पूर्ण सतगुरु की पहचान

पूर्ण संतो ने सावधान किया है कि गुरु होना ही काफी नहीं, गुरु पूर्ण होना चाहिए। पूरा गुरु वह है जो अपनी आत्मा परमात्मा में अभेद करके उसका रूप हो चुका हो ।

आदि ग्रंथ पृष्ठ स 286 में गुरु अर्जुन देव जी कहते है:
सत पुरख जिन जानिया, सतिगुर तिस का नाउ।।तिस कै संग सिख उधरे, नानक हर गुन गाउ।।


पूर्ण गुरु को ही संतो ने शब्द स्वरूपी, शब्द अभ्यासी सतगुरु कहकर पुकारा है।


सार बचन संग्रह, 16:1:5,9-11 में स्वामी जी महाराज कहते है:

गुरु सोई जो शब्द सनेही। शब्द बिना दुसर नहि सई।।शब्द कमावे सो गुरु पूरा। उन चरनन की हो जा धुरा।।और पहचान करो मत कोई। लक्ष अलक्ष न देखो सोई।।शब्द भेद लेकर तुम उनसे। शब्द कमाओ तुम तन मन से।।

आप फरमाते है कि महात्मा कि कोम, मजहब, मुल्क आदि को न देखो, केवल यह देखो कि वह शब्द स्वरुपी और शब्द अभ्यासी हो।पूर्ण संत सतगुरु प्रभु का रूप होता है, वह प्रभु की तरह अपनी किसी भी दात के लिए कोई कीमत नहीं मांगता। वह अपनी शरण में आने वाले जीवों को प्रभु से मिलाप की युक्ति मुफ्त सिखाता है। वह जीवों की परमार्थी सेवा निस्वार्थ भाव से करता है। वह अपनी हक हलाल की कमाई पर गुजारा करता है और अपनी नेक कमाई भी दूसरों में बांटकर खाता है। 


आदि ग्रंथ में पृष्ठ 1245 गुरु नानक साहिब की बानी है:

गुरु पीर सदाएं मंगण जाइ।। ता कै मूल न लगीए पाई।।घाल खाई किछ हथऊ देई।। नानक राह पछनाही सई।।

आप सावधान करते है कि शिष्य के धन पर गुजारा करनेवाले व्यक्ति के चरणों पर भूले भटके भी माथा नहीं टेकना चाहिए। हमे सिर्फ वही महात्मा रास्ता दिखा सकता है, जो खुद हक हलाल की कमाई करे और अपनी नेक कमाई भी दूसरों के साथ बांटकर खाए।


यहां कहीं जगह शब्द या नाम आया है इसके बारे में हम अगली पोस्ट में बात करेंगे

पूर्ण सतगुरु की आवश्यकता

गुरु के मिलने के बहुत लाभ है। यहां जितनी बार भी गुरु या सतगुरु के बारे कहा गया है इसका तात्पर्य वक्त के पूर्ण गुरु या सतगुरु से ही है।सच तो यह है कि उसके बिना जीवात्मा का कुछ नहीं बनता। प्रभु जब किसी को भक्ति की दात बक्शता है तो गुरु के जरिए ही बक्शता है।सतगुरु के बिना नाम का सिमरन न किया जा सकना कोई हैरानी वाली बात नहीं है। यह खुद मालिक का बनाया गया विधान है:

आदि ग्रंथ पृष्ठ स 556 में गुरु अमरदास जी ने फरमाया है :

धुर खसमे का हुक्म पाया, विण सतगुरु चेतिया न जाइ।।
एक जगह और ( पृष्ठ स 1046)आप फरमाते है:

बिन सतगुरु को नाउ न पाए, प्रभ ऐसी बड़त बनाई हे।।
इसी लिए इस नियम को तोड़ना किसी के लिए भी संभव नहीं। अगर कोई सतगुरु की सहायता के बिना परमात्मा के बारे में सोच रहा है तो उसके लिए उद्धार का मार्ग कैसे खुले? इस असलियत से अनजान लोग तरह तरह के उपाय करने में कसर नहीं छोड़ते, फिर भी उनको सफलता नसीब नहीं होती:
आदि ग्रंथ पृष्ठ स 51 में गुरु अर्जुन देव जी फरमाते है:

कोट जतना कर रहे, गुर बिन तरियो न कोई।।

चाहे कितने भी जतन क्यों ना कर लो । गुरु के बिना इस संसार रूपी भवसागर से पार नहीं हो सकते। 
अपनी बुद्धि के पीछे लगकर शुभ भावना के साथ किए जाने वाले कर्मो में लगे रहना वैसा ही है जैसा कोल्हू के बैल का एक ही चक्र में घूमते जाना। बैल को तो शायद अपनी आंखो की पट्टी में से अपने सफर की व्यर्थता का कुछ आभास हो भी जाता हो, पर मनुष्य को माया की मोटी पट्टियां कुछ भी नजर नहीं आने देती।
हर मजहब के संत इसी बात का प्रमाण देते है जैसे

कुल्लियात बुल्लेशाह दोहा स 31 में बुल्लेशाह जी फरमाते है:

बिन मुर्शीद कामल बुल्लेया, तेरी इवे गई इबादत कीती।।

आप भी यही कहते है कि बिना पूर्ण (कामिल) गुरु( मुर्शीद) के हमारी पूजा या इबादत बेकार जाती है।


मीरा सुधा सिंधु पृष्ठ स 196 पर मारवाड़ की मीराबाई फरमाती है:

हरि बिन रहयो न जाय, गुर बिन तारियो न जाय।।

हरि बिंरह नहीं सकते और गुरु बिना इस संसार रूपी भवसागर से पार नहीं हो सकते।


पलटू साहिब की बानी, भाग 1, कुंडली 14 में आप फरमाते है:

कोटीन करे उपाय भटक सगरो से आवे।संत दुवारे जाय नाम को घर तब पावे।।

करोड़ों उपाय कर ले मुक्ति के, पर बार बार वापस इस संसार में अलग अलग योनियों में आना पड़ेगा। सिर्फ संत के द्वार पर जा कर अपने असली घर जाने का रास्ता मिलता है।इसलिए हमे अगर परमशांति, परमसुख, जन्म मरण से मुक्ति चाहते है तो हमें पूर्ण सतगुरु की आवश्यकता है।अब सवाल पैदा होता है कि हम निर्बल इंसान एक इंसान की पहचान सही से नहीं कर पाते है तो पूर्ण सतगुरु की क्या पहचान कर सकते है तो संतो ने आप ही अपनी बाणियो के जरिए बताया है। कल जरूर पड़े पूर्ण गुरु की पहचान के बारे में…….।

पूर्ण गुरु परमात्मा का ही रूप है

संसार की चौरासी लाख योनियों का सिरजन होते हुए भी मनुष्य की कुछ अपनी मजबूरियां है। अगर मनुष्य को कुछ बताना या समझाना हो तो वह उससे ही समझ सकेगा जो उसी जैसा होकर उससे बात करे। सिरजनहार प्रभु जब अपनी दया मेहर के कारण अपनी पैदा की हुईं विशेष आत्माओं का उद्धार करना चाहता है तो मनुष्य शरीर धारण करके उनमें आ मिलता है और परमार्थ के मार्ग पर रहनुमाई करके उनको धुर धाम पहुंचा देता है। निर्गुण और सगुण दो अलग अलग परमेश्वर नहीं, एक ही है:

आदि ग्रंथ पृष्ठ स 287 पर गुरू अर्जुन देव जी फरमाते है:

“निर्गुण आप सरगुन भी ओही।।”

आदि ग्रंथ में और कई जगह इसके प्रमाण मिलते है

गुरू रामदास जी ने पृष्ठ स 42 पर फरमाया है:

समुंद विरोल सरीर हम देखिया, इक वसतु अनूप दिखाई।।

गुर गोविंद, गोविंद गुरु है, नानक भेद न भाई।।

शरीर रूपी समन्दर को हर तरफ से देखा तो एक वस्तु अनूप दिखाई दी कि गुरु ही गोविंद है और गोविंद यानी परमात्मा ही गुरु है , कोई भी भिन भेद नहीं है।

आपके समर्थन में गुरु अर्जुन देव जी ने पृष्ठ स 710   पर फरमाया है:

गुर गोबिंद गोपाल गुर, गुर पुरण नारायण।।

गुरु ही गोबिंद है यानी पूर्ण रूप से नारायण है।

आपने दसम ग्रंथ सैची पहली पृष्ठ स 59 में भी लिखा है:

हरि, हरि जन दोई एक है, बिब बिचार कछु नाही।

जल ते उपज तरंग जिऊ, जल ही बिखे समाही।।

जब समुंद्र के जल में से कुछ जल लहर के रूप में ऊपर उठता है तो वह एक अलग चीज प्रतीत होने लगता है, पर यथार्थ में वह अलग नहीं होता, बाकी जल के साथ ही जुड़ा होता है और उसके एक आध मिनट बाद नीचे बैठ जाने पर उसका उतना भी अलगाव खत्म हो जाता है।

एक जगह और आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 397 पर लिखा है:

गुर की महिमा किया कहा, गुरु बिबेक दात सर।।

ओह आदि जुगाद,जुगह जुग, पूरा परमेसर।।

गुरु की महिमा क्या कहे वह तो आध जुगाध यानी युगों युगों से मौजूद परमेश्वर का ही रूप है।

कल की पोस्ट में पूर्ण गुरु की पहचान के बारे में पढेगे।अगर आप को ये पोस्ट अच्छी लगे तो आप दूसरों को भी शेयर करे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगो को सच के बारे में पता चले।

परमात्मा तक पहुंचने की कुंजी या सीढ़ी-1

परमेश्वर तक पहुंचना कोई हंसी मजाक की बात नहीं।वह तो मानो किसी मजबूत किले में बैठा हुआ है और वह क़िला है मोटी पथरीली दीवारों और वज्र के मजबूत कपाटोवला। न दीवारे ढह सकती है, न कपाट ही टूटते है।इसलिए उसके अंदर जाने के लिए कोई उपाय नहीं बनता। हां, अगर एक सीढ़ी मिल जाए, मजबूत डंडों वाली और ठेठ शिखर को छूने वाली, ऊंची,तब ही क़िले में दाखिल हुआ का सकता है। प्रसंत्ता की बात यह है कि सतगुरु के रूप में ऐसी सीढ़ी मिल जाए, परन्तु उस जिसके भाग्य अच्छे हो।

आदि ग्रंथ ( पृष्ठ स 17) में गुरु नानक देव जी फरमाते है:

गुरु पौड़ी बेड़ी गुरु, गुरु तुलहा हरि नाउ।।

गुरु सर सागर बोहिथो, गुरु तीरथ दरिआऊ।।

सतगुरु परमेश्वर रूपी किले की दीवार पर चढ़ने के लिए सीढ़ी का कार्य पूरा करता है, वैसे ही वह भवसागर को पार करने के लिए नाव या जहाज बन जाता है। वह नाम की दात बक्षता है और उसके दिए हुए नाम की कमाई पार उतार देती है।

आदि ग्रंथ ( पृष्ठ स 205) में गुरु अर्जुनदेव जी फरमाते है:
जिस का गृह तिन दीआ ताला, कुंजी गुर सौपाई।।अनिक उपाव करे नहीं पावे, बिन सतगुरु सर्णाई।।

सिरजन हार ने अपने अंशो – आत्माओं- के साथ एक अपनी ही तरह का खेल रचा है। उनको ख़ुद से जुदा किया, उनके हृदय में अपने मूल से जुड़ने की तड़प रखी और फिर उसी हृदय के एक कोने में अपना अदृश्य महल बनाकर बैठ गया। महल में आत्मा अपने आप दाखिल नहीं हो सकती।उस पर ताला लगा हुआ है। वह पक्का ताला तारों या पत्तियों से नहीं खुलता। उसकी कुंजी (चाभी) गुरु को सौंप दी गई है, गुरु की कुंजी के सिवाय और कोई काम चलाऊ कुंजी किसी लोहार के द्वारा नहीं बनाई जा सकती। जो भी गुरु की प्रसंता प्राप्त कर लेगा, अंदर जा पहुंचेगा। उससे अलावा चाहे हजार उपाय कर ले, सालो के साल, जन्मों के जन्म लगा ले, सफलता कदापि नहीं मिलेगी।..………… बाकी का कल की पोस्ट में…

मनुष्य जन्म- एक अवसर part 3

कबीर साहिब हमारी पूरी अवस्था अपनी बानी के जरिए बयान कर रहे है

जब लग तेल दीवे मुख बाती तब सुझे सभ कोई।।

तेल जले बाती ठहरानी सुन्ना मंदर होई।।

रे बावरे तुह घरी न राखै कोई।।

तू राम नाम जप सोई।।

का की मात पिता कहूं का को कवन पुरख की जोई।।

घट फूटे कोऊ बात न पूछे काढ़ह काढ़ह होई।।

देहूरी बैठी माता रोवे खाठिया ले गए भाई

लट छिटकाए तिरिया रोए हंस इकेला जाई।।

जिन सांसारिक संबंधों को पालने के लिए लोग अनगिनत मुसीबतें सहते है, दुष्कर्म करते है, उनकी अस्थिरता का चित्र खींचते हुए कबीर साहिब बताते है कि जब सांसो का तेल खत्म होने पर जीवन की बत्ती बुझ जाती है और काया का मंदिर सुनसान हो जाता है तो इसे कोई आधी घड़ी भी घर में रखता, सबको इससे पल्ला छुड़ाने की जल्दी हो जाती है। जीवन रूपी मटके के टूटने पर न जीव का कोई बाप रहता है, न मां, न पत्नी, सब उसकी ओर से मुंह मोड़ लेते है। अति प्यार करने वाली पत्नी बाल बिखेरने से अधिक कुछ नहीं कर सकती, माता घर की चौखट तक ही चलकर खड़ी हो जाती है,भाई स्वय उसको शमशान भूमि में उठाकर ले जाते है। इस प्रकार बड़े परिवार वाला जीव एक, अकेला रह जाता है।

इसलिए हमे मनुष्य के इस कीमती मोके का फायदा लेना है और भक्ति में लगना है….. .. कैसे? कल की पोस्ट में जरूर पढ़े।

मनुष्य जन्म: एक अवसर part-2

आगरा के महान संत स्वामी जी महाराज अपनी बानी में फरमाते है:

“नर देही तुम दुर्लभ पाई।

अस औसर फिर मिले न आय।।

“आप मनुष्य जन्म की महत्ता के बार में बता रहे है कि ऐसा दुर्लभ मौका हमें मिला है, फिर ऐसा मौका मिले या ना मिले , इसीलिए इसका हम फायदा उठाना है। ये मालिक की अपार कृपा हुई है तो ये मनुष्य का जामा उसने अनेक हमारे संचित कर्मो के अंदर दया करके ऐसा कर्मो का मेल जोल बनाया है कि ये शिरोमणि मनुष्य का दुर्लभ जामा हमें बक्षा है।गोस्वामी जी वचन है:

” बड़े भाग मानुष तन पावा”स्वामी जी महाराज जी एक अन्य जगह फरमाया है:”ये तन दुर्लभ तुमने पाया, कोट जनम भटका जब खाया”कहते है भाई आसानी से नहीं मिला है ये मनुष्य जनम , करोड़ो जन्म भटकने के बाद मिला है।

तो गुरु अर्जुन देव जी आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 176 पर बताया है कि कौन कोन सी योनियों में भटकने के बाद यह मनुष्य रूपी अनमोल जामा मिला है आप फरमाते है

कई जनम भए कीट पतंगा। कई जनम गज मीन कुरंगा।।कई जनम पंखी सरप होइयो।कई जनम हेवर भ्रीख जोयो।।मिल जगदिस मिलन की बरिया, चिरांकाल ये देह संजारिया।।”

हम कई जन्मों में कीट बने, पतंगा बने, मछली, हाथी हिरण जैसे जन्म हुए। फिर कई जन्मों में हम पंखी बने, सांप बने, पेड़ बने। लेकिन अब मालिक की बड़ी कृपा, दया हुई है, बड़ी देर के बाद ये मनुष्य जामा मिला है। ये मालिक से मिलाप की बारी है भाई! पर मिलाप केसे करे भाई!जब तक हम अपने कर्मो से मुक्त नहीं हो जाते तब तक हम परमात्मा से मिल नहीं सकते। तो क्या करे कि हमारे कर्मो का लेखा खत्म हो जाए। 

स्वामी जी महाराज के वचन है:

अब यह देह मिल कृपा से,करो भक्ति जो कर्म दहा।”

वो भक्ति करनी है , वो करनी करनी है जो कर्मो के दायरे से हमारी आत्मा को बाहर कर सके वो कोनसी करनी है, 

आदि ग्रंथ में पांचवी पातशाही पृष्ठ स 12 में फरमाया है

“मिल साधसंगत भज केवल नाम”

पूरे संत महात्मा की संगत और सत्संग में जाना है उनके चरण सरण में जाना है।” भज केवल नाम ” केवल नाम  या शब्द (पॉवर)है जो हमारी आत्मा को उससे मिलने की अवस्था में के जा सकता है। जीवन मुक्त अवस्था की अवस्था में लें जा  सकता है।उस सच्चे शब्द, उस सच्चे नाम के साथ लिव जोड़ना है। हमारे मन में शायद कहीं शंका ना रह जाय कि हर मनुष्य जामें के बाद फिर मनुष्य का जामा मिल जाना है

तो स्वामी जी महाराज फरमाते है कि ऐसा नहीं है भाई!

अस औसर फिर मिले ना आय”

फिर ऐसा मौका नहीं मिलता है हमें संत दादू दयाल जी भी यही फरमाते है:

बार बार ये तन नहीं, नर नारायणी देह।दादू बहुर न पाइए, जनम अमोलक येह।।

ये अनमोल जन्म है भाई बार बार नहीं मिल सकता। इसके अंदर आकर मालिक की सच्ची भक्ति, सत्संग में लगकर सच्चा नाम जो कुल मालिक का रूप है उससे लीव जोड़नी है।और उसके साथ मिलाप का सच्चा आनंद लेना है।

मनुष्य जन्म- एक अवसर part 1


मनुष्य जन्म- एक अवसर part 1

आदि ग्रंथ मे पृष्ठ सं 1075  गुरु अर्जुन देव जी फरमाते है:

“लाख चौरासी जोन सबाई।। मानस को प्रभ दी वड आई।।इस पौड़ी ते जो नर चुंके, सो आई जाइ दुख पाईदा।।”

इन्सान को  दूसरे जीवों के मुकाबले श्रेष्ठ बुद्धि इसीलिए मिली है कि वह इस चरण में अपनी यात्रा को सफल कर सके। मनुष्य शरीर उस यात्रा का अंतिम पड़ाव है। चाहे प्रभु के पैदा किए गए जीवों कि किस्में चौरासी लाख से कम नहीं, यहां भवसागर से पार होने का अवसर केवल एक बार मिलता है, मनुष्य के वेष में, मानो नाम या शब्द के जहाज में चड़कर बैठने के लिए इस रूप में सीढ़ी लटका दी गई है। जो कोई इस दुर्लभ अवसर को हाथ से गवा बैठता है, वह और और निचली योनियों में पड़कर अनेक कष्ट सहता रहता है।

मनुष्य जन्म का क्या उद्देश्य है?

गुरु अर्जुन साहेब (आदि ग्रंथ पृष्ठ स 251) फरमाते है:

“या जुग मह एकही क आइया।।”

 केवल पारब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त करना, उसके साथ एक होना।पर हमने यहां आकर कहा लग गए

तो इसी को गुरु साहिब ने (आदि ग्रंथ पृष्ठ स 43) पर फरमाते है:

” प्राणी तू आया लाहा लैन।।लगा कित कुफकडे सभ मुकदी चली रैन।।

हम सब आए तो मालिक को मिलने पर इस बहुमूल्य समय को व्यर्थ के कामों में ही गुज़ार रहे है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिला समय बहुत कम है और वह भी तेजी से बीत रहा है।

कबीर साहब भी यही फरमाते है:

“इही तेरा अवसर इह तेरी बार।। घट भीतर तू देख विचार।। कहत कबीर जीत के हार।। बहु बिध कहियो पुकार पुकार।।

“आप बताते है कि सिर्फ यही आखिरी अवसर है जिसमें हैं अपने अंतर में उस परमात्मा को गुरु के जरिए पा सकते है। इसलिए कबीर साहिब बानी के जरिए हमें बार बार चेतावनी दे रहे है कि नहीं तो हम मनुष्य जन्म रूपी जीती हुई बाज़ी को हार जायेंगे।

परमात्मा की खोज में

परमात्मा की खोज

हर एक महात्मा हम यही उपदेश देता है कि जब तक हमारी आत्मा अपने असल में जाकर नहीं समाती, तब तक इसका जन्म मरण के दुखो से छुटकारा नहीं हो सकता। इसीलिए हर एक को परमात्मा की खोज है। हम सब दुनिया के जीव अपनी अपनी अक्ल के अनुसार हजारों स्थानों पर उस परमात्मा को डूढ़ने में लगे हुए है। कोई मंदिरों, मस्जिदों,गुरुद्वारों में ढूंढता है,कोई हिमालय पर्वत पर खोज रहा है और कोई ग्रंथो पोथियों, वेद शास्त्रों में तलाश कर रहा है।

संत महात्माओं ने उपदेश किया है कि परमात्मा कहीं बाहर नहीं है।

कबीर साहिब फरमाते है:

ज्यो तिल माही तेल है, ज्यो चकमक में आग। 

तेरा साई तुज में ,जाग सके तो जाग।।

जिस तरह तिल में तेल है, पत्थर के अंदर अग्नि होती है, इसी तरह जिस परमात्मा को हम खोज रहे हैं, वह परमात्मा हमारे शरीर के अंदर बैठा हुआ है।

इसी तरह पलटू साहिब फरमाते है:

साहेब साहेब क्या करे साहेब तेरे पास”

कहते है,तुम किस साहेब को ढूंढते फिर रहे हो, वह साहेब तो चौबीस घंटे तुम्हारे साथ साथ है

हजरत ईसा : ने भी हमारे शरीर को टेंपल ऑफ लिविंग गॉड कहकर बयान किया है।

तुलसी साहिब फरमाते है:

क्यो भटकता फिर रहा तू ए तलाशे यार में।

रास्ता शाह रग में है दिलभर पै जाने के लिए।।

परमात्मा की खोज में क्यो मारे मारे फिर रहे हो, जंगलों, पहाड़ों में क्यो भटकते फिर रहे हो? वह परमात्मा तो तुम्हारे शरीर के अंदर बैठा हुआ है,और जो उस मालिक से मिलने का रास्ता है, वह भी तुम्हारे शरीर के अंदर है आज तक बाहर से न किसी को मिला है और न कभी मिलेगा।

गुरु अमरदास जी फरमाते है:

काईया अंदर जगजीवन दाता वसे सभना करे प्रतीपाला”

वह परमात्मा, जिसने सारी दुनिया की रचना की है, हमारे शरीर के अंदर बैठा है।

गुरु अमरदास जी एक और जगह फरमाते है:

आपे सभ घट अंधरे आपे ही बाहर।।

आपे गुप्त वरतदा आपे ही जाहर।।

जुग छतीह गुबार कर वर्तिआ सुंनाहरि।।

ओथे वेद पुरान न सासता आपे हरि नरहरि।।

बताते है, प्रभु जी लीला अपरंपार है।वह प्रत्येक जीव के ह्रदय में बसता है तो भी सबसे अलग और अलिप्त रहता है। वह अपने आपमें ही लीन रहना पसंद करे तो युगों के युग उसी तरह बिता देता है।तब केवल वह आप ही होता है, न कोई वेद, न पुरान, न शास्त्र, न कोई अन्य धर्म पुस्तक। वह प्रभु एक विशाल समुद्र की तरह है, कितना गहरा है यह वही जानता है। उसकी थाह पा सकने वाला अभी तक कोई पैदा नहीं हुआ।

परमात्मा की भक्ति के पांच सिद्धांत

परमात्मा की भक्ति के पांच सिद्धांत
भगवान की सच्ची भक्ति विकसित करने के लिए मार्गदर्शन करने के लिए ” भक्ति के पांच सिद्धांत” है। ये सिद्धांत स्पष्ट करते है कि ईश्वर के भक्त है को दुनिया को दूसरी दृष्टि के अनुसार देखने आते है, ईश्वर के प्रेम, दया और अनुग्रह के साथ। आइए एक एक करके इन पांच सिद्धांतो को जाने। महान गुरु कहते है:

1. भक्ति में अंतर्निहित पहला सिद्धांत यह है कि ईश्वर सभी का निर्माता है और सवर्ज्ञ है। वह स शुद्ध, निर्दोष और सम्पूर्ण है। वह सर्वव्यापी है। मनुष्य, जीवन की निचली प्रजातियां और वास्तव में पूरा ब्रह्मांड उसके अस्तित्व का प्रतीक है।हम सब उनके बच्चे है।

2. दूसरा सिद्धांत यह है कि यह ब्रह्मांड उसकी रचना है,और यह सभी सुंदर और खुशियों से भरा है।हर एक, निश्चित रूप से अपने मन की स्थिति या स्थिति के अनुसार इस दुनिया को देखता है।

3.तीसरा सिद्धांत यह है कि भगवान की इच्छा में खुश रहना चाहिए, और जो कुछ भी उसके लिए होता है, उसके लिए हमेशा संतुष्ट और आभारी रहना चाहिए। जो कुछ भी किया जा रहा है वह हमारे अपने भले के लिए है। यह संदेह की किसी भी छाया से परे है। जिसे हम मुसीबत मान सकते है, वह वास्तव में हमारे मन की ईस्थति को बढ़ाने के लिए आया है।

4.चोथा सिद्धांत यह है कि दूसरों की भावनाओ को आहत करने के लिए इसे सबसे बड़ा पाप माना जाना चाहिए।दूसरों को आराम और खुशी प्रदान करने के लिए, सर्वोच् जिम्मेदारी माना जाना चाहिए।

5. पांचवा सिद्धांत यह है कि व्यक्ति को अपने गुरु या गुरु का सहारा लेकर भक्त बनना चाहिए, ताकि इस तरह के उच्चतर व्यक्ति के संपर्क में रहने से भी अंततः उसी अवस्था को प्राप्त किया का सके।


ऐसे भक्त, भगवान के ऐसे प्रेमी, और न केवल विश्वास पर चलते है बल्कि वास्तव मै इन पाच सिद्धांतो का अहसास करते है।

परमात्मा कहा है?

मनुष्य के सामने यह सवाल हमेशा से रहा है कि परमात्मा वास्तव में है भी या नहीं। यदि है तो उससे मिलाप कैसे हो सकता है।इस विषय पर कई ग्रंथ पोथियां लिखी गई, पर इसका सही जवाब वक्त के पूर्ण संत सतगुरु जी दे सकते है क्यो कि वे परमात्मा से मिलाप कर चुके होते है। उनके अनुभव के आधार पर उनके पास प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। वे हमें बताते है कि जब से हम सृष्टि में आए है, उसी समय से हम परमात्मा की तलाश में इधर उधर भटक रहे है। जब कि परमात्मा हमारे अंदर है। 

गुरु ग्रंथ साहिब में पेज  न.1346 पर गुरु अमरदास जी ने फरमाया है।

हर मंदर एह सरिर है ज्ञान रत्न परघट होई”

असल में हरि मंदिर यह शरीर है। इसी शरीर में परमात्मा रूपी ज्ञान रत्न का अनुभव होगा। इसीलिए संत महात्मा कहते है कि मालिक की भक्ति, मालिक की खोज केवल अपने शरीर के अंदर जाकर ही करनी है।

संत महात्मा न केवल इस सच्चाई को साबित करते है कि परमात्मा है, बल्कि वे ये भी कहते है कि परमात्मा सिर्फ  “एक” है। यानी परमात्मा ही सच है, परमात्मा ही सब कुछ है, उसके सिवाय दूसरा कोई नहीं है जो इस सृष्टि को चला रहा है।ये मालिक की बनाई अपनी रचना है

गुरु ग्रंथ साहिब में पेज  न.463 पर गुरु नानकदेव जी ने फरमाया है।


“आपी ने आप साजिए, आपि ने रचिए नाउ।। कुदरत साजिए कर आसन डीठो चाउ।।”

उसने स्वयं को स्वयं बनाया;  उन्होंने खुद ही अपना नाम मान लिया।दूसरी बात यह है कि उन्होंने सृष्टि का निर्माण किया;  सृष्टि के भीतर बैठा हुआ, वह उसे प्रसन्नता के साथ देखता है। 

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