सबसे महंगा रंग

मुझसे मेरे खास मित्र ने पूछा कि, सबसे महंगा और अच्छा रंग कौन सा होता है?

मैंने कहा कीमत में तो कई रंग हैं जो महंगे होते हैं; उनमे से एक रंग है “लाल“!

तभी एक अन्य बुजुर्ग साहब जो मेरे पास बैठे थे उन्होंने कहा, बेटा! सबसे महँगा रंग “पीला“ होता है।

मैंने कहा, वो कैसे?

उन्होंने जो जवाब दिया वो बहुत ही लाजवाब था।

उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रख कर बड़े ही प्यार से कहा – बेटा जब अपनी “प्यारी बिटिया“ के हाथ पीले करोगे तब तुम्हे पता चलेगा कि कौन सा रंग सबसे अच्छा और महँगा होता है!!

मेरे पास कोई जवाब नही था

बेटियां दीये की तरह होती हैं जो ले जाता है उसी का घर जगमगाता है!!

बहरे आदमी के लिए सत्संग

एक संत के पास बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था।उसके कान तो थे पर वे नाड़ियों से जुड़े नहीं थे।एकदम बहरा, एक शब्द भी सुन नहीं सकता था।
किसी ने संत श्री से कहाः”बाबा जी ! वे जो वृद्ध बैठे हैं, वे कथा सुनते सुनते हँसते तो हैं पर वे बहरे हैं।”
बहरे मुख्यतः दो बार हँसते हैं – एक तो कथा सुनते-सुनते जब सभी हँसते हैं तब और दूसरा, अनुमान करके बात समझते हैं तब अकेले हँसते हैं।
बाबा जी ने कहाः “जब बहरा है तो कथा सुनने क्यों आता है ? रोज एकदम समय पर पहुँच जाता है।चालू कथा से उठकर चला जाय ऐसा भी नहीं है, घंटों बैठा रहता है
।”बाबाजी सोचने लगे, “बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा। रस नहीं आता होगा तो यहाँ बैठना भी नहीं चाहिए, उठकर चले जाना चाहिए। यह जाता भी नहीं है !”
बाबाजी ने उस वृद्ध को बुलाया और उसके कान के पास ऊँची आवाज में कहाः “कथा सुनाई पड़ती है ?”
उसने कहाः “क्या बोले महाराज ?”बाबाजी ने आवाज और ऊँची करके पूछाः “मैं जो कहता हूँ, क्या वह सुनाई पड़ता है ?”
उसने कहाः “क्या बोले महाराज ?” बाबाजी समझ गये कि यह नितांत बहरा है।बाबाजी ने सेवक से कागज कलम मँगाया और लिखकर पूछा।
वृद्ध ने कहाः “मेरे कान पूरी तरह से खराब हैं। मैं एक भी शब्द नहीं सुन सकता हूँ।” कागज कलम से प्रश्नोत्तर शुरू हो गया।
“फिर तुम सत्संग में क्यों आते हो ?” “बाबाजी ! सुन तो नहीं सकता हूँ लेकिन यह तो समझता हूँ कि ईश्वरप्राप्त महापुरुष जब बोलते हैं तो पहले परमात्मा में डुबकी मारते हैं। संसारी आदमी बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती हैं। मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूँ पर उसके आंदोलन मेरे शरीर को स्पर्श करते हैं।
दूसरी बात, आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है।”
बाबा जी ने देखा कि ये तो ऊँची समझ के धनी हैं। उन्होंने कहाः ” दो बार हँसना, आपको अधिकार है किंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप रोज सत्संग में समय पर पहुँच जाते हैं और आगे बैठते हैं, ऐसा क्यों ?”
“मैं परिवार में सबसे बड़ा हूँ। बड़े जैसा करते हैं वैसा ही छोटे भी करते हैं। मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा। शुरुआत
में कभी-कभी मैं बहाना बना के उसे ले आता था। मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहाँ ले आया, पत्नी बच्चों को ले आयी – सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा, कुटुम्ब को संस्कार मिल गये।”
ब्रह्मचर्चा, आत्मज्ञान का सत्संग ऐसा है कि यह समझ में नहीं आये तो क्या, सुनाई नहीं देता हो तो भी इसमें शामिल होने मात्र से इतना पुण्य होता है कि व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप ताप मिटने एवं एकाग्रतापूर्वक सुनकर इसका मनन-निदिध्यासन करे, उसके परम कल्याण में संशय ही क्या?

ज्ञान

ज्ञान ‘ ज्ञा ‘ धातु से निकला है जिसका अर्थ है जानना । अंग्रेज़ी में ‘ know ‘ भी ‘ज्ञा ‘ का ही एक रूप है । आम लोगों ने केवल वाचक ज्ञान को ही काफ़ी समझ लिया है और इसी पर ज़ोर देते नज़र आते हैं । वास्तव में ज्ञान – ध्यान केवल बुद्धि फैलाव का नाम नहीं है । गीता में ज्ञान और विज्ञान का उल्लेख आया है । सृष्टि के सारे नाशवान पदार्थों में एक ही अविनाशी परमपिता परमात्मा व्याप्त हो रहा है , इस अनुभव को ज्ञान माना है । उस नित्य परमेश्वर से इन सभी नाशवान पदार्थों की उत्पत्ति के ज्ञान को विज्ञान कहा है । गीता ( 6 : 8 ) में बताया गया है कि ज्ञान और विज्ञान से तृप्त , योगयुक्त मनुष्य समस्त जीवों में परमेश्वर को और परमेश्वर में संपूर्ण प्राणियों को देखता है ।

वाचक ज्ञान , ध्यान यानी विचार आदि ( जो मन – बुद्धि का फैलाव है ) की भी आवश्यकता है ताकि हम आदर्श को समझ सकें , पर समझकर उस आदर्श को पाने के लिए यत्न करना पड़ता है , जो मन – बुद्धि को स्थिर करने पर ही हो सकता है ।

गुरवाणी में लिखने और पढ़ने को या बुद्धि के विचार को ज्ञान नहीं माना गया बल्कि शब्द और नाम , सच और कीर्तन को ज्ञान कहा है । अंदर सहज की उस ध्वनि ( वाणी ) को , जो सदा घट – घट में हो रही है और सब जगह व्याप्त है , ज्ञान कहा है :

गिआन धिआन गुर सबद है मीठा ॥ गुर किरपा ते किनै विरलै चख डीठा ॥ गुरु अमरदास , आदि ग्रन्थ , पृ . 162

गुर गिआन पदारथ नाम है हर नामो दे द्रिड़ाए । जिस परापत सो लहै गुर चरणी लागै आए ॥ गुरु रामदास , आदि ग्रन्थ , पृ .759

गियान धिआन सच गहिर गंभीरा ॥ कोए न जाणे तेरा चीरा ॥ गुरु नानक देव , आदि ग्रन्थ , पृ .1034

गुरु ज्ञान का साक्षात रूप है । उससे ही ज्ञान की प्राप्ति होती है , जो गुरुमुख बनने पर मिल सकती है । गुरवाणी में स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है कि सतगुरु से ज्ञान पैदा होता है । यह ज्ञान ‘ निरबान ‘ है और बिना सतगुरु के किसी को इसका बोध नहीं होता । यह आज तक बिना गुरु न किसी को मिला है और न मिल सकता है क्योंकि यह कमाई का भेद है और कमाई वालों के द्वारा ही मिल सकता है :

भाई रे गुर बिन गिआन न होए ॥ पूछहो ब्रहमे नारदै बेद बिआसै कोए ॥ गुरु नानक देव , आदि ग्रन्थ , पृ .59

Q & A

A questioner asked Maharaj Charan Singh Ji :

When we have a choice of two ways to go in our life – let’s say we have to live in one place and all of a sudden there’s a chance we can live somewhere else – we sometimes experience a turmoil. You’re not sure which way to go, whether you want to go – to move to the other place – or stay where you are. Yet you always tell us not to worry. It seems like in order not to worry about that, we should just surrender that problem, but how do we do that?

Maharaj Ji answered:

Brother, instead of worrying about the situation, one should try to do one’s best. With your best available intellect or reasoning or thinking or intuition – whatever you may have – do your best, then leave it to the Lord. Still you can be wrong, but then, you see, you have no other option. What else can you do? You have done your best. Then leave it to the Lord.

Maharaj Ji continued by saying:

If he [the Lord] doesn’t want us to do the right thing, we will never do the right thing. If he wants us to do that right thing, he will also give us that understanding to do the right thing. If he doesn’t want us to do the right thing, he will not give us that understanding to do the right thing. And it doesn’t mean that if you know the right thing, you will definitely be able to do the right thing. Sometimes we know the right thing, but we never are able to do the right thing because we become a victim of certain weaknesses. Even knowing what is right, we can’t do the right thing. Or sometimes we don’t get that understanding to do the right thing.

So our doing the right thing depends on the Lord’s will. We are not in control of the kind of choices that we make – good or bad.

Maharaj Ji ended with:

Things happen in whatever way it suits him, however he wants them to happen. So if he wants us to behave in that way, he will give us the right understanding to behave in that way. If he wants to keep us in the dark, we will remain in the dark.

Spiritual Perspective Vol III

Saint’s Advise for us

HUZUR MAHARAJ JI ADVISED US:

“We have to go along with the waves of destiny. You can never change the events of life, no matter how much you plan, no matter how much you pray. But you can always adjust to the events of life. Adjusting to the events of life will give you happiness; events will never adjust to your liking.”

“We cannot change the cycle of our life, the cycle of our karmas. We have to swim along with the waves; we cannot swim across the waves. So we have to accept the facts of life as they come. The very fact that we have to go along with the waves automatically makes us happy – there is no other way. We have to accept the facts

ऊंची उड़ान

बहुत समय पहले की बात है,एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये, वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे,राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया। कुछ समय पश्चात राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे, और अब पहले से भी शानदार लग रहे हैं, राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे, आदमी से कहा, मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ, तुम इन्हें उड़ने का इशारा करो,

आदमी ने ऐसा ही किया, इशारा मिलते ही
दोनों बाज उड़ान भरने लगे पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था वहीँ दूसरा, कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था , ये देख राजा को कुछ अजीब लगा, क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी
अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये
दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा..?
राजा ने सवाल किया,

सेवक बोला, जी हुजूर, इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है, वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं, राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे, और वो दूसरे बाज को भी उसी तरह उड़ता देखना चाहते थे,

अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया, कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा, फिर क्या था,

एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे, पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता, फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ,राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं, उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ
और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था,

वह व्यक्ति एक किसान था, अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ, उसे इनाम में
स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया,

मालिक..!
मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ ,
मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता ,
मैंने तो बस वो डाल काट दी,जिस पर बैठने का आदि हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा ।

कथासार

हम सभी ऊँची उड़ान भरने के लिए ही बने हैं, लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है, उसके इतने आदि हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की क्षमता को भूल जाते हैं, जन्म जन्म से हम वासनाओं की डाल पर बैठते आए हैं और अज्ञानवश ये भी हमें ज्ञात नहीं कि जो हम आज कर रहे हैं, वहीं हमने जन्मों जन्मों में किया है, और ये हम भूल ही गए हैं कि हम उड़ान भर सकते हैं, अतृप्त वासनाओं की डाल पर बैठे बैठे हमें विस्मृत हो गया है, कि ध्यानरूपी पंख भी हैं, हमारे पास जिससे हम उड़ान भर सकते हैं, पदार्थ से परमात्मा तक की, व्यर्थ से सार्थक की…

ध्यान में मौत का उत्सव


एक साधु जीवनभर इतना प्रसन्न था कि लोग हैरान थे। लोगों ने कभी उसे उदास नहीं देखा, कभी पीड़ित नहीं देखा।
उसके शरीर छोड़ने का वक्त आया और उसने कहा कि अब मैं तीन दिन बाद मर जाऊंगा।

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि जो आदमी जीवन भर हंसता था, उसकी मौत पर कोई रोए नहीं।
जब मैं मर जाऊं, तो इस झोपड़े पर कोई उदासी न आए।
यहां हमेशा आनंद था, यहां हमेशा खुशी थी।
मेरी मौत को दुख मत बनाना, मेरी मौत को एक उत्सव बनाना।

लोग बहुत दुखी हुए। वह तो अदभुत आदमी था। और जितना अदभुत आदमी हो, उतना उसके मरने का दुख घना था।
उसको प्रेम करने वाले बहुत थे, वे सब तीन दिन से इकट्ठे होने शुरू हो गए।
वह मरते वक्त तक लोगों को हंसा रहा था, अदभुत बातें कह रहा था और
उनसे प्रेम की बातें कर रहा था।

सुबह मरने के पहले उसने एक गीत गाया। गीत गाने के बाद उसने कहा, ‘स्मरण रहे, मेरे कपड़े मत उतारना। मेरी चिता पर मेरे पूरे शरीर को कपड़ों सहित चढ़ा देना । मुझे नहलाना मत।’

वह मर गया। उस की इच्छा थी इसलिए उसे कपड़े सहित चिता पर चढ़ा दिया।
वह जब कपड़े सहित चिता पर रखा गया, लोग उदास खड़े थे, लेकिन देखकर हैरान हुए।
उसने कपड़ों में फुलझड़ी और पटाखे छिपा रखे थे।

वे चिता पर चढ़े और फुलझड़ी और पटाखे छूटने शुरू हो गए। चिता उत्सव बन गयी।

लोग हंसने लगे और उन्होंने कहा, ‘जिसने जिंदगी में हंसाया, वह मौत में भी हमको हंसाकर गया है।’

जिंदगी को हंसना बनाना है। जिंदगी को एक खुशी और मौत को भी एक खुशी और जो आदमी ऐसा करने में सफल हो जाता है, उसे बड़ी धन्यता मिलती है और बड़ी कृतार्थता उपलब्ध होती है।

जीवन और मृत्यु बिल्कुल पास पास हैं एक ही सिक्के के दो पहलु की तरह।
जो क्रियाओं के अभ्यास से स्वांसों को पहचान कर मृत्यु को जान लेता है वह जीवन को भी जान लेता है और शांति का अनुभव कर लेता है। और हृदय में बैठे परमानंद की प्राप्ति करके सत्-चित्-आनंद का भी अनुभव कर लेता है और अपना मनुष्य जीवन सफल बना लेता है..!!

घर में झगड़ा- कबीर साहिब

कबीर कहते हैं कि मनुष्य – शरीर एक घर के समान है जिसमें घर का मालिक सुख और चैन नहीं पाता क्योंकि घरवाले आपस में झगड़ते रहते हैं । घरवालों में हैं पाँच लड़के ( पाँच इन्द्रियाँ ) और पत्नी दुर्मति ( मन की दूषित प्रवृत्तियाँ ) । प्रत्येक इन्द्रिय अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये जीव को अलग – अलग दिशा में खींचती है और दुर्मति उसे संसार के पदार्थों की ओर ले जाती है । जो व्यक्ति पाँचों इन्द्रियों तथा दुर्मति को वश में करके शरीररूपी घर में शान्ति स्थापित कर लेता है , वह सच्चे ज्ञान को प्राप्त करके अपना मनुष्य – जन्म सफल कर लेता है ।

संतो घर में झगरा भारी । राति दिवस मिलि उठि उठि लागैं , पाँच ढोटा ‘ एक नारी ॥ – न्यारो न्यारो भोजन चाहें , पाँचो अधिक सवादी । कोउ काहु को हटा न माने , आपुहि आप मुरादी ॥दुर्मति केर दोहागिन ‘ मेटो , ढोटेहि चाप चपेरे । कहैं कबीर सोई जन मेरा , जो घर की रारि निवेरे ‘ । बीजक , पृ .31

गुरु की मेहरबानी

मैनें एक आदमी से पूछा कि गुरू कौन है ! वो सेब खा रहाथा, उसने एक सेब मेरे हाथ में देकर मुझसे पूछा । इसमें कितने बीज है बता सकते हो ?

सेब काटकर मैंने गिनकर कहा तीन बीज हैं ! उसने एक बीज अपने हाथ में लिया और फिर पूछा इस बीज में कितने सेब हैं, यह भी सोचकर बताओ? मैं सोचने लगा, एक बीज से एक पेड़, एक पेड़ से अनेक सेब, अनेक सेबों में फिर तीन-तीन बीज, हर बीज से फिर एक-एक पेड़ और यह अनवरत क्रम !

वो मुस्कुराते हुए बोले :- बस इसी तरह परमात्मा की कृपा हमें प्राप्त होती रहती है ! बस हमें उसकी भक्ति का एक बीज अपने मन में लगा लेने की ज़रूरत है :

गुरू एक तेज है:- जिनके आते ही, सारे सन्शय के अंधकार खत्म हो जाते हैं !

गुरू वो मृदंग है:- जिसके बजते ही अनाहद नाद सुनने शुरू हो जाते है !

गुरू वो ज्ञान हैं :-जिसके मिलते ही पांचो शरीर एक हो जाते हैं !

गुरू वो दीक्षा है:- जो सही मायने में मिलती है तो भवसागर पार हो जाते है !

गुरू वो नदी है :- जो निरंतर हमारे प्राण से बहती हैं !

गुरू वो सत चित आनंद है:- जो हमें हमारी पहचान देता है !

गुरू वो बासुरी है :-जिसके बजते ही अंग अंग थीरकने लगता है !

गुरू वो अमृत है :-जिसे पीकर कोई कभी प्यासा नही रहता है !

गुरू वो मृदँग है :-जिसे बजाते ही सोहम नाद की झलक मिलती है !

गुरू वो कृपा ही है:- जो सिर्फ कुछ सद शिष्यों को विशेष रूप मे मिलती है और कुछ पाकर भी समझ नही पाते हैं !

गुरू वो खजाना है :-जो अनमोल है !

गुरू वो प्रसाद है :-जिसके भाग्य में हो, उसे कभी कुछ भी मांगने की ज़रूरत नही पड़ती हैं

Meaning and Value of Satsang

At the Dera in March 1983, Daryai Lal Kapur, asked Maharaj Charan Singh ji to talk about the Meaning and Value of Satsang.

Q. Maharaj ji, my understanding of the term ‘Satsang’ is where there are Two Satsangis or more gathered together at a proper place, reading some text bearing Santmat and trying to understand those texts, even though the Master may not be physically present there. It is assumed that the Master is there, not in person but in Spirit. Is that correct?

A. Yes, As you know, the real meaning of the word ‘Satsang’ is the company of Truth. Sat means everlasting truth, and sang means the company of the truth. So wherever we meet in the name of the Father, wherever the Lord is discussed, wherever we fill each other with his love and devotion, strengthen each others’ faith to worship him, I think that is Satsang, because naturally in our conversation, Our Master is there, the Lord is there. Without that, Satsang means nothing.

We always discuss the teachings, whether he is physically present or not. But naturally when he is being discussed, he is very much present. He is very much alive when we are discussing his teachings and the way he has told us to lead our life. Satsang increases our love and devotion for our Master, for the Father, and we become an example and give strength to each other in Satsang. So as long as the Father is there, the Lord and Master is there, that is Satsang.

Whether you read from the texts or just have conversations about him – that is Satsang. Naturally when there are too many people, you can’t personally discuss anything with anybody – that will just create confusion. So we read from some mystic and try to explain the teachings from that. If there are five, ten people, a few people, a reasonable group, even without any book, they can discuss the teachings, the Master, the Lord. They are creating faith in each other, love and devotion in each other for the father – that is also Satsang. It is not essential that a text be read. But naturally in a multitude, in a crowd, you have no other alternative. Either you can give a lecture on some subject of Santmat, or you can take some text to explain the teachings. It comes to the same thing.

Q. But is it essential that the physical presence of the Master be there?

A. No, it is not essential. As long as the Master is there in our Mind, and we are filled with love and devotion – our conviction is being strengthened – he is very much there. Because he is within every one of us. Christ says, wherever you meet in my name, I’ll be there. That is what he means. Even if the Master is sitting there, and we are not there – being there, we are not there -for us that is not Satsang. And even if the Master is not there physically but is very much there in our mind, he is there – that is Satsang for us. It depends upon us what mood we are in.

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