
सतगुरु के आशिक़ का ख़ून सूख जाता है यानि आशिक़ों के तन में ख़ून नहि बचता
महाराज चरण सिंह जी के जमाने की बात है एक सेवादार जिसका नाम था श्री राम दास जो दिल्ली से Beas भंडारे के डीनो में कैंटीन में सेवा करने के लिए आता था और वो दिल्ली से पेदल चल कर आता था रास्ते भर कुछ नहि खाना केवल निम्बू पानी पीता था शरीर भी भारी था
जब 1962 में जंग लगीं थी तो मिलिटरी वालो ने हुज़ूर महाराज जी से ब्लड के लिये प्रार्थना की और उस वक़्त Beas में मिलिटरी वालों ने पहला ब्लड कैम्प लगाया गया और सभी सेवादारों को ब्लड देने के लिए हुज़ूर ने announcement की सेवादारों में इतना उत्साह था कि सभी एक दूसरे से आगे होकर पहला नम्बर लेना चाहते थे
ब्लड देने वालों में रामदास पहले नम्बर पर था पहलवानो वाला शरीर देखकर डॉक्टर ख़ुश हुए कि अच्छा ख़ासा ब्लड इकठा हो जाएगा
जब डॉक्टर ने रामदास के शरीर में सुई लगायी तो देखा ब्लड नहि आ रहा दूसरी तरफ़ ट्राई किया फिर भी ब्लड नहि निकला तब डॉक्टर टीम ने मिलकर मुआयना किया और उसकी डेली की रूटीन पूछी तो उनकी आँखे खुली रह गयी कि ये आदमी इतनी बड़ी देह के साथ दिल्ली से 400 मील चलकर आना कैंटीन में चाय की भट्ठी पे चाय बनाना बिना ख़ून के ये आदमी केसे सारे कामकरता है जबकि मेडिकल साइयन्स के हिसाब से ख़ून के बिना इंसान ज़िंदा ही नहि रह सकता जब बात हुज़ूर तक पहुँची उन्होंने कहा की ये आशिक़ों की कहानी है जिनका शरीर का ख़ून सूख जाता है पर देह शब्द के सहारे चलती रहती है ।
Unbelievable. 🤔
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