
पिछलो की जो धारे टेका । जिन को कभी आंख नहीं देखा।। पोथिन में सुनी उनकी महिमा। टेक बांध में सब का भरमा।। सब मिल करते पिछली टेका। वक्त गुरु का खोज न नेक।। बिन गुरु वक्त भक्ति नहीं पावे। बिना भक्ति सतलोक न जावे।। वक्त गुरु जब लग नहीं मिलइ। अनुरागी का काज न सरई। (स्वामी जी, सरबचन संग्रह, 8:1:33-34,43-44,52)
गुरु से संतो का अभिप्राय अपने समय के जीवित गुरु से है। पिछले समय में हो चुके महात्मा पूर्ण होने के बावजूद हमारी कोई सहायता नहीं कर सकते। वे परमात्मा में समा चुके है। वे हमसे उतने ही दूर है जितना परमात्मा। अगर हम उनसे सहायता ले सकते है तो फिर परमात्मा से क्यो नहीं ले सकते, जिसमें वे महात्मा समा चुके है? या तो हमे गुरु की जरूरत नहीं है या अपने समय के ऐसे पूर्ण सतगुरु की जरूरत है जो परमात्मा से भी मिला हुआ हो और देह स्वरूप के भी हमारे सामने हो। हमे ऐसे पूर्ण संत सतगुरु की जरूरत है जो हमारी लिव अंतर में नाम से जोड़ सके और जिसके ध्यान द्वारा हम अपने मन और आत्मा को अंतर में एकाग्र करके परमात्मा के शब्द या नाम से जोड़ सके। यही कारण है कि संतो महात्माओं की अनेक गद्दियो पर अनेक पूर्ण महात्मा आए क्यो कि जीव अपने समय के जीवित सतगुरु से ही मार्ग दर्शन और सहायता प्राप्त कर सकता है।
गुरु और शिष्य का रिश्ता शिष्य पर नहीं, गुरु पर आधारित होता है। हम अपनी तरफ से सोच लेते है कि पिछले समय में हुआ कोई महात्मा हमारा गुरु या मार्गदर्शक है। यह केवल हमारे मन का भ्रम है क्योंकि हमे उस महात्मा की तरफ से यह उत्तर नहीं मिलता की उसने हमे अपनी शरण में लेना स्वीकार कर लिया है। यदि लोग पूर्व में हुए महात्माओं की टेक द्वारा भवसागर से पार हो सकते तो संसार के आरंभ में एक महात्मा में एक अवतरित (अवतार) हो जाता और उसके बाद किसी दूसरे महात्मा को संसार में आने की आवश्यकता नहीं होती।
संसार के सब संतो ने गुरु प्रसाद या संतो कि दया को जीव की मुक्ति का साधन माना है। दया दाता की प्रसन्नता पर आधारित होती है, भिखारी की इच्छा पर नहीं। अगर कोई व्यक्ति पूर्व समय में हुए किसी महात्मा की शरण से पार हो सकता है, तो संसार के सारे परमार्थी साहित्य में से सतगुरु की दया या मुर्शीद की रहमत के सिद्धांत को खारिज करना पड़ेगा। अगर जीव अपनी मर्जी के किसी महात्मा में टेक रखकर भवसागर से पार हो सकता हो तो कोई भी जीव परमात्मा की जुदाई में न भटकता फिरे।
उस कर्ता पुरुष ने खुद यह विधान बनाया है कि जीव जीवित सतगुरु के बिना उससे मिलाप नहीं कर सकता। गुरु अमरदास जी फरमाते है
“धुर खसमे का हुकुम पाया, विन सतगुरु चेतिया न जाइ” (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ,556)







