मन की उत्पत्ति और स्वभाव।

हंसा मन की वृति कछु लखि न परै , कहि न जात कछु हरे हरे ॥ टेक ॥ 1 ॥ पांच तत्व मन मनहि तीन गुण , मन के रूप तेहुं लोक खरे ॥ 2 ॥ मन मसजिद अरु मनहि देवहरा , मनहिं देव मन सेव करै ॥ 3 ॥ पाप पुन्य मन आवागवन मनContinue reading “मन की उत्पत्ति और स्वभाव।”

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