तस फल चाखा।।” मृत्यु लोक से लेकर नर्को स्वर्गो तक और मनुष्य से लेकर देवी देवताओं तक सभी जीव कर्म और फल के कानून के अधीन बार बार पैदा होते है और मरते है और किए हुए कर्मो का फल भोगते है। नरक, घोर पाप और और स्वर्ग, श्रेष्ठ पुण्यो के भुगतान का साधन है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ४३३ पर गुरु नानक साहिब कर्म और फल के बारे में समझाते है:” ददे दोस न देऊ किसे, दोस करमा आपणिया।। जो मै किया सो मै पाईया, दोस ना दीजै अवर जना।।
परमात्मा को दोष देने के स्थान पर यह समझने का यत्न करना चाहिए कि परमात्मा ने मन मर्जी से नहीं, हमारे पहले किए हुए कर्मो के आधार पर हमारी किस्मत लिखी है। काया के बिना कर्म नहीं और कर्म के बिना काया नहीं। सुख दुख, रिश्ते नाते, अमीरी गरीबी, मान अपमान आदि सबका आधार हमारे अपने पहले किए हुए कर्म है।
भागवत पुराण में भगवान कृष्ण उधो को उपदेश करते है कि जो कीड़ा तुम सामने जाता हुआ देख रहा है, यह अपने किये हुए कर्मो के कारण कई बार ब्रम्हा और इन्द्र बन चुका है। महाभारत में आता है कि महाराज ध्रतराष्ट्र अपने एक सौ छ जन्म पहले किए हुए कर्म के कारण अंधे पैदा हुए थे।
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एक के लिए एक ही रास्ता

संत महात्मा हमे उपदेश करते है कि परमेश्वर प्राप्ति का साधन और मार्ग मनुष्य द्वारा बनाया हुआ नहीं, परमात्मा द्वारा ही बनाया गया है।
आदि ग्रंथ पृष्ठ स ११२२ पर गुरु अर्जुन देव जी फरमाते है : “मारग प्रभ का हरि किया संतन संग जाता।।” यह साधन और मार्ग एक, अनादि और सर्वसांझा है। इसमें न कभी परिवर्तन हुआ है और न ही हो सकता है।
संत महात्मा हमे उपदेश करते है की जब सबने एक ही परमेश्वर मिलाप करना है, वह परमेश्वर और उससे मिलाप का मार्ग हर एक के अंदर है, तो यह किसकी अक्ल में आता है कि परमात्मा ने हिन्दुओं के अंदर अपने मिलने का कोई एक साधन और मार्ग रखा हो और मुसलमानों, सिखों, ईसाईयों के अंदर कोई दूसरा साधन और मार्ग रखा हो। जो लोग संतो के उपदेश के मुताबिक अंतर में खोज करते है, उनके लिए एक ही साधन और मार्ग है। जो मन बुद्धि द्वारा बाहर खोज करते है, वे अनेक साधनों और मार्गो में भटकते रहते है, उनके हाथ पल्ले कुछ नहीं पड़ता। जब तक हम अपने मन की मत त्यागकर स्वय ईश्वर द्वारा अपने साथ मिलाप के लिए बनाए अंतर्मुख साधन को नहीं अपनाते, हम कभी अपने साथ मिलाप नहीं कर सकते।
उस प्रभु ने स्वय यह साधन और मार्ग बनाया है कि जीव जब भी प्रभु से मिलाप कर सकेगा, शब्द या नाम की कमाई द्वारा कर सकेगा और शब्द या नाम की प्राप्ति संत सतगुरु द्वारा होगी। इसीलिए हमें कोमो, मजहबों, मुल्कों के छोटे छोटे दायरों और मनुष्य द्वारा बनाए भेदभाव से ऊपर उठकर शब्द रूपी अंतर्मुख सच्ची एकता में आने की कोशिश करनी चाहिए।
ऋद्धि- सिद्धि और करामात
पिंड के छः चक्रों की साधना, योग – अभ्यास, कुण्डलिनी जगाने, प्राणायाम आदि द्वारा अभ्यासी को ऋद्दिया सिध्दियां और करामाते हासिल हो जाती है, जिनसे वह अलौकिक कार्य भी कर सकता है। संत महात्मा समझाते है कि ऋद्दिया सिध्दियां और करामाते मन माया का खेल है। यह काल द्वारा आत्मा को संसार में फसाए रखने के लिए बुना महाजाल है। ऋद्दिया सिध्दियो का विशुद्ध रूहानियत से कोई सम्बन्ध नहीं है।
आदि ग्रंथ पृष्ठ स ६ गुरु नानक साहिब कहते है: आप नाथ नाथी सभ जा की रिधि सिद्धि अवरा साद।। यानी ऋद्दिया सिध्दियां उस कुल मालिक के मालिक से मिलानेवाले आनंद का मुकाबला नहीं कर सकतीं।।
संतो का असल ध्येय करामाते दिखाना नहीं होता। संत परमात्मा का रूप होते है। वे कुछ भी कर सकते है, लेकिन वे जब तक देह में रहते है, अपने आपको छिपाकर रखते है। वे परमात्मा के दास बनकर रहने में खुशी महसूस करते है, उसके शामिल होने में नहीं। ऋद्दि सिध्दि द्वारा किसी को कुछ देना, यह सिद्ध करना है कि देख, तुझे परमात्मा ने जो कुछ नहीं दिया था, मैने दे दिया है।
ऋद्दिया सिध्दियां सांसारिक प्राप्तियों का साधन हो सकती है, रूहानी तरक्की का नहीं। करामाते दिखाने से होमे ( अहंकार) में वृद्धि होती है, घोर तपस्या से की गई कमाई व्यर्थ चली जाती है और आगे की रूहानी तरक्की बंद हो जाती है। सच्चे परमार्थी का लक्ष्य परमात्मा से मिलाप करना होता है। ऋद्दिया सिध्दियां इस लक्ष्य की प्राप्ति में बड़ी रुकावट साबित होती है।
स्वामी जी महाराज कहते है: नाम रस पियो रहो हुशियार। ऋद्धि और सिद्धि रहे तेरे द्वार।। करो मत उनको अंगीकार। वहां से आगे धरो पि़यार।। सारबचन संग्रह , १९:२०:१०-११
आप साधक को सावधान करते है कि नाम की कमाई से भी अलौकिक ऋद्दिया सिध्दियां प्राप्त हो जाती है, लेकिन कभी भूलकर भी इनके निकट नहीं जाना चाहिए, बल्कि नाम की कमाई द्वारा प्राप्त हुई शक्ति को और अधिक रूहानी तरक्की के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
इच्छाएं- तृष्णाए

संतमत के अनुसार इच्छाएं तृष्णाएं ही हमारे बंधन का वास्तविक कारण है। सागर की लहरों की भांति इच्छाएं तृष्णाएं हमारे मन में रोज नई तरंगे पैदा करती रहती है। सारा संसार इनके चक्र में फसकर दिन रात माया के धंधों में लगा रहता है। हम इन इच्छाएं तृष्णाएं के अधीन होकर किए गए कर्मो के कारण इस चौरासी के चक्र में फसे रहते है। हम बार बार इन्ही इच्छाओं और तृष्णाओ के कारण पैदा होते है और मरते है पर ये इच्छाएं तृष्णाएं कभी नहीं मरती है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स २६ पर गुरु अमरदास जी फरमाते है : जे लख इसतरिया भोग करहि नाव खंड राज कमाही।। बिन सतगुरु सुख न पावई फिर फिर जोनी पाहि।।
आप समझाते है कि इंसान को चाहे सारे संसार का राज पाट मिल जाए, संसार के भोग पदार्थ मिल जाए और सैकड़ों सुंदर स्त्रियों का साथ प्राप्त हो जाए, फिर भी उसकी इच्छाएं तृष्णाएं शांत नहीं हो सकती। बल्कि इच्छाएं तृष्णाएं की और अधिक लहरे उठती रहती है। ये इच्छाएं तृष्णाएं ही सब दुखो का मूल कारण है। इच्छा का बीज बहुत छोटा होता है, पर इसकी पूर्ति के लिए लंबे दुखदाई संघर्ष से गुजरना पड़ता है। न कभी इच्छाएं तृष्णाएं खत्म होती है और न ही इंसान के दुख खत्म होते है।
जब तक मन को इन्द्रियों के भोगों और विषय विकारों से ऊंची लज्जत नहीं मिलती, ये कभी भी सांसारिक वस्तुओं की इच्छाओं त्रिष्णाओ से मुक्त नहीं हो सकता। इसे विषय वासनाओं और संसार की कामनाओं से मुक्त करने वाला सार पदार्थ प्रभु का नाम है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ८५० पर गुरु अमरदास जी फरमाते है : गुर का सबद अमृत है सभ त्रिसना भूख गवाए।। हरि रस पी संतोख होआ, सच वसिआ मन आए।।
आप समझाते है कि जब गुरु के उपदेश के अनुसार मन को अंतर में शब्द या नाम रूपी अमृत में लीन करते है, तो इसकी हर प्रकार कि भूख शांत हो जाती है, इसके अंदर सच्चा संतोष आ जाता है और आत्मा, परमात्मा रूपी सत्य में समाकर उसका रूप बन जाती है। इस तरह साधना करने वाला इच्छा तृष्णा से आजाद होकर परम आनंद के सहज धाम को प्राप्त कर लेता है।
आत्मा क्या है?

संत महात्मा हमे बताते है कि हमारी हस्ती का आधार मन इन्द्रियां या शरीर नहीं, आत्मा है। मन, इन्द्रियां जड़ और नाशवान है, पर आत्मा उस कर्ता पुरुष का अंश होने के कारण उसकी तरह ही चेतन, अमर, अविनाशी और अजन्मी है। कह कबीर इहू राम की अंस । ( कबीर साहिब, आदि ग्रंथ पृष्ठ स 871) असल में आत्मा, परमात्मा की तरह शक्ति रूप, ज्ञान रूप और आनंद रूप है। परमात्मा की अंश है।
भागवत गीता में (2:23) : इसे न तलवार काट सकती है, न आग जला सकती है और न ही पानी इसे गला सकता है।
यह असल में सहज आनंद और पूर्ण ज्ञान के अजर और अमर धाम सतलोक की रहने वाली है। स्वामी जी महाराज (14:2:2) पुरुष अंस तू सतपुर बासी । यह इस्त्री पुरुष, बच्चे बूढ़े, काले गोरे, हिन्दू मुसलमान, अमरीकन अफ्रीकन के भेद – भाव से ऊपर है।
जिस प्रकार ठंडे देश के निवासी को उस देश के वातावरण के अनुसार और अंतरिक्ष में जाने वाले यात्री को अंतरिक्ष के वातावरण के अनुसार कपड़े पहनने पड़ते है, उसी तरह, आत्मा अपने असल रूप में इस मायावी जगत में नहीं रह सकती है और न ही यह जगत निर्मल आत्मा के तेज प्रकाश को सहन कर सकता है। इसीलिए आत्मा को काल और माया के इस संसार में रहने के लिए अपने ऊपर मायावी पर्दे डालने पड़ते है।
वर्तमान अवस्था में आत्मा स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीन प्रकार के पर्दों (शरीरों) में लिपटी हुई है और इन तीनो में पिंडी, अंडी और ब्रह्माण्डी मन काम कर रहा है। जब तक आत्मा मन और इन्द्रियों का साथ नहीं लेती, यह पूर्ण रूप से शुद्ध आत्मा है। परन्तु जब मन और इन्द्रियों का साथ ले लेती है तो यह जीवात्मा कहलाती है।

जीवन की सच्चाई

ये जीवन चार दिनों का मेला है। चार दिन का मतलब बचपन, किशोरावस्था, जवानी और बुढापा। ये जीवन की चार अवस्थाएं है जिन्हे संतो ने चार दिन भी कहा है। यह संसार की सारी चीजे झूठी है सिर्फ परमात्मा सत्य है। क्यो कि सबको एक दिन नाश हो जाना है।
आदि ग्रंथ के पृष्ठ स 1231 में नोवी पातशाही ने फरमाया है
का को तन धन, संपत्ति का की, का सिउ नेह लगाई। जो दिसे सो सगल बिनासे ज्यो बादर की छाई।।
हमारे तन से हम जो इतना प्यार करते है इसकी हद शमशान तक ही है और जो धन आज हमारा है वो कल किसी और का था। कल किसी और का हो जाएगा। क्यो इन नश्वर चीजों में मोह है…? एक दिन सबका विनाश पक्का है जैसे बादल की छाया हमेशा नहीं रहती थोड़ी देर ही रहती है वैसे ही ये संसार की चीजे हमारा कभी साथ नहीं देती है। एक न एक दिन इन्हे हमे छोड़ना है या ये हमे छोड़ देती है।
अहिंसा, दया- भाव

संत महात्माओं ने सच्चे परमार्थ के दो अंग बताएं है, पहला अंतर मुख अभ्यास और दूसरा बाहरी रहनी करनी। बाहरी रहनी करी में संतो ने पांच विषय विकारों काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को छोड़कर उनकी जगह शील, क्षमा, संतोष, विवेक और नम्रता आदि गुण धारण करने पर बल दिया है। जब तक हम अपने अंदर इन गुणों को धारण नहीं करते, हम अंतर्मुख अभ्यास में भी तरक्की नहीं कर सकते।
किसी के दिख को सुनना, उनको समझना, उनके दुख में शामिल होना और उसको दूर करने का यतन करना, दया ही तो है। दयालु व्यक्ति को हमेशा दूसरों को दुखी देखकर दुख होता है।
संत महात्मा समझाते है कि दया और अहिंसा परमार्थ की नींव है। हिंसा या जुल्म और सच्चा परमार्थ दिन और रात की तरह है। ये दोनों कभी साथ नहीं रह सकते। संत तुलसी दास जी कहते ” दया धर्म का मूल है”
कबीर साहिब ” दया तह धर्म है” । संतो ने दया भाव पर काफी जोर दिया है। हुजूर स्वामी जी महाराज ने अपने पदेश में कहा है ” कोमल चित्त दया में धारो। परमार्थ का खोज लगना।” सारबचन संग्रह २०:२७:१। अर्थात अगर तुम सच्चे परमार्थी बनना चाहते हो तो सबसे पहले अपने को कोमल बनाओ और उसमे दया की भावना पैदा करो।
गुरू नानक देव जी कहते है आदि ग्रंथ पृष्ठ स ९०३ “निर्दिया नहीं जोति उजाला” निर्दयी के मन में कभी परमात्मा की ज्योति प्रकट नहीं हो सकती।
अगर परमात्मा को पाना चाहते हो तो किसी का दिल न दुखाओ। संतो ने तीन प्रकार की हिंसा मानी है – मन,वचन और कर्म द्वारा किसी को दुख पहुंचाना।
हजरत ईसा फरमाते है “ thou shall not kill” यानी तू किसी जीव की हत्या मत कर ।
अंहिंसा और दया भाव , इन गुणों के बिना रूहानी तरक्की कर सकना कठिन है नहीं, असंभव है।
सत्संगी का संग
सत्संगी का संग
एक सज्जन रेलवे स्टेशन पर बैठे गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का आकर बोला : ‘‘साहब ! बूट पॉलिश ?’’
उसकी दयनीय सूरत देखकर उन्होंने अपने जूते आगे बढ़ा दिये, बोले : ‘‘लो, पर ठीक से चमकाना ।’’
लड़के ने काम तो शुरू किया परंतु अन्य पॉलिश वालों की तरह उसमें स्फूर्ति नहीं थी।
वे बोले : ‘‘कैसे ढीले-ढीले काम करते हो, जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ !’’ वह लड़का मौन रहा । इतने में दूसरा लड़का आया । उसने इस लड़के को तुरंत अलग कर दिया और स्वयं फटाफट काम में जुट गया। पहले वाला गूँगे की तरह एक ओर खड़ा रहा । दूसरे ने जूते चमका दिये ।
‘पैसे किसे देने हैं ?’ – इस पर विचार करते हुए उन्होंने जेब में हाथ डाला । उन्हें लगा कि ‘अब इन दोनों में पैसों के लिए झगड़ा या मारपीट होगी ।’ फिर उन्होंने सोचा, ‘जिसने काम किया, उसे ही दाम मिलना चाहिए।’ इसलिए उन्होंने बाद में आनेवाले लड़के को पैसे दे दिये ।
उसने पैसे ले तो लिये परंतु पहलेवाले लड़के की हथेली पर रख दिये। प्रेम से उसकी पीठ थपथपायी और चल दिया।
वह आदमी विस्मित नेत्रों से देखता रहा। उसने लड़के को तुरंत वापस बुलाया और पूछा : ‘‘यह क्या चक्कर है ?’’
लड़का बोला : ‘‘साहब ! यह तीन महीने पहले चलती ट्रेन से गिर गया था। हाथ-पैर में बहुत चोटें आयी थीं । ईश्वर की कृपा से बेचारा बच गया, नहीं तो इसकी वृद्धा माँ और पाँच बहनों का क्या होता !’’
फिर थोड़ा रुककर वह बोला : ‘‘साहब ! यहाँ जूते पॉलिश करनेवालों का हमारा ग्रुप है और उसमें एक देवता जैसे हम सबके प्यारे चाचाजी हैं, जिन्हें सब ‘सत्संगी चाचाजी’ कह के पुकारते हैं। वे सत्संग में जाते हैं और हमें भी सत्संग की बातें बताते रहते हैं।
उन्होंने सुझाव रखा कि ‘साथियों ! अब यह पहले की तरह स्फूर्ति से काम नहीं कर सकता तो क्या हुआ, ईश्वर ने हम सबको अपने साथी के प्रति सक्रिय हित, त्याग-भावना,स्नेह,सहानुभूति और एकत्व का भाव प्रकटाने का एक अवसर दिया है।
जैसे पीठ, पेट, चेहरा, हाथ, पैर भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी हैं एक ही शरीर के अंग, ऐसे ही हम सभी शरीर से भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी हैं एक ही आत्मा । हम सब एक हैं ।’
स्टेशन पर रहनेवाले हम सब साथियों ने मिलकर तय किया कि हम अपनी एक जोड़ी जूते पॉलिश करने की आय प्रतिदिन इसे दिया करेंगे और जरूरत पड़ने पर इसके काम में सहायता भी करेंगे ।’’
जूते पॉलिश करनेवालों के ग्रुप में आपसी प्रेम, सहयोग, एकता तथा मानवता की ऐसी ऊँचाई देखकर वे सज्जन चकित रह गये।
एक सत्संगी व्यक्ति के सम्पर्क में आने वालों का जीवन मानवीयता, सहयोग और सुहृदयता की बगिया से महक जाता है। सत्संगी अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों को अपने जैसा बना देता है। हमें भी बुरी संगत वालों से नहीं बल्कि अच्छी संगत वालों से ही मित्रता करनी चाहिए।
अपने वो नहीं, जो तस्वीर में साथ दिखे,
अपने तो वो है, जो तकलीफ में साथ दिखे!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है
जिसका मन मस्त है
उसके पास समस्त है!!