एक संत ने अपने दो शिष्यों को दो डिब्बों में मूँग के दाने दिये और कहाः “ये मूँग हमारी अमानत हैं। ये सड़े गले नहीं बल्कि बढ़े-चढ़े यह ध्यान रखना। दो वर्ष बाद जब हम वापस आयेंगे तो इन्हें ले लेंगे संत तो तीर्थयात्रा के लिए चले गये इधर एक शिष्य ने मूँग के डिब्बेContinue reading “सत्संग का फायदा होगा जब हम अमल करेगें”
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मन का शिकार – उसे वश में करना
एक ग्रामीण शिकारी के जीवन पर आधारित यह पद मन को वश में करने का सुझाव देता है । शिकार पर जाते हुए पति से शिकारी की पत्नी कहती है कि हे पतिदेव , किसी जीवित प्राणी की हत्या न करना , परन्तु मरा हुआ , रक्त तथा मांस से हीन शिकार लेकर भी घरContinue reading “मन का शिकार – उसे वश में करना”
एक कथा -मेरी भी और आपकी भी
बहुत समय पहले की बात है, एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया, संयोगवश वह रास्ता भूलकर घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि हो गई और वर्षा होने लगी। राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा। कुछ दूरी परContinue reading “एक कथा -मेरी भी और आपकी भी”
जब तक वो देता रहेगा, तब तक मैं भी देता रहुँगा !!!
एक बार एक सत्संग के बाद, गुरुजी एक कतार में खड़े लोगों को प्रसाद बाँट रहे थे। एक छोटा लड़का गुरुजी तक भागके गया और गुरुजीने वह छोटे लड़के को प्रसाद दिया … लड़का प्रसाद लेकर भाग गया …और फिर गुरुजी के पास गया और गुरुजीने उसे प्रसाद फिर से दिया … पूर्ण उत्साह केContinue reading “जब तक वो देता रहेगा, तब तक मैं भी देता रहुँगा !!!”
जहाँ आसा तहाँ बासा
जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जायें , तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिंदु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा ।सेंट मैथ्यू कहा जाता है कि कबीर साहिब जब बाहर जाया करते थे तो एक आदमी उन्हें अकसर खेत में बैठा मिलता था । एक दिन कबीर साहिब ने उससे कहाContinue reading “जहाँ आसा तहाँ बासा”
मालिक कैसे दया करता है ?
सतगुरु के बिना हकीक़त का भेद नहीं खुल सकता , न कोई मन – माया के बंधनों से छूट सकता है और बिना शब्द के न कोई मालिक से मिल सकता है । केवल सतगुरु ही सुरत को शब्द के साथ जोड़ता है । महाराज सावन सिंह गुरु अमरदास जी के समय का वृत्तांत हैContinue reading “मालिक कैसे दया करता है ?”
गूंगे का गुड़
सन्तों – महात्माओं ने आन्तरिक सूक्ष्म रूहानी अनुभवों , रूहानी मण्डलों की स्थिति और परमात्मा से मिलाप के सहज ज्ञान और आनन्द को अकथ , अकह , ला – बयान कहा है । यह गूंगे का गुड़ है । जिस तरह गूंगा व्यक्ति गुड़ का स्वाद बयान नहीं कर सकता , उसी प्रकार इस सूक्ष्मContinue reading “गूंगे का गुड़”
व्यर्थ गयी कमाई
जनम जनम की इस मन कउ मल लागी काला होआ सिआह ॥ खंनली धोती उजली न होवई जे सउ धोवण पाह ॥ गुरु अमरदास पराशर जी सारी उम्र योगाभ्यास में रहे । पूर्ण योगी होकर घर को वापस आ रहे थे । रास्ते में एक नदी पड़ती थी । जब वहाँ आये तो मल्लाह सेContinue reading “व्यर्थ गयी कमाई”
काला नूर
जो नाम लेकर रख छोड़े , उसे फ़ायदा कुछ नहीं । जिस तरह किसी कुम्हार को हीरा मिल गया , उसने गधे के गले में बाँध दिया , कद्र नहीं की ।महाराज सावन सिंह एक मिरासी ग़लती से मसजिद में जा पहुँचा । वहाँ पाँच नमाज़ी मौजूद थे । उन्होंने कहा कि आओ , वुजूContinue reading “काला नूर”
भगवान कृष्ण ने गीता ( 7:16 )
भगवान कृष्ण ने गीता ( 7:16 ) में बताया है , “ चार प्रकार के लोग परमेश्वर की आराधना करते हैं : दु : खी , भोगों की चाह रखनेवाले , परमार्थी और बुद्धिमान ज्ञानी । ” दुःखी , दु : खों की निवृत्ति के लिए ; भोगी , भोगों की प्राप्ति के लिए ;Continue reading “भगवान कृष्ण ने गीता ( 7:16 )”