
संसार की चौरासी लाख योनियों का सिरजन होते हुए भी मनुष्य की कुछ अपनी मजबूरियां है। अगर मनुष्य को कुछ बताना या समझाना हो तो वह उससे ही समझ सकेगा जो उसी जैसा होकर उससे बात करे। सिरजनहार प्रभु जब अपनी दया मेहर के कारण अपनी पैदा की हुईं विशेष आत्माओं का उद्धार करना चाहता है तो मनुष्य शरीर धारण करके उनमें आ मिलता है और परमार्थ के मार्ग पर रहनुमाई करके उनको धुर धाम पहुंचा देता है। निर्गुण और सगुण दो अलग अलग परमेश्वर नहीं, एक ही है:
आदि ग्रंथ पृष्ठ स 287 पर गुरू अर्जुन देव जी फरमाते है:
“निर्गुण आप सरगुन भी ओही।।”
आदि ग्रंथ में और कई जगह इसके प्रमाण मिलते है
गुरू रामदास जी ने पृष्ठ स 42 पर फरमाया है:
समुंद विरोल सरीर हम देखिया, इक वसतु अनूप दिखाई।।
गुर गोविंद, गोविंद गुरु है, नानक भेद न भाई।।
शरीर रूपी समन्दर को हर तरफ से देखा तो एक वस्तु अनूप दिखाई दी कि गुरु ही गोविंद है और गोविंद यानी परमात्मा ही गुरु है , कोई भी भिन भेद नहीं है।
आपके समर्थन में गुरु अर्जुन देव जी ने पृष्ठ स 710 पर फरमाया है:
गुर गोबिंद गोपाल गुर, गुर पुरण नारायण।।
गुरु ही गोबिंद है यानी पूर्ण रूप से नारायण है।
आपने दसम ग्रंथ सैची पहली पृष्ठ स 59 में भी लिखा है:
हरि, हरि जन दोई एक है, बिब बिचार कछु नाही।
जल ते उपज तरंग जिऊ, जल ही बिखे समाही।।
जब समुंद्र के जल में से कुछ जल लहर के रूप में ऊपर उठता है तो वह एक अलग चीज प्रतीत होने लगता है, पर यथार्थ में वह अलग नहीं होता, बाकी जल के साथ ही जुड़ा होता है और उसके एक आध मिनट बाद नीचे बैठ जाने पर उसका उतना भी अलगाव खत्म हो जाता है।
एक जगह और आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 397 पर लिखा है:
गुर की महिमा किया कहा, गुरु बिबेक दात सर।।
ओह आदि जुगाद,जुगह जुग, पूरा परमेसर।।
गुरु की महिमा क्या कहे वह तो आध जुगाध यानी युगों युगों से मौजूद परमेश्वर का ही रूप है।
कल की पोस्ट में पूर्ण गुरु की पहचान के बारे में पढेगे।अगर आप को ये पोस्ट अच्छी लगे तो आप दूसरों को भी शेयर करे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगो को सच के बारे में पता चले।
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