नाम का सौदा

धन कमाने के लिए व्यापारी व्यापार करता है और व्यापार करने के लिए उसे पूंजी की आवश्यकता होती है।वह पूंजी किसी सगे संबधियों से मिलती है, इससे वह माल खरीदकर बेचता है, लाभ कमात है और धनवान होता चला जाता है। परमार्थ की पूंजी नाम है और उसे देने वाले स्नेही संबधी है संत सतगुरू।
सुखमनी साहिब में लिखा है:
जिस वखर को लैन तू आया।। राम नाम संतन घर पाया।।
जो व्यापार करने हम इस संसार में आए है वो नाम का है और वो नाम सिर्फ संतो के घर यानी उनके पास जाकर ही मिलेगा।संत सतगुरओ के बिना और कोई स्थान नहीं जहा नाम या शब्द की पूंजी मिल सके:
आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1078 पर गुरु अर्जुन देव जी फरमाते है:
सतगुरु साहू भंडार नाम ,जिस इह रतन तिस ते पाइना।।
सतगुरु ही वो साहूकार है जिनके पास अनमोल रत्न नाम का भण्डार है और उन्हीं से प्राप्त हो सकता है।
आदि ग्रंथ पृष्ठ स 649 पर गुरु अमरदास जी फरमाते है:
बिन सतगुरु नाउ न पाइए बुझह कर वीचार।।
ये बात पक्की कर ले की पूर्ण सतगुरु के बिना नाम नहीं मिलता।नाम सतगुरु के सिवाय कहीं और क्यो नहीं मिलता…? कहा जा सकता है कि मालिक की रजा ऐसी ही है: जैसे पानी सदा नीचे की ओर ही बहता है, आग के शोले अपार की ओर ही उठते है। वह जो चाहता है, उससे जवाब मागने की गुंजाइश नहीं। पर शायद सच्चाई यहां है कि नाम या शब्द ऐसी अमूल्य वस्तु है कि बाटने के लिए हरएक को नहीं सौंपी जा सकती। वह इसे खुद ही गुरु का जामा पहनकर बाट ता है।
कलाम बुल्लेशाह पृष्ठ स 53 पर बुल्लेशाह जी फरमाते है:
मौला आदमी बन आया। ओह आया जग जगाया।।
मौला यानी परमात्मा आदमी बनकर गुरु रूप में आता है और यहां आकर जग यानी संसार को नाम की दात देकर जागता है और अपने साथ मिला देता है।सतगुरु जब किसी जिज्ञासु पर दयावान होता है तो उसे दीक्षा देता है, अपने दिए हुए नाम या शब्द का अभ्यास करवाकर उसका अह भाव मिटाता है और फिर उसे अपने शब्द रूप में समा लेता है। परमेश्वर निरंजन है, कोई मैली वस्तु उसके अस्तित्व का अंग नहीं बन सकती ।सेवक गुरु की संगत में निर्मल हो जाता हैं ,सतगुरु के जरिए आत्मा के परमात्मा में मिल जाने का रास्ता साफ हो जाता है।सतगुरू खुद परमेश्वर से एक रूप होता है और जब शिष्य सतगुरु के अस्तित्व में रच जाता है तो वह सहज ही प्रभु से मिलकर एक हो जाता है।
Good
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