
पूर्ण संतो ने सावधान किया है कि गुरु होना ही काफी नहीं, गुरु पूर्ण होना चाहिए। पूरा गुरु वह है जो अपनी आत्मा परमात्मा में अभेद करके उसका रूप हो चुका हो ।
आदि ग्रंथ पृष्ठ स 286 में गुरु अर्जुन देव जी कहते है:
सत पुरख जिन जानिया, सतिगुर तिस का नाउ।।तिस कै संग सिख उधरे, नानक हर गुन गाउ।।
पूर्ण गुरु को ही संतो ने शब्द स्वरूपी, शब्द अभ्यासी सतगुरु कहकर पुकारा है।
सार बचन संग्रह, 16:1:5,9-11 में स्वामी जी महाराज कहते है:
गुरु सोई जो शब्द सनेही। शब्द बिना दुसर नहि सई।।शब्द कमावे सो गुरु पूरा। उन चरनन की हो जा धुरा।।और पहचान करो मत कोई। लक्ष अलक्ष न देखो सोई।।शब्द भेद लेकर तुम उनसे। शब्द कमाओ तुम तन मन से।।
आप फरमाते है कि महात्मा कि कोम, मजहब, मुल्क आदि को न देखो, केवल यह देखो कि वह शब्द स्वरुपी और शब्द अभ्यासी हो।पूर्ण संत सतगुरु प्रभु का रूप होता है, वह प्रभु की तरह अपनी किसी भी दात के लिए कोई कीमत नहीं मांगता। वह अपनी शरण में आने वाले जीवों को प्रभु से मिलाप की युक्ति मुफ्त सिखाता है। वह जीवों की परमार्थी सेवा निस्वार्थ भाव से करता है। वह अपनी हक हलाल की कमाई पर गुजारा करता है और अपनी नेक कमाई भी दूसरों में बांटकर खाता है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ 1245 गुरु नानक साहिब की बानी है:
गुरु पीर सदाएं मंगण जाइ।। ता कै मूल न लगीए पाई।।घाल खाई किछ हथऊ देई।। नानक राह पछनाही सई।।
आप सावधान करते है कि शिष्य के धन पर गुजारा करनेवाले व्यक्ति के चरणों पर भूले भटके भी माथा नहीं टेकना चाहिए। हमे सिर्फ वही महात्मा रास्ता दिखा सकता है, जो खुद हक हलाल की कमाई करे और अपनी नेक कमाई भी दूसरों के साथ बांटकर खाए।
यहां कहीं जगह शब्द या नाम आया है इसके बारे में हम अगली पोस्ट में बात करेंगे





