जब तक वो देता रहेगा, तब तक मैं भी देता रहुँगा !!!

एक बार एक सत्संग के बाद, गुरुजी एक कतार में खड़े लोगों को प्रसाद बाँट रहे थे। एक छोटा लड़का गुरुजी तक भागके गया और गुरुजीने वह छोटे लड़के को प्रसाद दिया … लड़का प्रसाद लेकर भाग गया …
और फिर गुरुजी के पास गया और गुरुजीने उसे प्रसाद फिर से दिया … पूर्ण उत्साह के साथ, लड़का वापस गुरुजी के पास गया, फिर से, और गुरुजीने वापस उसे प्रसाद दिया …
यह कुछ समय के लिए जारी रहा … एक स्वयंसेवक जो यह सब देख रहा था वह उलझन में था।
उसने गुरुजी से पूछा, क्यों वह उस छोटे से लड़के को बाँरबाँर प्रसाद दे रहे है, जबकि दूसरे लोग प्रसाद पाने के लिए कतार में इंतजार कर रहे हैं???? …
गुरूजी मुस्कराए और बोले, “तुमने देखा “वो मुझसे प्रसाद लेकर जा रहा है”, पर मैने ये भी देखा कि वो मैंने दिया हुआ प्रसाद पीछे जाकर बाँट रहा है …
जब तक वो देता रहेगा, तब तक मैं भी देता रहुँगा !!!

जहाँ आसा तहाँ बासा

जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जायें , तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिंदु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा ।सेंट मैथ्यू

कहा जाता है कि कबीर साहिब जब बाहर जाया करते थे तो एक आदमी उन्हें अकसर खेत में बैठा मिलता था । एक दिन कबीर साहिब ने उससे कहा कि ख़ाली बैठे रहते हो , परमात्मा का भजन किया कर , जिससे तुझे फ़ायदा होगा । कहने लगा कि अभी बच्चे छोटे – छोटे हैं , जवान हो जायें और अपने पैरों पर खड़े हो जायें , फिर भजन करूंगा । जब बच्चे जवान हो गये , कबीर साहिब फिर मिले और कहा कि भजन किया कर , तो बोला कि इनकी शादी हो जाये फिर भजन करूंगा । जब शादी हो गयी तब कबीर साहिब ने कहा कि अब बता ! जवाब दिया कि पोतों की खुशियाँ देख लूँ । पोते भी हुए , कबीर साहिब फिर मिले और कहा कि अब तो भजन करो । कहने लगा कि पोते छोटे – छोटे हैं , जवान हो जायें फिर भजन करूंगा । जब पोते जवान हो गये तो कबीर साहिब ने फिर पूछा । बोला , ‘ ये लापरवाह हैं । रात को सो जाते हैं , अगर मैं न जायूँ तो चोरी हो जायेगी । ‘ कुछ समय बाद कबीर साहिब फिर वहाँ से गुज़रे तो बाबा नज़र न आया । पूछा कि बाबा कहाँ है ? बेटों और पोतों ने कहा कि वह तो मर गया है ।

कबीर साहिब कहा कि बहुत अफ़सोस की बात है । बेचारे ग़रीब आदमी ने अपना सारा जीवन व्यर्थ ही गंवा दिया । यदि वह थोड़े समय के लिए भी परमात्मा की भक्ति करता तो दुनिया के जंजाल से बच जाता । फिर कबीर साहिब ने अंतर्ध्यान होकर देखा कि घर में दुधारु पशुओं के साथ उसकी बहुत मुहब्बत थी । गाय , भैंस पालता था । एक गाय के साथ उसका विशेष लगाव था । जब मरा तो उस गाय के पेट में बछड़ा बनकर आया ।

बछड़ा बड़ा होकर जब बैल बना तो उसे हल में जोत दिया गया । सारी उम्र हल में जुता रहा । आख़िर बूढ़ा हो गया । जब उनके काम का न रहा तो उन्होंने उसे गाड़ीवान को बेच दिया । उसने भी कुछ साल गाड़ी में जोता । जब उसके काम का न रहा तो उसने तेली को दे दिया , जिसने उसे काफ़ी समय कोल्हू में जोता । फिर जब उसके काम का भी न रहा तो उसने क़साई को दे दिया । क़साई ने मारकर उसका मांस बेच दिया , बाक़ी चमड़ा नकारेवाले ले गये । उन्होंने नक़्क़ारे पर मढ़ा लिया , अब खूब डंडे पड़ते हैं । यह देखकर कबीर साहिब ने कहा :

बैल बने हल में जुते , ले गाड़ी में दीन । तेली के कोल्हू रहे , पुनि घेर कसाई लीन ॥ माँस कटा बोटी बिकी , चमड़न मढ़ी नकार । कुछेक कर्म बाकी रहे , तिस पर पड़ती मार ॥

मालिक कैसे दया करता है ?

सतगुरु के बिना हकीक़त का भेद नहीं खुल सकता , न कोई मन – माया के बंधनों से छूट सकता है और बिना शब्द के न कोई मालिक से मिल सकता है । केवल सतगुरु ही सुरत को शब्द के साथ जोड़ता है । महाराज सावन सिंह

गुरु अमरदास जी के समय का वृत्तांत है । आप बाईस बार गंगा स्नान के लिए गये । जब आख़िरी बार गंगा जा रहे थे तो रास्ते में एक ब्रह्मचारी मिला जो गंगा स्नान के लिए ही जा रहा था । उसने पूछा कि कहाँ जा रहे हो , कहने लगे कि गंगा स्नान करने जा रहा हूँ ।

दोनों इकट्ठे चल पड़े । दोनों ने इकट्ठे रोटी खायी , बातें करते – करते गंगा पहुँचे , स्नान किया और वापस हो लिए । पहले गुरु अमरदास जी का घर आया । अभी ब्रह्मचारी की मंज़िल और आगे थी । बातचीत करते हुए उनमें प्रेम – प्यार हो चुका था । दोनों एक – दूसरे को आदर के साथ देखते थे । गुरु साहिब ब्रह्मचारी को घर ले गये । जब रात को सोने लगे तो ब्रह्मचारी ने पूछा , ‘ भाई अमर ! तुम्हें गुरु से नाम लिए कितना समय हुआ है ? ‘ अमरदास जी ने जवाब दिया , ‘ मेरा तो कोई गुरु नहीं । ‘ यह सुनते ही वह बोला , “ हैं ! क्या तेरा कोई गुरु नहीं ? तू निगुरा है । अफ़सोस ! अगर मुझे पता होता कि तू निगुरा है तो मैं कभी तेरी रोटी न खाता । मेरा सारा कर्म – धर्म नष्ट हो गया । ‘ यह कहकर वह बड़े दुःखी दिल से उसी वक़्त अपना बिस्तरा लेकर चल पड़ा ।

जब वह चला गया तो अमरदास जी को बहुत अफ़सोस हुआ । अब दिल में सोचा कि बासठ साल की उम्र हो गयी , अभी तक मुझे कोई गुरु नहीं मिला । हे गंगा माई ! तू गुरु मिला दे । हे गंगा माई ! अब तू ही गुरु मिला दे ; हे कालिका ! कोई गुरु मिला दे । इसी चिंता में रात भर नींद न आयी ।

जब सुबह हुई तो बीबी अमरो ( गुरु अंगद साहिब की लड़की ) ने , जो आपके भाई के बेटे से ब्याही हुई थी , गुरबानी पढ़नी शुरू की । वह रोज़ सवेरे उठकर जपुजी पढ़ती थी । अब ज्यों – ज्यों वह पढ़ती गयी , बानी अमरदास जी के दिल को बींधती गयीं । आप प्यार के साथ अंदर जाकर सुनते रहे ।

आपने उससे पूछा कि बेटी ! यह किसकी बानी है ? उसने कहा , ‘ जी , यह गुरु नानक साहिब की बानी है जिनकी गद्दी पर मेरे पिता जी विराजमान हैं । ‘ दिल में प्यार था , तड़प थी ; कहने लगे मुझे भी वहाँ ले चल । उसने कहा , ‘ जब तक मेरे पिता जी मुझे आप न बुलायें , मैं वहाँ नहीं जा सकती । उनका यही हुक्म है । ‘ अमरदास जी ने कहा , ‘ तू मुझे ज़रूर लेकर चल । इसमें अगर कोई पाप लगे , तो वह मुझे लग जाये । अगर तेरे पिता जी नाराज़ होंगे तो मेरी ज़िम्मेदारी है । ‘

आख़िर वह उन्हें साथ ले गयी । जब गुरु अंगद साहिब के दरबार के नज़दीक पहुँची तो बोली कि आप बाहर ठहरें , मैं अंदर जाकर अर्ज़ करती हूँ । जब अंदर गयी तो गुरु अंगद साहिब ने कहा , ‘ बेटी ! जिसको अपने साथ लायी हो , उसको अब अंदर भी ले आओ । ‘

जब अमरदास गुरु अंगद देव की हुजूरी में पेश हुए तो उनके चरणों में गिर पड़े और नाम का भेद पाने के लिए विनती की । गुरु अंगद देव जी को अमरदास के प्रेम की तड़प और उनकी योग्यता का ज्ञान था , इसलिए गुरु अंगद देव जी ने उन्हें शिष्य स्वीकार कर लिया और समय आने पर उन्हें अपने रंग में रँगकर अपना स्वरूप बना लिया और अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया ।

यहाँ तअल्लुक़ इस बात से नहीं कि किस प्रकार गुरु अंगद देव जी ने अमरदास जी को रूहानी दौलत से भरपूर कर दिया और उन्हें अपना रूप बना लिया , बल्कि इस बात से है कि जिनको मनुष्य – जन्म पाकर पूरा गुरु मिल गया , उनका जन्म सफल हो गया । वे अभागे हैं जिनकी सारी उम्र गुज़र गयी दुनिया के काम करते हुए , लेकिन अब तक पूरा गुरु नहीं मिला ।

गूंगे का गुड़

सन्तों – महात्माओं ने आन्तरिक सूक्ष्म रूहानी अनुभवों , रूहानी मण्डलों की स्थिति और परमात्मा से मिलाप के सहज ज्ञान और आनन्द को अकथ , अकह , ला – बयान कहा है । यह गूंगे का गुड़ है । जिस तरह गूंगा व्यक्ति गुड़ का स्वाद बयान नहीं कर सकता , उसी प्रकार इस सूक्ष्म अनुभव को स्थूल इन्द्रियों के स्तर पर किसी सांसारिक भाषा में बयान कर सकना असम्भव है । जिस तरह बाहरी जगत् में आगरा के ताजमहल , अमृतसर के हरमन्दर साहिब की सुन्दरता की तुलना किसी दूसरी चीज़ से नहीं की जा सकती , उसी प्रकार आन्तरिक सूक्ष्म आनन्द भी किसी बाहरी वस्तु या किसी बाहरी रस से तुलना नहीं की जा सकती है । भीखा साहिब कहते हैं :

भीखा बात अगम की कहन सुनन में नाहिं । जो जाने सो कहे ना कहे सो जाने नाहिं ।

आप समझाते हैं कि आन्तरिक सूक्ष्म रूहानी अनुभव भाषा में बयान नहीं किये जा सकते , जिसके अन्तर में रूहानी रहस्य प्रकट हो जाते हैं , उसकी जुबान बन्द हो जाती है । कबीर साहिब कहते हैं :

बाबा अगम अगोचर कैसा , तातें कहि समझाओं ऐसा ॥ जो दीसै सो तो है नाहीं , है सो कहा न जाई । सैना बैना कहि समझाओं , गूंगे का गुड़ भाई । कबीर साहिब की शब्दावली , भाग 1 , पृ .71

व्यर्थ गयी कमाई

जनम जनम की इस मन कउ मल लागी काला होआ सिआह ॥ खंनली धोती उजली न होवई जे सउ धोवण पाह ॥ गुरु अमरदास

पराशर जी सारी उम्र योगाभ्यास में रहे । पूर्ण योगी होकर घर को वापस आ रहे थे । रास्ते में एक नदी पड़ती थी । जब वहाँ आये तो मल्लाह से कहा कि मुझे पार उतार दो । मल्लाह ने कहा कि हम रोटी खा लें , रोटी खाकर तुम्हें पार उतार देंगे । पराशर जी कहने लगे , धूप चढ़ जायेगी , मुझे जल्दी पार पहुँचा दो , नहीं तो मैं श्राप दे दूंगा । अब जो काम माँ – बाप करते हैं , बच्चे भी बड़ी आसानी से कर लेते हैं । मल्लाह की लड़की ने बाँस लिया , नाव की रस्सी खोली और कहा , पिता जी , मैं इन्हें पार उतारकर आती हूँ ।

अब ऋषि सारी उम्र जंगलों में रहा , औरत की शक्ल नहीं देखी थी । देखकर मन चलायमान हो गया । अपना बुरा विचार प्रकट किया । लड़की ने कहा कि हम लोग मछुए हैं , मेरे मुँह से आपको बदबू आयेगी । ऋषि ने कहा कि योजन गंधारी हो जा । उसके मुँह से चार – पाँच मील तक ख़ुशबू आने लगी । लड़की बोली , सूर्य देवता देख रहे हैं कि हम पाप करने लगे हैं , ये हमारी गवाही देंगे । ऋषि ने पानी की चुल्ली भरकर मारी और चारों ओर धुंध कर दी । लड़की फिर कहने लगी कि यह जल वरुण देवता हैं , यह देख रहे हैं । ऋषि ने रेत की मुट्ठी लेकर दरिया में फेंक दी और कहा , रेत बन जा । पानी की जगह रेत हो गयी ।

देखो ! मन कितना ख़तरनाक है । पूर्ण गुरु की शरण न लेने के कारण महात्मा अपने मन को नहीं रोक सके बल्कि योग द्वारा प्राप्त अपनी सारी कमाई नष्ट कर दी ।

बरतन को टकोरना

सील गहनि सब की सहनि , कहनि हीय मुख राम । तुलसी रहिए एहि रहनि , संत जनन को काम ॥ गोस्वामी तुलसीदास

दादू जी एक कामिल फ़क़ीर हुए हैं । उनका जन्म मुसलमान परिवार में हुआ था । एक बार दो पंडित आपके पास इस ग़रज़ से आये कि चलकर सत्संग सुनें और गुरु धारण करें । जब उनकी कुटिया के पास पहुँचे तो देखा कि आगे एक आदमी नंगे सिर बाहर जा रहा था । पंडितों ने अपशकुन समझा कि नंगे सिर वाला आदमी मिला है । अपशकुन टालने के लिए उस नंगे सिर वाले व्यक्ति के सिर पर दो तमाचे मार दिये । फिर पूछा कि दादू का डेरा कहाँ है ? उसने अँगुली से इशारा करते हुए कहा कि वह रहा । जब डेरे पहुँचे तो पता चला कि दादू साहिब बाहर गये हुए हैं । उन्होंने इंतज़ार किया । जब दादू साहिब आये और पंडितों ने देखा कि यह तो वही है जिसके सिर पर दो तमाचे मारे थे , तो काँपने लगे । लेकिन दादू साहिब हँस पड़े और बोले , ‘ लोग दो टके की हाँडी लेने से पहले उसे टकोर लेते हैं , आप तो गुरु धारण करने आये हो , खूब परखो । जब दिल माने विश्वास करो , फिर गुरु स्वीकार करो । ‘

महात्मा बड़े शांत स्वभाव के होते हैं । संतों में जो नम्रता , धैर्य और क्षमा होती है , उसको बयान कर सकना संभव नहीं । गुरु धारण करने से पहले पूरी तसल्ली कर लेनी चाहिए , क्योंकि गुरु में पूर्ण विश्वास के बिना परमार्थ में उन्नति नहीं की जा सकती ।

भजन – सुमिरन का महत्त्व

जो गुरु का भक्त है वह चाहे कैसा भी है , लेकिन गुरु उसे नरकों में नहीं जाने देता । महाराज सावन सिंह

जब राजा जनक स्थूल शरीर को त्यागकर अपने धाम की ओर जा रहे थे , रास्ते में क्या देखते हैं कि नरकों में जीव जल रहे हैं और चीख – पुकार कर रहे हैं । उन्होंने पहले यमदूतों से पूछा कि इन्हें यातनाएँ क्यों दी जा रही हैं ? कोई जवाब न पाकर धर्मराज से पूछा कि इनका छुटकारा कैसे हो सकता है ? धर्मराज ने कहा कि अगर कोई महात्मा अपने नाम की कमाई दे तो आज़ाद हो सकते हैं । राजा जनक ने वहाँ ढाई घड़ी के तप का फल दिया और तब वे जीव नरक से आज़ाद होकर मृत्युलोक में आ गये और उन्हें मनुष्य – जन्म मिला ।

काला नूर

जो नाम लेकर रख छोड़े , उसे फ़ायदा कुछ नहीं । जिस तरह किसी कुम्हार को हीरा मिल गया , उसने गधे के गले में बाँध दिया , कद्र नहीं की ।महाराज सावन सिंह

एक मिरासी ग़लती से मसजिद में जा पहुँचा । वहाँ पाँच नमाज़ी मौजूद थे । उन्होंने कहा कि आओ , वुजू करके नमाज़ पढ़ें । मिरासी ने पूछा , ‘ नमाज़ से क्या फ़ायदा होता है ? ‘ उन्होंने जवाब दिया कि नमाज़ पढ़ने से चेहरे पर खुदा का नूर आता है । यह सुनकर मिरासी बोला , ‘ बहुत अच्छा ! अभी तो मुझे काम है , पर घर जाकर ज़रूर पढूँगा । ‘ वे पाँचों नमाज़ में लग गये और वह घर आ गया ।

जब रात के पिछले पहर में उठा तो सोचने लगा कि अगर वुजू किया तो नशा टूट जायेगा , क्योंकि उसे नशा करने की आदत थी । नमाज़ भी ज़रूर पढ़नी थी ताकि चेहरे पर ख़ुदा का नूर आ जाये , लेकिन बिना वुजू नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं होता । यह सोचकर उसने मिट्टी से करने का फ़ैसला किया । यह सोचकर अँधेरे में ज़मीन पर हाथ मारकर मुँह पर फेरने लगा । रात को कहीं तवा नीचे उलटा पड़ा रह गया था । हाथ तवे पर जा लगा । बड़े प्रेम से उसने वुजू करके नमाज़ पढ़ी । जब दिन निकला तो मिरासिन से पूछने लगा , ‘ देख ! क्या मेरे चेहरे पर नूर आया है ? ‘ उसने कहा , ‘ अगर नूर का रंग काला होता है , तो वह घटा बनकर आया है और अगर नूर गोरा होता है या उसका कोई और रंग होता है , तो जो पहले था वह भी जाता रहा है !

यही हाल हमारा है । हम नाम लेकर कमाई तो करते नहीं , और कहते हैं कि रूह खंडों – ब्रह्मांडों पर चढ़ जाये ।

भगवान कृष्ण ने गीता ( 7:16 )

भगवान कृष्ण ने गीता ( 7:16 ) में बताया है , “ चार प्रकार के लोग परमेश्वर की आराधना करते हैं : दु : खी , भोगों की चाह रखनेवाले , परमार्थी और बुद्धिमान ज्ञानी । ” दुःखी , दु : खों की निवृत्ति के लिए ; भोगी , भोगों की प्राप्ति के लिए ; ज्ञानी , ज्ञान की प्राप्ति के लिए और परमार्थी , मालिक से मिलाप के आनंद को पाने के लिए ।

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