
संत महात्माओं ने सच्चे परमार्थ के दो अंग बताएं है, पहला अंतर मुख अभ्यास और दूसरा बाहरी रहनी करनी। बाहरी रहनी करी में संतो ने पांच विषय विकारों काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को छोड़कर उनकी जगह शील, क्षमा, संतोष, विवेक और नम्रता आदि गुण धारण करने पर बल दिया है। जब तक हम अपने अंदर इन गुणों को धारण नहीं करते, हम अंतर्मुख अभ्यास में भी तरक्की नहीं कर सकते।
किसी के दिख को सुनना, उनको समझना, उनके दुख में शामिल होना और उसको दूर करने का यतन करना, दया ही तो है। दयालु व्यक्ति को हमेशा दूसरों को दुखी देखकर दुख होता है।
संत महात्मा समझाते है कि दया और अहिंसा परमार्थ की नींव है। हिंसा या जुल्म और सच्चा परमार्थ दिन और रात की तरह है। ये दोनों कभी साथ नहीं रह सकते। संत तुलसी दास जी कहते ” दया धर्म का मूल है”
कबीर साहिब ” दया तह धर्म है” । संतो ने दया भाव पर काफी जोर दिया है। हुजूर स्वामी जी महाराज ने अपने पदेश में कहा है ” कोमल चित्त दया में धारो। परमार्थ का खोज लगना।” सारबचन संग्रह २०:२७:१। अर्थात अगर तुम सच्चे परमार्थी बनना चाहते हो तो सबसे पहले अपने को कोमल बनाओ और उसमे दया की भावना पैदा करो।
गुरू नानक देव जी कहते है आदि ग्रंथ पृष्ठ स ९०३ “निर्दिया नहीं जोति उजाला” निर्दयी के मन में कभी परमात्मा की ज्योति प्रकट नहीं हो सकती।
अगर परमात्मा को पाना चाहते हो तो किसी का दिल न दुखाओ। संतो ने तीन प्रकार की हिंसा मानी है – मन,वचन और कर्म द्वारा किसी को दुख पहुंचाना।
हजरत ईसा फरमाते है “ thou shall not kill” यानी तू किसी जीव की हत्या मत कर ।
अंहिंसा और दया भाव , इन गुणों के बिना रूहानी तरक्की कर सकना कठिन है नहीं, असंभव है।
सुंदर भाव 🙏। बहुत आवश्यकता है आज हमारे देश में कबीर और रहीम की सीख की।
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संत मत में सभी संतो ने एक ही उपदेश दिया है । कि परमात्मा एक है और गुरु के जरिए ही मिलेगा। चाहे वे किसी भी धर्म में क्यो न आए हो।
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