मन क्या है? इसे कैसे जीते?

मन की रचना के बारे में गुरु नानक साहिब फरमाते है (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ४१५)

ईह मन करमा ईह मन धरमा।। ईह मन पंच तत ते जनमा।।

कबीर साहिब कहते है: (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ३४२)

ईह मन सकती ईह मन सीउ।।ईह मन पंच तत को जीउ।।

गुरु नानक साहिब और कबीर साहिब यह समझा रहे है कि मन, माया (सकती) और काल (सीउ) का अंश है। यह पांच तत्वों के सूक्ष्म अंश तथा कर्मो और संस्कारों के मेल से बनता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति का मन अलग अलग होता है और हर व्यक्ति के मन की अवस्था भी निरन्तर बदलती रहती है। जैसे जैसे कर्म और संस्कार प्रकट होते है, वैसी ही व्यक्ति की मनोदशा बन जाती है।

मन का जोर त्रिलोकी तक है। इसीलिए संत महात्मा सावधान करते है कि आम इंसान तो एक तरफ, त्रिलोकी की हद में कैद बड़े बड़े तपस्वी, ज्ञानी, मुनिश्वर और देवी देवता भी मन के अधीन है। संतो महात्माओं ने अपनी वाणी में ऐसे अनेक विवरण दिए है जिनसे पता चलता है कि सैकड़ों साल हट कर्मो द्वारा साधना में लगे हुए बड़े बड़े त्यागियो को भी अंत में मन ने मार गिराया। किसी को काम ने मार गिराया, और किसी को क्रोध ने। कोई लाभ और मोह का शिकार हो गया, तो कोई अहंकार का। संत महात्मा समझाते है कि मन द्वारा बनाए गए साधनों से मन को वश करने की कोशिश करना सिर्फ अज्ञानता है।

आम तौर पर मन को काल का एजेंट कहा जाता है और यह कहा जाता है कि मन ही हमसे बुरे कर्म करवाता है। इस बात को एक दूसरे ढंग से भी समझा जा सकता है। हम आज के युग की भाषा में यह कह सकते है कि मन एक कंप्यूटर है। कंप्यूटर अपने आप कुछ नहीं करता। हम जो कुछ कॉप्यूटर की मैमोरी में फीड यानी डालते है, कंप्यूटर उसे ही स्क्रीन पर दिखाता है। इसी तरह मन हमारे खुद के पूर्व किए हुए कर्मो संस्कारों के अनुसार कार्यशील होता है। मृत्यु के समय शरीर पीछे छूट जाता है, परन्तु किए हुए सारे कर्मो का प्रभाव मन और आत्मा के साथ रहता है। अगले जन्म में शरीर बदल जाता है, किन्तु मन और आत्मा सब पूर्व संस्कारों के अधीन पुनः कर्म करते रहते है।

संत महात्मा समझाते है कि आत्मा और परमात्मा के बीच सबसे बड़ी रुकावट हमारा मन है और हम मन को वश में करके ही परमात्मा से मिलाप कर सकते है। गुरु नानक साहिब कहते है ” मन जीते जग जीत”( आदि ग्रंथ पेज न ६) आपका कहना है कि अगर हम मन को वश में कर लेते है तो हम संसार को बनाने वाले परमात्मा से मिलाप करने के काबिल हो जाते है।

स्वामी जी महाराज कहते है:

बड़ा बेरी यह मन घट में। इसी का जीतना कठीना।।

आपका कहना है कि हमने जो भी यतन करना है, अंदर बैठे मनरूपी शक्तिशाली शत्रु को वश में करने के लिए करना है। मन को वश में करने के लिए हमे मन के स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए।

संत महात्मा हमे समझाते है कि मन बहुत शक्तिशाली है। यह इन्द्रियों के भोगों और विषय विकारों का रसिया है। यह हर पल भोगों की लज्जतो की तरफ़ भागता है। यह कभी एक चीज की तरफ जाता है तो कभी दूसरी तरफ, मगर कोई भी चीज हमेशा के लिए मन को लेकर खड़ी नहीं हो सकती। केवल वह वस्तु ही मन को वश में कर सकती है जो मन से अधिक शक्तिशाली हो और जिसमें इन्द्रियों के भोगों से अधिक रस और आनंद हो। त्याग, वैराग्य या हठ कर्मो द्वारा सिर्फ मन और इसके विकार दब जरूर सकते है, लेकिन इनकी जड़ नहीं कट सकती। दबे हुए विकार, और अधिक खतरनाक हो जाते हैं। संत महात्मा समझाते है कि नाम प्रभु का रूप है और प्रभु की तरह ही शक्ति रूप, ज्ञान रूप और आनंद रूप है। नाम वह अमृत है जिसे पीकर मन की जन्मो जन्मों की इच्छाएं शांत हो जाती है।

गुरु राम दस जी फरमाते है: आदि ग्रंथ पृष्ठ स ४०

नाम मिले मन त्रीपतीए, बिन नाम ध्रिग जीवस।।

आप समझाते है कि में में जब भी तृप्ति और शांति आयेगी, नाम द्वारा आयेगी। जब भी मन वश में आएगा, नाम द्वारा ही आएगा और जब भी इसे सच्चे सुख की प्राप्ति होगी, नाम द्वारा होगी।

Note: नाम के बारे में विस्तृत जान ने के लिए आप मेरी 28 जून, 30 जून, 1 जुलाई वाली पोस्ट देख सकते है

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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