
परमात्मा ने शब्द या नाम के जरिए इस सृष्टि की रचना की है और फिर काल और माया भी पैदा की। फिर माया से तीन देवता पैदा हुए। ब्रम्हा , विष्णु और महेश जो इस सृष्टि को चला रहे है। जिसे तीन लोक यानी आकाश, प्रथ्वी और पाताल के स्वामी भी कहते है। तीन गुण भी इन्ही के दायरे में आते है। ये रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण है।
रजोगुण गति, प्राप्ति, उत्तेजना और मान आदि का प्रतीक है। तमोगुण आलस और अज्ञानता का प्रतीक है। सतोगुण नेकी, शांति, गंभीरता और ठहराव का प्रतीक है। इन गुणों का प्रभाव हमारे शरीर पर घटता बढ़ता रहता है। पर हम थोड़ा विवेक लगाकर पता कर सकते है कि हमारे ऊपर किसका प्रभाव है?
जब हमारे अंदर दुनियावी ख्वाहिश जोर मारती है और हम उसको पूरा करने के लिए दौड़ते है, विचलित होते है तो उस वक्त हम पर रजोगुण का प्रभाव होता है।
जिस वक्त हमारे अंदर गुस्सा, ईर्ष्या, बदले की भावना होती है या जब हमारे अंदर आलस होता है तो उस वक्त हम पर तमोगुण का प्रभाव होता है।
कई बार हम महसूस करते है कि हमारे अंदर शांति है, बड़ी गंभीरता होती है, किसी से बदला लेने को भावना नहीं होती है और उस वक्त हम बड़ी आसानी से दूसरों की गलती को माफ भी कर देते है। जब भी हम अच्छे कर्म करते है उस वक्त सतोगुण का प्रभाव होता है।
आदि ग्रंथ में गुरु अमरदास जी फरमाते है। त्रे गुण माया, भरम भुलाया, हौमे बंधन कमाए।।
संत महात्मा हमे समझाते है कि तीन गुणों में हम किसी भी गुण के प्रभाव में हो पर हम कर्म तो कर रहे होते है और फिर यही कर्म हमारे बंधन ( जन्म मरण) का कारण बन जाते है।
तो फिर कैसे इस बंधन से छूटे, कौन हमे छुड़ाएगा?
स्वामी जी महाराज सारबचन संग्रह 38:15-17 पर फरमाते है
नाम रहे चौथे पद माही। यह ढूंढे तिरलोकी माही।। तीन लोक में नाम न पावे। चौथे लोक में संत बतावे।। तीन लोक में बसता काल। चौथे में रहे नाम दयाल
अगर हमे इन जन्म मरण के दुखो या बंधनों से आजाद होना है तो हमे पूर्ण संत ही रास्ता बताते है। जब हम उनके बताए रास्ते पर चलते है तो हम तीन लोकों से पार चौथे लोक में नाम के भण्डारी, परमात्मा ,उस दयाल के देश में पहुंच जाते है और जन्म मरण से आजाद हो जाते है।
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