
कर्मो को आम तौर पर पुण्यो और पापो में बांटा जाता है। मन, वचन और कर्म के द्वारा किसी को सुख देना पुण्य है और मन,वचन और कर्म द्वारा किसी को दुख देना पाप है। मगर पुण्य कभी भी पापो का नाश नहीं कर सकते। पुण्य, पुन्यो के और पाप, पापो के लेखे में जमा होते है और दोनों प्रकार के कर्मो के भुगतान के कारण मनुष्य चौरासी का हिस्सा बना रहता है।
कर्मो को तीन भागों में बाटा गया है – प्रारब्ध, क्रियामान और संचित।
प्रारब्ध कर्म: पिछले जन्मों के आधार पर इस जन्म में भोगने के लिए मिले कर्म, प्रारब्ध कर्म कहलाते है। प्रारब्ध अटल है। “नाह नाह मिटत भावनी जो लिखी देवे निरंजना” और अनकिए लागे नहीं, किए ना बिरथा जाय।”। कर्म अवतारों को भी भोगने पड़ते है। श्री रामचन्द्र जी ने छिपकर बाली को तीर मारा था। जब आपने भगवान कृष्ण के रूप मै अवतार धारण किया, तो बाली ने भील के रूप में आप पर तीर चलाया। केवल परमेश्वर के हुक्म से जीवों के उद्धार के लिए सतलोक से मृत्यु लोक में उतरे पूर्ण संत, कर्मो के बंधन से मुक्त होते है। वे कर्मो के कारण नहीं, सतपुरूष के हुक्म से जीवों के उद्धार के लिए संसार में आते है।
क्रियमान कर्म: प्रारब्ध कर्म भुगतने हुए जो नये कर्म करते है, उन्हें क्रियमान कर्म कहते है। आज के क्रियमान कर्म अगले जन्मों का प्रारब्ध बन जाएंगे।
संचित कर्म: हम एक जन्म में अनेक कर्म करते है, पर बहुत कम कर्मो का फल भोगते है, जिस कारण हर जन्म के बिना भोगे कर्म जमा होते रहते है। इन्हे संचित कर्म कहा जाता है।
मनुष्य का असली बंधन उसके कर्म है क्योंकि जब तक सारे कर्मो का नाश नहीं होता, आत्मा बंधन मुक्त नहीं हो सकती।
कर्मो से छुटकारे का एक मात्र साधन पूर्ण सतगुरु की शरण और नाम की कमाई है। जैसे जैसे जीव सतगुरु के उपदेश के अनुसार अपनी लिव अंतर में नाम या शब्द से जोड़ता है, आत्मा पर चढ़ी कर्मो की मैल उतरती जाती है।
पलटू साहिब की बानी, भाग २, पृष्ठ स ८५
करम बंधा संसार बंधावे आप से। जमपुर बांधा जाय करम की फांस से।। कोई न सके छुड़ाय रस्सा यह मोट है। अरे हां पलटू संतन डारा काट, नाम की ओट से।।
जीव नाम की कमाई द्वारा ही कर्मो का भण्डार नष्ट करके परमात्मा से मिलाप के काबिल बन जाता है।
Woow… bahut hi sundar sir👏🌱… apki sari batein jo apne yaha prastut kiye hai jiwan me ek ujaale ki tarah hai. Jinhe padh kr man ek alag hi disha me chala jaye. 🙏…
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If we apply than Life will change. We must need a perfect master to fullfill our human life aim
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Exactly true said sir. Consent. I’m really humbled. Getting through all these we can pious our pysche so long.
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