संस्कृत के 52 अक्षर

संस्कृत के 52 अक्षर हैं जो हमारे शरीर के छः चक्रों के कमलों से निकले हैं , इसलिए इनको देववाणी कहा गया है । इनका विवरण चक्रों के नाम, कमल दल की संख्या और उनके स्वामी धनी इस प्रकार है:-

  • ( 1 ) मूलाधार में 4 दल कमल, उसका स्वामी गणेश है।
  • ( 2 ) स्वाधिष्ठान या इन्द्रिय चक्र में 6 दल, उसका कमल स्वामी ब्रह्मा है।
  • ( 3 ) मणिपूरक या नाभि चक्र में 8 दल कमल, उसका स्वामी विष्णु है।
  • ( 4 ) अनाहत या हृदय चक्र में 12 दल कमल, उसका स्वामी शिव है।
  • ( 5 ) विशुद्ध या कण्ठ चक्र में 16 दल कमल,उसका स्वामी शक्ति है।
  • ( 6 ) आज्ञा चक्र में 2 दल कमल, उसका स्वामी मन और आत्मा है।
  • ( 7 ) अंतःकरण में 4 दल कमल है।

इन सब कमलो को जोड़ेगे तो इनका जोड़ 52 आएगा।

पूर्ण गुरु की क्या निशानी है?

चौपाई

सोई गुरू पूरा कहलावै । दुइ अक्षर का भेद लखावै ॥1 ॥ एक छुड़ावै एक मिलावै । तब निःशंक निज घर पहुँचावै ॥2 ॥ सो गुरू बंदीछोर कहावै । बंदी छोरि के जिव मुक्तावै ॥3 ॥

पूर्ण गुरु की क्या निशानी है ? पूर्ण गुरु वह है , जो लिखने , पढ़ने , बोलने में आनेवाले अक्षरों के साथ बने शब्दों और वाणी से परे के अरंग , अरूप , अनादि , अविनाशी शब्द का भेद समझा दे । इसका दूसरा गूढ़ अर्थ यह है कि तीसरे रूहानी मंडल पारब्रह्म के दो भाग हैं । निचले भाग के शब्द की गति नीचे की ओर है तथा यह ब्रह्म या ओंकार शब्द के द्वारा निचले मंडलों का सृजन करता है । ऊपरी भाग के शब्द की गति ऊपर की ओर है । वह शब्द साधक को ऊपर सोहं और सतलोक की ओर ले जाता है । मदन साहिब कहते हैं कि पूर्ण गुरु वह है , जो अपने शिष्य को मानवकृत अनेक शब्दों की मोहताजी से मुक्त करके , उसकी सुरत को अंतर में उस अनादि , अविनाशी , माया रहित , निर्मल शब्द में अभेद कर देता है , जो उसे सहज ही उसके निजघर वापस पहुँचा देता है । इस तरह पूर्ण गुरु जीव को काल की क़ैद से छुड़ाकर , मायामय जगत और जन्म – मरण के बंधन से मुक्त कर देता है । ऐसा गुरु ही सही अर्थों में मुक्तिदाता गुरु कहला सकता है ।

नोट: यह मदन साहिब रचित ग्रंथ में से लिया गया है।

संतो के गुण

संतों के गुण , कर्म और स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि बलिहारी जाएँ संतों पर , धन्य हैं संत क्योंकि जैसे कमल पानी में रहता है पर उसका फूल सदा पानी से ऊपर रहता है , उसी प्रकार संतजन संसार के बीच रहते हुए भी सबसे अलिप्त , निर्लेप रहते हैं ।

परमात्मा संत में समाया होता है और संत परमात्मा में दोनों की एकता के बारे में किसी प्रकार के भ्रम , शंका या दुविधा की कोई गुंजाइश नहीं ।

संतों के अंदर परमात्मा – रूपी अनमोल हीरा होता है परंतु बाहरी तौर पर वे भिखारी की तरह बने रहते हैं । वे आंतरिक अमीरी को बाहरी ग़रीबी के पर्दे से ढके रखते हैं ।

संतों का हृदय क्षमा , संयम , संतोष और दया से भरपूर होता है और वे समदर्शी होते हैं । वे अमीर – ग़रीब , छोटे – बड़े को ही नहीं , बल्कि भले – बुरे को भी समान दृष्टि से देखते हैं । वे दया की साक्षात मूरत होते हैं । वे सदा मीठे , प्यारे , रसभरे वचन कहते हैं और अनेक पापियों का उद्धार कर देते हैं ।

संतों के हृदय में सत्य का निवास होता है और उनकी कथनी और करनी का आधार भी सत्य होता है । वे सत्य की टकसाल में गढ़े हुए खरे सिक्के होते हैं और अपनी शरण में आए जीव को सत्य ( शब्द ) की टकसाल में गढ़कर पूर्ण रूप में खरा सिक्का बना देते हैं । वे सतलोक के निवासी होते हैं , उनके अंदर परमेश्वर का सच्चा नाम समाया होता है । वे सत्य का रूप होते हैं और सदैव सत्य को धारण किए रहते हैं

जो भाग्यशाली जीव छल , कपट और अवगुणों को त्यागकर तन – मन से ऐसे संतों के चरणों का दास बन जाते हैं , उन्हें वे माया का पानी पीनेवाले कौए से नाम का अमृत पीनेवाला हंस बना देते हैं अर्थात् वे उसकी कागवृत्ति या मनमति को दूर करके नाम का अमृत पीनेवाली निर्मल आत्मा बना लेते हैं ।

मदन साहिब कहते हैं कि संतों की बड़ाई बयान कर पाना असंभव है । मेरी या किसी अन्य की बात तो दूर रही , शेषनाग अपनी हज़ार जिह्वाओं द्वारा भी संतों की असल बड़ाई बयान नहीं कर सकता । मैं मन , वचन और कर्म द्वारा बार – बार संतों पर बलिहारी जाता हूँ ।

संस्कृत के 52 अक्षर कहां से आए?

संस्कृत के 52 अक्षर हैं जो हमारे शरीर के छः चक्रों के कमलों से निकले हैं , इसलिए इनको देववाणी कहा गया है । इनका विवरण चक्रों के नाम, कमल दल की संख्या और उनके स्वामी धनी इस प्रकार है:-

  • ( 1 ) मूलाधार में 4 दल कमल, उसका स्वामी गणेश है।
  • ( 2 ) स्वाधिष्ठान या इन्द्रिय चक्र में 6 दल, उसका कमल स्वामी ब्रह्मा है।
  • ( 3 ) मणिपूरक या नाभि चक्र में 8 दल कमल, उसका स्वामी विष्णु है।
  • ( 4 ) अनाहत या हृदय चक्र में 12 दल कमल, उसका स्वामी शिव है।
  • ( 5 ) विशुद्ध या कण्ठ चक्र में 16 दल कमल,उसका स्वामी शक्ति है।
  • ( 6 ) आज्ञा चक्र में 2 दल कमल, उसका स्वामी मन और आत्मा है।
  • ( 7 ) अंतःकरण में 4 दल कमल है।

इन सब कमलो को जोड़ेगे तो इनका जोड़ 52 आएगा।

बावन अछर लोक त्रै सभ कछु इन ही माहे ॥ ए अखर खिर जाहिगे ओए अखर इन मह नाहे ॥ कबीर साहिब , आदि ग्रन्थ , पृ .340 ।

बावन अक्षरों और तीनो लोको में सारे जीव उलझे हुए है। और हम सब कुछ इसी मे समझते है पर हम जीव एक अक्षर को नहीं पहचानते यानी परमात्मा को भी इन अक्षरों में ढूंढते है यानी किताबो में। पर वो इनमें नहीं है।

सेवा का फल

एक बार सतगुरु(बाबा सावन सिंगजी)बाग में टहल रहे थे, सेवक पीछे पीछे चल रहे थे सतगुरु अचानक रुके ओर एक सेवक को इशारा कर के बुलाया
वह एक अमीर व्यापारी का बेटा था सतगुरू इशारा कर के बोले बेटा यहाँ काफी काई जम गई है इसे साफ कर देना

सेवक ने उस समय तो ठीक है जी, कह दिया, पर बाद में अपने गुरु भाइयों से कहने लगा कि मैंने कभी सड़क साफ करने का काम नहीं किया, ये सेवा मुझ से नहीं होगी, मैं पिता जी से कह कर कुछ मज़दूर बुलवा लेता हूँ, वे ही यह सफाई कर लेंगे

साथ खड़े एक सेवादार ने कहा, भाई जरा सोचो, सतगुरू ने हम सब में से तुझे ही क्यों चुना और यह तुझे ही ये सेवा क्यों बख्शी है?
जरूर इसमें कोई गहरा राज़ है तू ध्यान में बैठ कर सतगुरू से ही पूछ ले

वह सेवक थोड़ी दूर जा कर एकांत में भजन में बैठ गया, कुछ देर बाद उसने देखा कि वो एक सत्तर बरस का बूढ़ा आदमी है वो सेवा कर रहा है उसके हाथों में झाड़ू है और वो सड़क की सफाई कर रहा है सामने सतगुरु खड़े हैं पास में बहुत सारे पर्चों का ढेर लगा हुआ है और सतगुरू एक-एक करके पर्चे फाड़ते जा रहे हैं

सेवक की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे उसने फौरन भजन से उठकर हाथों में झाड़ू और पानी की बाल्टी पकड़ ली और सड़क पे जमी हुई काई जोर शोर से साफ करने लगा

जब बाकी सेवादारों ने उसे काई साफ करने की सेवा करते देखा तो बड़ी हैरानी से पूछा अरे भाई अभी तो तूँ इन्कार कर रहा था , अचानक क्या हुआ?

उस सेवादार ने रोते हुए बतलाया, मैंने भजन करते हुए अंतर में अपना अगला जन्म देखा सत्तर साल की उमर है और मेरे हाथों में झाड़ू है, मैं सड़क पर जमी हुई काई साफ कर रहा हूँ और मेरे सतगुरू अपने हाथों से मेरे बुरे और खोटे कर्मों का एक-एक पर्चा फाड़ रहे हैं
सतगुरू ने अपनी दया से केवल एक घंटे की सेवा बख़्श के मेरे सत्तर वर्षों के कर्म फल काट दिये और मैं अभागा इतनी ऊँची सेवा को बहुत तुच्छ और मामूली समझ रहा था

हमारे अंतर के रूहानी मार्ग पर जमी हुई काई, हमारे अपने ही पिछले जन्मों के कर्मों का कमाया हुआ मैल है जिसकी वजह से हमारे अन्दर अन्धेरा है
विकारों के इस मैल की सफाई से ही हमारा मन निर्मल होगा, अभी तो हम जब भी प्रयास करते हैं, बार-बार फिसल कर नीचे गिर जाते हैं

गुरू घर की कोई भी सेवा बड़ी या छोटी नहीं होती छोटी और ओछी हमारी अपनी सोच होती है
जब जब सेवा का हुक्म आये तो इसे अपने सतगुरू की दया मेहर समझना, ज़रूर सतगुरू ने हमारे कर्मों की मैल साफ करनी होगी, बड़ी खुशी से जाना पूरी लगन और प्यार से सँगत की सेवा करना

सतगुरू सेवा, महा हितकारी
जन्म जन्म के कर्म कटा री

आत्माएँ तीन प्रकार की हैं

आत्माएँ तीन प्रकार की हैं , ( 1 ) नित्यमुक्त आत्माएँ – जो कभी बंधन में नहीं रही तथा सदैव परमात्मा के साथ रहती हैं । ( 2 ) मुक्त आत्माएँ – जो कभी संसार – चक्र का हिस्सा थीं , परंतु अब मुक्त होकर परमात्मा के साथ बहती हैं । ( 3 ) बद्ध आत्माएँ – जो संसार – चक्र में बँधी हैं । तीसरी प्रकार को आत्माएँ आवागमन के चक्र में तब तक फँसी रहती हैं , जब तक उन्हें मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाता ।

रामानुज मनुष्य की भूलने की प्रवृत्ति की चर्चा करते हैं जिसके कारण वह अपनी वास्तविकता को भूल जाता है । वह इस बात को एक लघु कथा के माध्यम से समझाते हैं ।

एक छोटा – सा राजकुमार अपने महल से बाहर खेलते हुए रास्ता भूल गया और वापस महल में नहीं पहुँचा । एक दयालु व्यक्ति , जो राजकुमार के विषय में कुछ भी नहीं जानता था , उसे अपने घर ले गया और राजकुमार उसके दूसरे बच्चों के साथ उसके पुत्र की भाँति पलने लगा ।

एक दिन राजा के एक दरबारी की नज़र उस पर पड़ी तो उसने खोए हुए राजकुमार को पहचान लिया और उसे यह याद दिलाई कि महल में रहनेवाला उसका पिता उसे मिलने के लिए तड़प रहा है । इससे राजकुमार के मन में महल में बिताए दिनों की याद ताज़ा हो गई । वह ख़ुशी से झूम उठा और अपने पिता से मिलने के लिए आतुर हो गया । जब राजा को अपने खोए हुए पुत्र के मिलने का समाचार मिला तब वह स्वयं उसके के लिए आए और दोनों का मिलाप हो गया ।

कथा में इस बात को दर्शाया गया है कि जब आत्मा इस संसार की भूल – भुलैया में खो जाती है तो वह अपने दिव्य स्रोत को भूल जाती है । जब कोई पूर्ण गुरु इसे इसके वास्तविक स्वरूप की याद करवाता है तो यह वापस अपने मूलस्रोत में जाने के लिए उत्सुक हो उठती है । परमात्मा जो आत्मा के वापस आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा होता है , आगे बढ़कर उसका स्वागत करता है और उसे आशीर्वाद देता है ।

गायत्री मंत्र का अर्थ

तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

हम उस भव्य ज्योतिर्मय स्वरूप का ध्यान करें , जिसने सकल सृष्टि की उत्पत्ति की है । वह हमारी बुद्धि को अंधकार से प्रकाश की ओर प्रेरित करे । ऋग्वेद 3.62.10

सत्य या परमात्मा को जानने के लिए

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

किसी आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर , सत्य को जानने का प्रयत्न करो । पूरी विनम्रता के साथ उनसे शंका – समाधान करो , उनकी सेवा करो । केवल आत्मज्ञानी ही तुम्हें ज्ञान दे सकते हैं , क्योंकि वे स्वयं सत्य का अनुभव कर चुके हैं । भगवद्गीता 4.34

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेव अभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥

उस परम सत्य को जानने के लिए दिमाग शिष्य को किसी ऐसे गुरु के पास जाना चाहिए , जो धर्मग्रंथों का ज्ञान रखता हो , और स्वयं ब्रह्म में लीन हो चुका हो । मुण्डक उपनिषद् 1.2.12

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