इच्छाएं- तृष्णाए

संतमत के अनुसार इच्छाएं तृष्णाएं ही हमारे बंधन का वास्तविक कारण है। सागर की लहरों की भांति इच्छाएं तृष्णाएं हमारे मन में रोज नई तरंगे पैदा करती रहती है। सारा संसार इनके चक्र में फसकर दिन रात माया के धंधों में लगा रहता है। हम इन इच्छाएं तृष्णाएं के अधीन होकर किए गए कर्मो के कारण इस चौरासी के चक्र में फसे रहते है। हम बार बार इन्ही इच्छाओं और तृष्णाओ के कारण पैदा होते है और मरते है पर ये इच्छाएं तृष्णाएं कभी नहीं मरती है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स २६ पर गुरु अमरदास जी फरमाते है : जे लख इसतरिया भोग करहि नाव खंड राज कमाही।। बिन सतगुरु सुख न पावई फिर फिर जोनी पाहि।।

आप समझाते है कि इंसान को चाहे सारे संसार का राज पाट मिल जाए, संसार के भोग पदार्थ मिल जाए और सैकड़ों सुंदर स्त्रियों का साथ प्राप्त हो जाए, फिर भी उसकी इच्छाएं तृष्णाएं शांत नहीं हो सकती। बल्कि इच्छाएं तृष्णाएं की और अधिक लहरे उठती रहती है। ये इच्छाएं तृष्णाएं ही सब दुखो का मूल कारण है। इच्छा का बीज बहुत छोटा होता है, पर इसकी पूर्ति के लिए लंबे दुखदाई संघर्ष से गुजरना पड़ता है। न कभी इच्छाएं तृष्णाएं खत्म होती है और न ही इंसान के दुख खत्म होते है।

जब तक मन को इन्द्रियों के भोगों और विषय विकारों से ऊंची लज्जत नहीं मिलती, ये कभी भी सांसारिक वस्तुओं की इच्छाओं त्रिष्णाओ से मुक्त नहीं हो सकता। इसे विषय वासनाओं और संसार की कामनाओं से मुक्त करने वाला सार पदार्थ प्रभु का नाम है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ८५० पर गुरु अमरदास जी फरमाते है : गुर का सबद अमृत है सभ त्रिसना भूख गवाए।। हरि रस पी संतोख होआ, सच वसिआ मन आए।।

आप समझाते है कि जब गुरु के उपदेश के अनुसार मन को अंतर में शब्द या नाम रूपी अमृत में लीन करते है, तो इसकी हर प्रकार कि भूख शांत हो जाती है, इसके अंदर सच्चा संतोष आ जाता है और आत्मा, परमात्मा रूपी सत्य में समाकर उसका रूप बन जाती है। इस तरह साधना करने वाला इच्छा तृष्णा से आजाद होकर परम आनंद के सहज धाम को प्राप्त कर लेता है।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

6 thoughts on “इच्छाएं- तृष्णाए

  1. बहुत धन्यवाद।
    कृपया मेरी मन की आशंका का उत्तर दीजिए। हम अपने कर्तव्यों को कर्मयोग मानकर करते हैं। लेकिन इस में हमारे साथ रहनेवाले ही ठोस पहूँचाते और हमारे कर्तव्यनिष्ठ को भंग करते रहते हैं, तो हम इसे कैसे संभाल सकते हैं?

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    1. सबसे पहले तो हमे यह समझना पड़ेगा कि जो भी हमारे साथ अच्छा या बुरा हो रहा है वो हमारे ही द्वारा पिछले जन्मों में किए गए कर्मो का फल है। दूसरी बात ये की जीवन में जो भी कुछ घट रहा है ये तो होना ही था क्यो कि हमारा और उनका हिसाब है। तीसरी यह बात कि जितना ज्यादा हमारा हिसाब किताब उतना ही हमारा करीबी रिश्तेदार होगा। जैसे पति, पत्नी या पुत्र या पुत्री, माता पिता।
      अब ये सवाल रहा कि हमारे हाथ में क्या है तो इसका जवाब है कि हम सिर्फ रिएक्शन कर सकते है। अच्छा या बुरा । यानी हमारे साथ बुरा होने पर भी कुछ नहीं बोलते है तो हमने अपने किए हुए कर्मो को भोग लिया। और अगर बुरा रिएक्ट करते है तो हमने नए कर्म बना लिए जो क्रिया मान कर्म है। जो आगे चलकर संचित कर्मों में बदल जाते है और हमे आने वाले जन्मों में भोगने पड़ते है।
      हम सब को यह पक्का कर लेना है कि हम सब कठपुतलियां है और जो दुख दे रहे है वो भी परमात्मा की कठपुतलियां है वे भी वो ही कर रही है जो परमात्मा चाहता है। इसीलिए गीता में लिखा है जो हो रहा है अच्छा हो रहा है जो होगा वो भी अच्छा होगा।

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      1. ठीक है। तो कोई हमें तंग करें तो हमें चुप्पी रहना ही बेहतर होगा।
        धन्यवाद। 🙏🙏

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  2. मूर्तिकार की मूर्ति जब ही अच्छी बनती है जब उस पर सबसे ज्यादा छेनी और हथौड़ी की मार लगती है।
    बाकि तो पत्थर ही रहता है।

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