“रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही” रामचरितमानस

रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही”

श्रीरामचरितमानस एक सुन्दर सरोवर है, जिसमें वक्ता-श्रोतारूपी चार घाट हैं । इसकी कथाके चार वक्ता हैं – शिव, काकभुशुण्डि, याज्ञवल्क्य और स्वयं तुलसीदास तथा चार ही श्रोता हैं, क्रमशः पार्वती, गरुड़, भरद्वाज और स्वमन ।

सुठि सुन्दर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि ।
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि ।।

श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में संत तुलसीदास ने राम की एवं राम-नाम की महिमा को उजागर करने हेतु दो अति श्रेष्ठ परम तपस्वी, मनस्वी, विद्वान्, करुणाशील मुनियों – भरद्वाज एवं याज्ञबल्क्यके संवाद की रचना की है । अपनी स्वयं की भावना एवं राम की महिमा को उन्होंने अपने से श्रेष्ठ वक्ता से कहलवाया है ।

मकर-संक्रान्ति के पुनीत पर्व पर याज्ञवल्क्य एवं अन्य मुनिगण तीर्थराज प्रयाग में त्रिवेणी-संगमपर स्नान करने हेतु आये । कुछ दिनों के प्रवासके पश्चात् अन्य मुनिगण तो अपने-अपने आश्रम को लौट गये, पर भरद्वाज मुनि ने परम ज्ञानी याज्ञवल्क्यजी को आग्रहपूर्वक, अनुनय-विनय के साथ रोक लिया । याज्ञवल्क्यजी के सुयश, तेज, तप एवं ज्ञानका गुणगान करते हुए बालसुलभ निश्छल उत्सुकता तथा जिज्ञासा के साथ भरद्वाजजी ने उनसे पूछा – ‘प्रभो ! आप तो ज्ञान के सागर हैनाय्र वेद, उपनिषद्, पुराणों के ज्ञाता हैं, मैं आपसे अपनी एक शंकाका समाधान चाहता हूँ ।‘ भारद्वाज मुनि स्वयं परम रामभक्त थे । राम की महिमा से सुपरिचित थे, पर याज्ञवल्क्य मुनि के मुख से राम-नाम का गुणगान सुनने की चाहसे उनसे पूछते हैं –

‘ मुनिराज ! सभी संतों एवं पवित्र ग्रन्थोंने राम-नाम के असीम प्रभावका गुणगान किया है और इसी राम के नाम का आशुतोष भोलेनाथ शिवजी भी निरन्तर जप करते रहते हैं एवं राम-नाम का उपदेश करके सभी जीवों को परमपद की प्राप्ति कराते हैं । ऐसे वे राम कौन हैं ? आप मुझे समझाकर कहें —

रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही ।
कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ।।

क्या वे राम जो दशरथजी के पुत्र हैं, जिन्होंने पत्नी विरह में अत्यन्त दुःख उठाकर दुष्ट रावण को मारा है, वे यही राम हैं या कोई दूसरे, आप मुझे बतलाने की कृपा करें ।‘

………………..

याज्ञवल्क्यजी ने कहा – मुने ! आप तन, मन, वचन और कर्म से श्रीराम के अनन्य भक्त हैं । रामकथा-श्रवण की आपकी चतुराईको मैं समझ रहा हूँ । हे तात ! आदरपूर्वक मन लगाकर सुनिये; मैं रामजी की सुन्दर कथा कहता हूँ । पुनीत रामकथा विशाल अज्ञानरूपी महिषासुरका नाश करने वाली देवी कालिका हैं । रामकथा चन्द्रमा की शीतल किरणें हैं, जिनका संतरूपी चकोर रसपान करते हैं —

महामोहु महिषेसु बिसाला ।
रामकथा कालिका कराला ।।
रामकथा ससि किरन समाना ।
संत चकोर करहिं जेहि पाना ।।

वे आगे कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ ! आपकी ही तरह एक बार माता सती ने भी संदेह कर लिया था की ये राम कौन हैं, ऐसा क्या है इसमें कि शिवजी दिन-रात इनका जप करते हैं ।

हुआ यह कि जब श्रीराम पिताके वचन-पालनहेतु चौदह वर्ष के वनवास पर गये, तब कपटी मारीचकी युक्ति से रावण सीता का अपहरण करके लंका ले गया । उस समय सीताके विरह में रामकी दशा देखकर शिवजीने ‘जय सच्चिदानंद जग पावन’ तो कहा, परंतु अवसर ठीक नहीं है सोचकर परिचय नहीं किया । कृपानिधान शिवजी का शरीर भगवान् श्रीरामके दर्शनसे बार-बार पुलकित हो रहा था । सती जी यह दशा देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं और सोचने लगीं कि शिवजी ने स्त्री के विरह में नवमें भटकनेवाले वनवासी राजपुत्र को प्रणाम क्यों किया ? सती शिवजी से कुछ नहीं बोलीं, पर अन्तर्यामी भगवान् भोलेनाथ सती के संदेह को भाँप गये और बोले – ‘सती ! सर्वव्यापी, समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी, मायापति परम स्वतन्त्र ब्रह्मरूप भगवान् श्रीरामजी ने ही रघुकुलमें राजकुमारके रूपमें अवतार लिया है, तुम उनकी शक्ति और महिमा पर संदेह मत करो । पर सतीका संदेह नहीं मिटा और रामकी परीक्षा के हेतु सीता का रूप धारणकर रामचन्द्रजी के मार्ग में गयीं । लक्ष्मण तो सीता को देखकर हर्षित-चकित हो गये, पर अन्तर्यामी राम सतीके छद्मरूपको जान गये और बोले —

जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामु ।
पिता समेत लीन्ह निज नामु ।।
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतु ।
बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतु ।।

………………..

श्रीरामचन्द्रजी के इन विनय और रहस्यमय वचनों से सतीजी को संकोच एवं क्षोभ हुआ । वे भयभीत-सी शिवजीके पास लौट पड़ीं । राम ने राह में ही उनको लक्ष्मण एवं सीता सहित अपने सच्चिदानन्दरूप को प्रकट कर दिखाया । सती ने जिधर देखा उधर ही राम-लक्ष्मण-सीता दिखायी दिये । उन्होंने देखा कि अनेक शिव. विष्णु, ब्रह्मा उनकी वन्दना कर रहे हैं । प्रभु का विराट ब्रह्माण्डमय रूप देखकर वे अपनी संदेह-भावनापर दुःखी हो उठीं और नेत्र मूँदकर बैठ गयीं । आँखें खुलने पर कुछ भी नहीं था । मन-ही-मन रामजी को प्रणामकर उन्होंने क्षमा याचना की, पर शिवजीके पास यह बात छिपा ली । शिव ने ध्यानकर वस्तुस्थिति जान ली, उनके अन्तर्मनमें दिशाबोध हुआ कि उन्हें सती के इस शरीर से अब पति-पत्नी सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये और वे अपने आराध्य का ध्यान करते हुए समाधिस्थ हो गये । पश्चात्ताप और दुःखसे भरी सतीने प्रभु राम से प्रार्थना की —

तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी ।
छूटउ बेगि देह यह मोरी ।।

आगे की कथा है कि पिता दक्षप्रजापति के यज्ञ में शिव को आमन्त्रित नहीं करनेका अपमान सती जी सहन नहीं कर सकीं और योगाग्नि में उन्होंने अपना शरीर भस्म कर डाला । पुनः सती ने हिमालयकी पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया । रामजी शिव-पार्वती का मिलन चाहते थे, अतः उन्होंने मिलनका संयोग बनाया —

बहुबिधि राम सिवहि समुझावा ।
पारबती कर जन्मु सुनावा ।।
अति पुनीत गिरिजा कै करनी ।
बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी ।।

राम की विनम्रता तो देखिये, वे शिवजीसे कहते हैं –

अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु ।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मांगे देहु ।।

पार्वती से जब शिव प्रसन्न हो गये तो तुलसीदासजी ने मांसमें पार्वती से भी शिवजीद्वारा रामकथा कहने का अनुरोध करा दिया । पार्वती ने कहा —

जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी ।
जानिअ सत्य मोहि निज दासी ।।
तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना ।
कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना ।।

………………..

पार्वती ने भी भरद्वाजमुनि की तरह ही शिवजीसे पूछा – आप दिन-रात राम-राम जपा करते हैं, ये राम अयोध्या के राजा के पुत्र ही हैं या अजन्मा, निर्गुण, अगोचर कोई और राम हैं ? यदि राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे ? और ब्रह्म हैं तो स्त्री के विरह में विकल क्यों हो गये ? मैंने पिछले जन्म में संदेह किया और उसकी सजा पा ली है, अब मुझे पहले जैसा मोह नहीं है, बल्कि रामकथा सुनने में मेरी रुचि है ।

आर्तभावसे पूछ्ने पर करुणा करके भगवान् शिवने कहा – पार्वती ! तुम धन्य हो, तुमने जगत् को पवित्र करनेवाली गंगा के समान रामकथा सुनना चाहा है, जो समस्त संसार के लिये हितकर है —

धन्य धन्य गिरिराजकुमारी ।
तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी ।।
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा ।
सकल लोक जग पावनि गंगा ।।
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी ।
कीन्हिहु प्रस्न जगत हित लागी ।।

शिवजी ने कहा – पार्वती ! संदेह त्याग दो, राम सब रूपों में वही राम हैं । जो निर्गुण है वही सगुण है जैसे कि जल और ओले में भेद नहीं है —

जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें ।
जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें ।।

जो प्रकाशरूप हैं, सब रूपों में प्रकट हैं, जीव, माया और जगत् सबके स्वामी हैं, वे ‘रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे स्वामी हैं ।‘

पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ ।
रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिव नायउ माथ ।।

भगवान् भोलेनाथ ने अत्यन्त भक्तिभाव एवं आनन्द के साथ पार्वती को रामकथा के सभी प्रसंग सुनाये और यह भी कहा –

‘ तुम्हारी ही तरह पक्षिराज गरुड़को भी उस समय भ्रम एवं संदेह हो गया था, जब वे श्रीरामको नागपाश से मुक्त करने गये थे । यह सोचकर कि जिनके नाम-जपसे लोग भवसागर के बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, वे ही राम एक तुच्छ राक्षस के नागपाश में बँधे गये ?’ –

भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम ।
खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम ।।

इसी संदेह को लेकर गरुड़ नारद एवं ब्रह्माके निर्देशपर मेरे पास आये और मैंने उन्हें काकभुशुण्डि के पास रामकथा सुनने भेज दिया । रामकथा के पावन प्रसंग और राममहिमा को विस्तार से सुनकर वे संदेह, मोह, विषाद एवं भ्रमसे मुक्त ही गये तथा गद्गद होकर बोले —

मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी । सुनि रघुबीर भगति रस सानी ।।
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ।।

और रामभक्तिसे अभिभूत होकर यह भी कहा —

जीवन जन्म सुफल मम भयऊ ।
तव प्रसाद संसय सब गयऊ ।।

………………..

इसलिये हे भवानी ! रामकथा तो अनुपम है, यह मैंने प्रेमपूर्वक सुनायी है । पार्वतीजीने कहा – नाथ ! मेरा विषाद दूर हुआ, फिर वे बोलीं —

सुनि सब कथा हृदय अति भाई । गिरिजा बोली गिरा सुहाई ।।
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा । राम चरन उपजेउ नव नेहा ।।

मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस ।
उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस ।।
याज्ञवल्क्यजीके द्वारा ‘ रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही ‘ के उत्तरमें रामचरित्रकी कथा-शृङ्खलाओंके पावन प्रसंगोंको सुनकर भरद्वाजमुनिकी जिज्ञासा शान्त हुई, जो की वस्तुतः रामकी महिमा सुननेका बहानामात्र था । संत तुलसीदासने इन विभिन्न प्रसंगोंको सूत्रबद्ध कर जन-जनको रामभक्तिका पावन संदेश दिया ।

आइये थोडा-सा यह भी देख लें कि तुलसी के मतानुसार राम कैसे हैं, वे तो कहते हैं —

तुलसी अपने रामको रीझ भजो के खीज ।
उल्टे सीधे सब उगें खेते पड़े ते बीज ।।

इतने सरल, करुणाकर भक्तवत्सल हैं राम । श्रीराम भी तुलसीमय हो जाते हैं तभी तो ‘ तुलसिदास चंदन भिसे तिलक देत रघुबीर । ‘ वे कहते हैं कि राम-सा उदार संसारभर में कोई नहीं है; क्योंकि वे तो बिना सेवा के भी द्रवित हो जाते है —

ऐसो को उदार जग माहीं ।
बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहिं ।।

तुलसी ने तो रामभक्तिमें लीन होकर समग्र संसारको ही सियाराम मानकर कहा है –

सीय राममय सब जग जानी ।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ।।

तुलसीके राम भक्तवत्सल और करुणानिधान हैं तथा ऐसे प्रकाशमणि हैं, जो जिह्वारूपी द्वारपर रखने से भीतर और बाहर प्रकाश-ही-प्रकाश कर देते हैं । वे कहते हैं —

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ।।

रामका नाम, रामकी महिमा अनुपम है, पावन है, आनन्दमयी है तथा ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय’ और ‘मृत्योर्माऽमृतं गमय’ का दिशाबोध करानेवाली है ।

Ko(‘कल्याण’ पत्रिका; वर्ष – ७७, संख्या – ६ : गीताप्रेस, गोरखपुर)

अमृत वेला- Time of Nectar

ग्रंथो शास्त्रों में सुबह सवेरे यानी रात के पिछले पहर को अमृत वेला, ब्रह्म मुहूर्त, ब्रह्म घड़ी आदि कहा गया है। परमेश्वर के भक्तों ने अमृत वेला को भक्ति के लिए खास तौर से लाभदायक माना है।

सुबह का वातावरण भक्ति के लिए बहुत उत्तम होता है। सबह के समय रात भर सोने के बाद शरीर तरोताजा होता है। रात का खाना हजम जो चुका होता है और नींद का भी जोर नहीं होता। पिछले दिन के सारे झगड़े झमेले भूल चुके होते है। में दुनिया में नहीं फैला होता। घर के बाहर लोगो का आना जाना नहीं होता। वातावरण शांत और रूहानियत की निर्मल तरंगों से भरा होता है जिसमें जीव भजन करके अधिक लाभ प्राप्त कर सकता है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 1099 पर गुरु अर्जुन देव जी फरमाते है :

परभाते प्रभ नाम जप गुर के चरण धियाई।

जनम मरण मल उतरे सच्चे के गुण गाई।।

अमृत वेला में प्रभु का नाम जपना चाहिए। नाम का जाप ही सच्ची गुरु भक्ति है और यही सच्ची प्रभु भक्ति है। इस भक्ति द्वारा ही जीव जन्म मरण के बंधन तोड़कर निज घर वापस पहुंच सकता है। जिस प्रकार भली भांति तैयार की गई धरती में समय पर बोया गया बीज जल्दी अंकुरित होता है, उसी तरह अमृत वेला में किया गया नाम का सिमरन जल्दी फलीभूत होता है। अमृत वेला में नाम का सिमरन करने से भक्ति का ऐसा ख़ज़ाना जमा हो जाता है, जिसमें कमी नहीं आती।

अमृत वेला में नाम जपने का यह अर्थ नहीं है कि कोई और समय नाम जपने के लिए ठीक नहीं है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ५६५ गुरु अमर दास जी की वाणी है: सच वेला मूरत सच, जित सच्चे नाल पियार।।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ११५ गुरु अमर दास जी की वाणी है: वेला वखत सभ सुहाईया।। जित सचा मेरे मन भाया।।

वह घड़ी, पल, मुहूर्त और समय धन्य है जिसमें उस प्यारे प्रीतम की याद आए। सब दिन, महीने, मूहर्त परमात्मा के बनाए हुए है। उसका बनाया हुआ हर पल पवित्र है। उसकी कृपा से जिस समय भी ध्यान नाम कि कमाई की तरफ जाए, वह समय धन्य है।

अमृत कैसे प्राप्त होगा

अमृत का नाम सुनकर ऐसा लगता है कि जिसके सेवन से हम अमर हो जाय । सूफी फकीरो ने इसे ‘ आबे हयात’ यानी अमर जीवन प्रदान करने वाला जल कहा है। यह संसार, इसके सब पदार्थ और रिश्ते- नाते नाशवान है यानी एक दिन सबको खत्म हो जाना है। सारी त्रिलोकी मृत्यु और विनाश के प्रभाव में है। इसके विपरित वह प्रभु और उसका नाम या शब्द वह अमृत है, जिसे पीने से जीवात्मा मृत्यु और विनाश की सीमा से ऊपर उठकर अमर जीवन प्राप्त कर लेती है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 1323 पर गुरु रामदास जी फरमाते है:

हर हर नाम अमृत रस मीठा, गुरमत सहजे पीजै।।

आप कहते है कि हरि और उसका नाम (divine power) अमृत है। जिससे जुड़कर ही हम इस जन्म मरण के चक्कर से निकल सकते है। फिर हमे बार बार नहीं मरना पड़ता। इसीलिए कबीर साहिब ने अपनी बानी में कहा है ” जिस मरने से जग डरे मेरे मन आनंद, मरने से ही पाइए पूर्ण परमानंद”। ये अवस्था नाम रूपी अमृत प्राप्त होने के बाद ही होती है। अमृत सच्चे जीवन और सच्चे आनंद का स्रोत है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 1238-39 पर गुरु अंगत साहिब फरमाते है

नानक अमृत एक है, दूजा अमृत नाहि।।

नानक अमृत मनै माह ,पाइए गुर परसादी।।

आप कहते है कि केवल प्रभु या उसका नाम ही सच्चा अमृत,उसके बिना कोई ऐसी वस्तु नहीं,जिसमें अमर जीवन प्रदान करने की शक्ति हो। यह अमृत हर एक के अंदर है, परन्तु यह प्राप्त केवल उन खुशकिस्मत जीवों को होता है, जिन पर प्रभु और सतगुरु कृपा करे।

यह अमृत हमारे शरीर में कहा है? तो आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 1323 पर गुरु रामदास जी बताते है कि :

नउ दरवाज नवे दर फिके, रस अमृत दसवें चुइजे।।

आप समझाते है कि हमारे शरीर के दस दरवाजे है। नौ दरवाजे- दो आंखें, दो कान, दो नासिकाए, मुंह तथा दो मल मूत्र के स्थान- बाहर संसार की तरफ खुलते है। इनका संबंध इन्द्रियों के भोगो और विषय विकारों के साथ है, जब कि नाम रूपी अमृत दसवें दरवाजे पर पहुंचने से प्राप्त होता है। जब हम ध्यान को आंखो के पीछे और मध्य स्थिर करते है, तब हमे अंतर म दसम द्वार पर शब्द या नाम का अमृत मिलता है।

एक उदाहण के जरिए भी समझ सकते है कि जिस तरह कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है, परन्तु वह उसकी तलाश में बाहर भटकता है, उसी तरह नाम रूपी अमृत अंतर मे है,परन्तु मनमुख उसकी तलाश में बाहर भटकते है, इसीलिए उन्हें कभी भी सच्चे अमृत और अमर पद की प्राप्ति नहीं होती।

बाइबल में भी यही लिखा है

जो भी इसको पीएगा, फिर कभी भी उसे प्यास नहीं लगेगी।

संसार के जीवों के हिस्से

संसार या इस रचना को चार हिस्सों में बाटी का सकती है – अंडज, जेरज, स्वेदज और उदभिज्ज।

अंडज: वे जीव है जो अंडो में से पैदा होते है, जैसे चिड़िया, कबूतर, पक्षी आदि

जेरज: ये से जीव है जो झिल्ली में लिपटे हुए पैदा होते है, जैसे भैंस, गाय, जानवर आदि। इंसान भी इसी किस्म में आ जाता है।

स्वेदज: ये से जीव है, जो मौसम की तब्दीली से पैदा होते है, जैसे मक्खियां, मच्छर, जुए, कीड़े मकोड़े वगैरा।

उदभिज्ज: इसमें घास फूस, पेड़ पोधे आदि है।

असली फकीरी

एक राजा ने किसी फकीर संत की प्रशंसा के किस्से सुने तो उसके दर्शन करने वहां पहुंच गए। मुलाकात के बाद राजा ने औपचारिकतावश फकीर से कहा, ”महात्मा जी, आप इस सूखे पेड़ के नीचे रह रहे हैं, यह मुझे अच्छा नहीं लगा। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरे राजमहल में चलकर वहां रहें।” जब फकीर ने राजा का अनुरोध स्वीकार कर लिया तो राजा मुश्किल में पड़ गया क्योंकि उसने तो उस फकीर को यह बात दिखावे के तौर पर ही कही थी। आखिर अनमने दिल से राजा उस फकीर को अपने साथ महल में ले आया। राजा ने सोचा कि ये फकीर तो नकली निकला। फकीर होकर भी राजमहल में रहना चाहता है। चूंकि राजा सार्वजनिक रूप से अनुरोध करके उसे अपने साथ लाया था, इसलिए अब वो उस फकीर को राजमहल से जाने के लिए कह भी नहीं सकता था लेकिन यह बात तय थी कि राजा के दिल में उसके प्रति रत्ती भर भी सम्मान न था।

दूसरी तरफ अपनी फकीरी में मस्त, प्रसन्नचित्त चेहरे और आनंद के साथ वह फकीर राजमहल में रह रहा था। राजा यह दृश्य देखकर और अधिक दुखी व परेशान हो जाता कि सूखे पेड़ के नीचे रहने वाला यह अदना सा फकीर महल के मजे लूट रहा है। फकीर जितना प्रसन्न और आनंदपूर्ण दिखता, राजा ये बातें सोच-सोचकर उतना ही दुखी हो जाता। दो- तीन महीने बाद राजा ने फकीर का शाही शयनकक्ष बदल दिया और सोने के लिए एक साधारण सा कमरा दे दिया। फकीर के सेवकों में भी काफी कमी कर दी गई और उसका भोजन भी सामान्य सा दिया जाने लगा। पर इन सब बातों से फकीर की मस्ती और चेहरे की रौनक में कोई कमी न आई। राजा यह देखकर कुछ आश्चर्य करता। अब तो उसने फकीर के नजदीक जाना ही छोड़ दिया। वह तो किसी न किसी बहाने उसे महल से चलता कर देने की फिराक में था। इसी तरह चार-पांच महीने बीत गए।

अब राजा ने फकीर को तंग और परेशान करने के प्रयास शुरू कर दिए। अपने सेवकों को कहकर फकीर के रहने का स्थान बहुत ही गंदी जगह कर दिया। सुबह जब स्नान की बारी आती तो फकीर को घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती क्योंकि उससे पहले वहां बीसियों लोग स्नान करने को खड़े होते। अब फकीर की सेवा में कोई सेवक भी न था। उसे भोजन भी अब बहुत देरी से मिल पाता। कई बार तो सारा-सारा दिन ही भोजन नसीब न होता और फकीर चुपचाप भूखे पेट ही सो जाता। राजा ने सोचा कि इन हालातों में तो यह फकीर स्वयं ही उनसे यहां से चले जाने की अनुमति मांग ही लेगा लेकिन जब राजा ने फकीर को देखा तो वह भौंचक्का रह गया।

फकीर की मस्ती और उसके चेहरे के नूर में अब भी कोई कमी न आई थी बल्कि वह तो उसी उल्लास, उमंग, प्रसन्नता और आनंद से जी रहा था। अब तो राजा से रहा न गया। फकीर के समीप जाकर उसने पूछा, ”महात्मा जी, आपसे एक बात पूछना चाहता हूं।” फकीर कुछ इस तरह से मुस्कराकर बोल उठा, जैसे उसे पहले से ही पता था कि राजा उससे क्या पूछने वाला है, ”क्यों राजन! एक सवाल पूछने में ही आपने छह महीने लगा दिए?” राजा प्रश्न भरी दृष्टि से फकीर को देखने लगा तो फकीर ने कहा, ”राजन्! आपने क्या सोचा कि मैं राजमहल के ठाट-बाट और शाही जीवन का मजा लेने के लिए यहां आया था? मैंने तो केवल आपका अनुरोध स्वीकार किया था। आप क्या समझते हैं कि फटे-पुराने, मैले वस्त्र धारण करने वाले, सूखी रोटी खाते, पेड़ के नीचे सोते आदमी को ही फकीर कहते हैं। राजन! फकीरी का मतलब दु:ख, दरिद्रता, कष्ट, परेशानी, अभावों, संकटों को सहन करना नहीं है बल्कि फकीरी का मतलब तो सर्व- स्वीकार से है। ईश्वर ने जैसा भी रखा है, जहां भी रखा है, उसको पूर्ण रूप से स्वीकार करने वाला ही फकीर होता है। विपत्तियां, कष्ट, दु:ख, संकट और अभाव हमारे आनंद और मस्ती में तनिक भी कमी नहीं कर सकते हैं और न ही भौतिक सुख-सुविधाएं, ऐश्वर्य, वैभव फकीर के उत्साह, उमंग और उल्लास में कोई वृद्घि कर सकते हैं।”

राजा फकीर की ये सब बातें सुन-सुनकर बहुत शर्मिन्दा हुआ जा रहा था। फकीर ने राजा की मनोदशा को समझ लिया था, इसलिए उनसे कहा, ”राजन! आप शर्मिन्दा और दुखी न हों। आप ही नहीं बल्कि सब लोग ऐसा ही समझते हैं, जैसा आपने सोचा पर अब आपको तो मालूम हो ही गया है कि फकीरी का मतलब क्या है? हम फकीर तो विकट से विकट और सुखद से सुखद हर परिस्थिति में आनंद और मस्ती में रहते हैं और हमेशा उस ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करते हैं।” इतना कहने के साथ ही फकीर ने राजा को आशीर्वाद दिया और महल से चला गया।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 757 पर गुरु रामदास जी फरमाते हैं:
जे सुख देहि त तुझहि अराधी दुख भी तुझे धियाई। जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विच सुख मनाई…

सच्चा त्याग

त्याग शब्द का अर्थ है किसी वस्तु या विचार को मन से छोड़ देना। पर आध्यात्मिक रूप से त्याग का मतलब है कर्मो के फल का त्याग करना अथवा निष्काम कर्म करना। यदि कोई मनुष्य बिना फल की इच्छा के कोई कर्म करे तो उसे निष्काम कर्म कहते है। क्योंकि हम कर्म किए बिना रह नहीं सकते है। यही भागवत गीता में अध्याय 3 श्लोक 5 में लिखा है।

और इसी कारण हमे कर्म करने पड़ते है और हम इस संसार के झाल में फस जाते है। पर भगवान कृष्ण ने गीता में इससे बचने या निकलने का उपाय निष्काम कर्म बताया है। क्योंकि यही सच्चा त्याग है । भागवत गीता में अध्याय 18 में भगवान कृष्ण ने श्लोक 9,10,11,12 में सच्चे त्याग के बारे में हमारा मार्गदर्शन किया है ।

भागवत गीता में ऐसे कहीं पहलू है जो हमको परमात्मा तक पहुंचने के लिए हमारा मार्ग दर्शन करते है। इसके बारे में आने वाले दिनों में पोस्ट में जरूर बात करेंगे।

तीन लोक और तीन गुण

परमात्मा ने शब्द या नाम के जरिए इस सृष्टि की रचना की है और फिर काल और माया भी पैदा की। फिर माया से तीन देवता पैदा हुए। ब्रम्हा , विष्णु और महेश जो इस सृष्टि को चला रहे है। जिसे तीन लोक यानी आकाश, प्रथ्वी और पाताल के स्वामी भी कहते है। तीन गुण भी इन्ही के दायरे में आते है। ये रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण है।

रजोगुण गति, प्राप्ति, उत्तेजना और मान आदि का प्रतीक है। तमोगुण आलस और अज्ञानता का प्रतीक है। सतोगुण नेकी, शांति, गंभीरता और ठहराव का प्रतीक है। इन गुणों का प्रभाव हमारे शरीर पर घटता बढ़ता रहता है। पर हम थोड़ा विवेक लगाकर पता कर सकते है कि हमारे ऊपर किसका प्रभाव है?

जब हमारे अंदर दुनियावी ख्वाहिश जोर मारती है और हम उसको पूरा करने के लिए दौड़ते है, विचलित होते है तो उस वक्त हम पर रजोगुण का प्रभाव होता है।

जिस वक्त हमारे अंदर गुस्सा, ईर्ष्या, बदले की भावना होती है या जब हमारे अंदर आलस होता है तो उस वक्त हम पर तमोगुण का प्रभाव होता है।

कई बार हम महसूस करते है कि हमारे अंदर शांति है, बड़ी गंभीरता होती है, किसी से बदला लेने को भावना नहीं होती है और उस वक्त हम बड़ी आसानी से दूसरों की गलती को माफ भी कर देते है। जब भी हम अच्छे कर्म करते है उस वक्त सतोगुण का प्रभाव होता है।

आदि ग्रंथ में गुरु अमरदास जी फरमाते है। त्रे गुण माया, भरम भुलाया, हौमे बंधन कमाए।।

संत महात्मा हमे समझाते है कि तीन गुणों में हम किसी भी गुण के प्रभाव में हो पर हम कर्म तो कर रहे होते है और फिर यही कर्म हमारे बंधन ( जन्म मरण) का कारण बन जाते है।

तो फिर कैसे इस बंधन से छूटे, कौन हमे छुड़ाएगा?

स्वामी जी महाराज सारबचन संग्रह 38:15-17 पर फरमाते है

नाम रहे चौथे पद माही। यह ढूंढे तिरलोकी माही।। तीन लोक में नाम न पावे। चौथे लोक में संत बतावे।। तीन लोक में बसता काल। चौथे में रहे नाम दयाल

अगर हमे इन जन्म मरण के दुखो या बंधनों से आजाद होना है तो हमे पूर्ण संत ही रास्ता बताते है। जब हम उनके बताए रास्ते पर चलते है तो हम तीन लोकों से पार चौथे लोक में नाम के भण्डारी, परमात्मा ,उस दयाल के देश में पहुंच जाते है और जन्म मरण से आजाद हो जाते है।

नाम या शब्द की ताकत

सतगुरु के आशिक़ का ख़ून सूख जाता है यानि आशिक़ों के तन में ख़ून नहि बचता

महाराज चरण सिंह जी के जमाने की बात है एक सेवादार जिसका नाम था श्री राम दास जो दिल्ली से Beas भंडारे के डीनो में कैंटीन में सेवा करने के लिए आता था और वो दिल्ली से पेदल चल कर आता था रास्ते भर कुछ नहि खाना केवल निम्बू पानी पीता था शरीर भी भारी था

जब 1962 में जंग लगीं थी तो मिलिटरी वालो ने हुज़ूर महाराज जी से ब्लड के लिये प्रार्थना की और उस वक़्त Beas में मिलिटरी वालों ने पहला ब्लड कैम्प लगाया गया और सभी सेवादारों को ब्लड देने के लिए हुज़ूर ने announcement की सेवादारों में इतना उत्साह था कि सभी एक दूसरे से आगे होकर पहला नम्बर लेना चाहते थे
ब्लड देने वालों में रामदास पहले नम्बर पर था पहलवानो वाला शरीर देखकर डॉक्टर ख़ुश हुए कि अच्छा ख़ासा ब्लड इकठा हो जाएगा

जब डॉक्टर ने रामदास के शरीर में सुई लगायी तो देखा ब्लड नहि आ रहा दूसरी तरफ़ ट्राई किया फिर भी ब्लड नहि निकला तब डॉक्टर टीम ने मिलकर मुआयना किया और उसकी डेली की रूटीन पूछी तो उनकी आँखे खुली रह गयी कि ये आदमी इतनी बड़ी देह के साथ दिल्ली से 400 मील चलकर आना कैंटीन में चाय की भट्ठी पे चाय बनाना बिना ख़ून के ये आदमी केसे सारे कामकरता है जबकि मेडिकल साइयन्स के हिसाब से ख़ून के बिना इंसान ज़िंदा ही नहि रह सकता जब बात हुज़ूर तक पहुँची उन्होंने कहा की ये आशिक़ों की कहानी है जिनका शरीर का ख़ून सूख जाता है पर देह शब्द के सहारे चलती रहती है ।

Disciple’s relationship with the master

Someone asked Maharaj Charan Singh Ji what the disciple’s relationship with the master is?

And the Master answered :

What is there to talk about ? Who is the disciple and who is the master ? Neither the body of the disciple is the disciple, nor the body of the master is the Master.

So the real relationship of the disciple with the master is attaching the soul to the Shabd within.

Third eye
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