“रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही”
श्रीरामचरितमानस एक सुन्दर सरोवर है, जिसमें वक्ता-श्रोतारूपी चार घाट हैं । इसकी कथाके चार वक्ता हैं – शिव, काकभुशुण्डि, याज्ञवल्क्य और स्वयं तुलसीदास तथा चार ही श्रोता हैं, क्रमशः पार्वती, गरुड़, भरद्वाज और स्वमन ।
सुठि सुन्दर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि ।
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि ।।
श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में संत तुलसीदास ने राम की एवं राम-नाम की महिमा को उजागर करने हेतु दो अति श्रेष्ठ परम तपस्वी, मनस्वी, विद्वान्, करुणाशील मुनियों – भरद्वाज एवं याज्ञबल्क्यके संवाद की रचना की है । अपनी स्वयं की भावना एवं राम की महिमा को उन्होंने अपने से श्रेष्ठ वक्ता से कहलवाया है ।
मकर-संक्रान्ति के पुनीत पर्व पर याज्ञवल्क्य एवं अन्य मुनिगण तीर्थराज प्रयाग में त्रिवेणी-संगमपर स्नान करने हेतु आये । कुछ दिनों के प्रवासके पश्चात् अन्य मुनिगण तो अपने-अपने आश्रम को लौट गये, पर भरद्वाज मुनि ने परम ज्ञानी याज्ञवल्क्यजी को आग्रहपूर्वक, अनुनय-विनय के साथ रोक लिया । याज्ञवल्क्यजी के सुयश, तेज, तप एवं ज्ञानका गुणगान करते हुए बालसुलभ निश्छल उत्सुकता तथा जिज्ञासा के साथ भरद्वाजजी ने उनसे पूछा – ‘प्रभो ! आप तो ज्ञान के सागर हैनाय्र वेद, उपनिषद्, पुराणों के ज्ञाता हैं, मैं आपसे अपनी एक शंकाका समाधान चाहता हूँ ।‘ भारद्वाज मुनि स्वयं परम रामभक्त थे । राम की महिमा से सुपरिचित थे, पर याज्ञवल्क्य मुनि के मुख से राम-नाम का गुणगान सुनने की चाहसे उनसे पूछते हैं –
‘ मुनिराज ! सभी संतों एवं पवित्र ग्रन्थोंने राम-नाम के असीम प्रभावका गुणगान किया है और इसी राम के नाम का आशुतोष भोलेनाथ शिवजी भी निरन्तर जप करते रहते हैं एवं राम-नाम का उपदेश करके सभी जीवों को परमपद की प्राप्ति कराते हैं । ऐसे वे राम कौन हैं ? आप मुझे समझाकर कहें —
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही ।
कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ।।
क्या वे राम जो दशरथजी के पुत्र हैं, जिन्होंने पत्नी विरह में अत्यन्त दुःख उठाकर दुष्ट रावण को मारा है, वे यही राम हैं या कोई दूसरे, आप मुझे बतलाने की कृपा करें ।‘
………………..
याज्ञवल्क्यजी ने कहा – मुने ! आप तन, मन, वचन और कर्म से श्रीराम के अनन्य भक्त हैं । रामकथा-श्रवण की आपकी चतुराईको मैं समझ रहा हूँ । हे तात ! आदरपूर्वक मन लगाकर सुनिये; मैं रामजी की सुन्दर कथा कहता हूँ । पुनीत रामकथा विशाल अज्ञानरूपी महिषासुरका नाश करने वाली देवी कालिका हैं । रामकथा चन्द्रमा की शीतल किरणें हैं, जिनका संतरूपी चकोर रसपान करते हैं —
महामोहु महिषेसु बिसाला ।
रामकथा कालिका कराला ।।
रामकथा ससि किरन समाना ।
संत चकोर करहिं जेहि पाना ।।
वे आगे कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ ! आपकी ही तरह एक बार माता सती ने भी संदेह कर लिया था की ये राम कौन हैं, ऐसा क्या है इसमें कि शिवजी दिन-रात इनका जप करते हैं ।
हुआ यह कि जब श्रीराम पिताके वचन-पालनहेतु चौदह वर्ष के वनवास पर गये, तब कपटी मारीचकी युक्ति से रावण सीता का अपहरण करके लंका ले गया । उस समय सीताके विरह में रामकी दशा देखकर शिवजीने ‘जय सच्चिदानंद जग पावन’ तो कहा, परंतु अवसर ठीक नहीं है सोचकर परिचय नहीं किया । कृपानिधान शिवजी का शरीर भगवान् श्रीरामके दर्शनसे बार-बार पुलकित हो रहा था । सती जी यह दशा देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं और सोचने लगीं कि शिवजी ने स्त्री के विरह में नवमें भटकनेवाले वनवासी राजपुत्र को प्रणाम क्यों किया ? सती शिवजी से कुछ नहीं बोलीं, पर अन्तर्यामी भगवान् भोलेनाथ सती के संदेह को भाँप गये और बोले – ‘सती ! सर्वव्यापी, समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी, मायापति परम स्वतन्त्र ब्रह्मरूप भगवान् श्रीरामजी ने ही रघुकुलमें राजकुमारके रूपमें अवतार लिया है, तुम उनकी शक्ति और महिमा पर संदेह मत करो । पर सतीका संदेह नहीं मिटा और रामकी परीक्षा के हेतु सीता का रूप धारणकर रामचन्द्रजी के मार्ग में गयीं । लक्ष्मण तो सीता को देखकर हर्षित-चकित हो गये, पर अन्तर्यामी राम सतीके छद्मरूपको जान गये और बोले —
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामु ।
पिता समेत लीन्ह निज नामु ।।
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतु ।
बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतु ।।
………………..
श्रीरामचन्द्रजी के इन विनय और रहस्यमय वचनों से सतीजी को संकोच एवं क्षोभ हुआ । वे भयभीत-सी शिवजीके पास लौट पड़ीं । राम ने राह में ही उनको लक्ष्मण एवं सीता सहित अपने सच्चिदानन्दरूप को प्रकट कर दिखाया । सती ने जिधर देखा उधर ही राम-लक्ष्मण-सीता दिखायी दिये । उन्होंने देखा कि अनेक शिव. विष्णु, ब्रह्मा उनकी वन्दना कर रहे हैं । प्रभु का विराट ब्रह्माण्डमय रूप देखकर वे अपनी संदेह-भावनापर दुःखी हो उठीं और नेत्र मूँदकर बैठ गयीं । आँखें खुलने पर कुछ भी नहीं था । मन-ही-मन रामजी को प्रणामकर उन्होंने क्षमा याचना की, पर शिवजीके पास यह बात छिपा ली । शिव ने ध्यानकर वस्तुस्थिति जान ली, उनके अन्तर्मनमें दिशाबोध हुआ कि उन्हें सती के इस शरीर से अब पति-पत्नी सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये और वे अपने आराध्य का ध्यान करते हुए समाधिस्थ हो गये । पश्चात्ताप और दुःखसे भरी सतीने प्रभु राम से प्रार्थना की —
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी ।
छूटउ बेगि देह यह मोरी ।।
आगे की कथा है कि पिता दक्षप्रजापति के यज्ञ में शिव को आमन्त्रित नहीं करनेका अपमान सती जी सहन नहीं कर सकीं और योगाग्नि में उन्होंने अपना शरीर भस्म कर डाला । पुनः सती ने हिमालयकी पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया । रामजी शिव-पार्वती का मिलन चाहते थे, अतः उन्होंने मिलनका संयोग बनाया —
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा ।
पारबती कर जन्मु सुनावा ।।
अति पुनीत गिरिजा कै करनी ।
बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी ।।
राम की विनम्रता तो देखिये, वे शिवजीसे कहते हैं –
अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु ।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मांगे देहु ।।
पार्वती से जब शिव प्रसन्न हो गये तो तुलसीदासजी ने मांसमें पार्वती से भी शिवजीद्वारा रामकथा कहने का अनुरोध करा दिया । पार्वती ने कहा —
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी ।
जानिअ सत्य मोहि निज दासी ।।
तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना ।
कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना ।।
………………..
पार्वती ने भी भरद्वाजमुनि की तरह ही शिवजीसे पूछा – आप दिन-रात राम-राम जपा करते हैं, ये राम अयोध्या के राजा के पुत्र ही हैं या अजन्मा, निर्गुण, अगोचर कोई और राम हैं ? यदि राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे ? और ब्रह्म हैं तो स्त्री के विरह में विकल क्यों हो गये ? मैंने पिछले जन्म में संदेह किया और उसकी सजा पा ली है, अब मुझे पहले जैसा मोह नहीं है, बल्कि रामकथा सुनने में मेरी रुचि है ।
आर्तभावसे पूछ्ने पर करुणा करके भगवान् शिवने कहा – पार्वती ! तुम धन्य हो, तुमने जगत् को पवित्र करनेवाली गंगा के समान रामकथा सुनना चाहा है, जो समस्त संसार के लिये हितकर है —
धन्य धन्य गिरिराजकुमारी ।
तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी ।।
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा ।
सकल लोक जग पावनि गंगा ।।
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी ।
कीन्हिहु प्रस्न जगत हित लागी ।।
शिवजी ने कहा – पार्वती ! संदेह त्याग दो, राम सब रूपों में वही राम हैं । जो निर्गुण है वही सगुण है जैसे कि जल और ओले में भेद नहीं है —
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें ।
जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें ।।
जो प्रकाशरूप हैं, सब रूपों में प्रकट हैं, जीव, माया और जगत् सबके स्वामी हैं, वे ‘रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे स्वामी हैं ।‘
पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ ।
रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिव नायउ माथ ।।
भगवान् भोलेनाथ ने अत्यन्त भक्तिभाव एवं आनन्द के साथ पार्वती को रामकथा के सभी प्रसंग सुनाये और यह भी कहा –
‘ तुम्हारी ही तरह पक्षिराज गरुड़को भी उस समय भ्रम एवं संदेह हो गया था, जब वे श्रीरामको नागपाश से मुक्त करने गये थे । यह सोचकर कि जिनके नाम-जपसे लोग भवसागर के बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, वे ही राम एक तुच्छ राक्षस के नागपाश में बँधे गये ?’ –
भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम ।
खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम ।।
इसी संदेह को लेकर गरुड़ नारद एवं ब्रह्माके निर्देशपर मेरे पास आये और मैंने उन्हें काकभुशुण्डि के पास रामकथा सुनने भेज दिया । रामकथा के पावन प्रसंग और राममहिमा को विस्तार से सुनकर वे संदेह, मोह, विषाद एवं भ्रमसे मुक्त ही गये तथा गद्गद होकर बोले —
मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी । सुनि रघुबीर भगति रस सानी ।।
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ।।
और रामभक्तिसे अभिभूत होकर यह भी कहा —
जीवन जन्म सुफल मम भयऊ ।
तव प्रसाद संसय सब गयऊ ।।
………………..
इसलिये हे भवानी ! रामकथा तो अनुपम है, यह मैंने प्रेमपूर्वक सुनायी है । पार्वतीजीने कहा – नाथ ! मेरा विषाद दूर हुआ, फिर वे बोलीं —
सुनि सब कथा हृदय अति भाई । गिरिजा बोली गिरा सुहाई ।।
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा । राम चरन उपजेउ नव नेहा ।।
मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस ।
उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस ।।
याज्ञवल्क्यजीके द्वारा ‘ रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही ‘ के उत्तरमें रामचरित्रकी कथा-शृङ्खलाओंके पावन प्रसंगोंको सुनकर भरद्वाजमुनिकी जिज्ञासा शान्त हुई, जो की वस्तुतः रामकी महिमा सुननेका बहानामात्र था । संत तुलसीदासने इन विभिन्न प्रसंगोंको सूत्रबद्ध कर जन-जनको रामभक्तिका पावन संदेश दिया ।
आइये थोडा-सा यह भी देख लें कि तुलसी के मतानुसार राम कैसे हैं, वे तो कहते हैं —
तुलसी अपने रामको रीझ भजो के खीज ।
उल्टे सीधे सब उगें खेते पड़े ते बीज ।।
इतने सरल, करुणाकर भक्तवत्सल हैं राम । श्रीराम भी तुलसीमय हो जाते हैं तभी तो ‘ तुलसिदास चंदन भिसे तिलक देत रघुबीर । ‘ वे कहते हैं कि राम-सा उदार संसारभर में कोई नहीं है; क्योंकि वे तो बिना सेवा के भी द्रवित हो जाते है —
ऐसो को उदार जग माहीं ।
बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहिं ।।
तुलसी ने तो रामभक्तिमें लीन होकर समग्र संसारको ही सियाराम मानकर कहा है –
सीय राममय सब जग जानी ।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ।।
तुलसीके राम भक्तवत्सल और करुणानिधान हैं तथा ऐसे प्रकाशमणि हैं, जो जिह्वारूपी द्वारपर रखने से भीतर और बाहर प्रकाश-ही-प्रकाश कर देते हैं । वे कहते हैं —
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ।।
रामका नाम, रामकी महिमा अनुपम है, पावन है, आनन्दमयी है तथा ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय’ और ‘मृत्योर्माऽमृतं गमय’ का दिशाबोध करानेवाली है ।
Ko(‘कल्याण’ पत्रिका; वर्ष – ७७, संख्या – ६ : गीताप्रेस, गोरखपुर)














