संत हमेशा से हमे रिश्तों की असलियत समझाते है, ताकि हम इनके मोह में फसकर संसार में आने के अपने असल उद्देश्य को न भुला दे।
आदि ग्रंथ (पृष्ठ स 700) पर गुरु अर्जुनदेव जी फरमाते है
कोई जाने कवन ईहा जग मीत।।
जिस होई कृपाल सोई बिधि बुझे ता की निर्मल रीति।।
मात पिता बनिता सुत बंधप इसट मीत अरु भाई।।
पूरब जनम के मिले संजोगी अंतह को न सहाई।।
आप रिश्तों कि असलियत बताते हुए सावधान करते है कि माता, पिता,पत्नी, पुत्र, मित्र, संबंधी आदि सब पिछले जन्मों के कर्मो के प्रभाव से मिलते है। उन सबके साथ हमारा लेन देन का निश्चित अवधि का संबंध होता है। ये संबंध ऐसे ही है जैसे फिल्म में कुछ अभिनेता और अभिनेत्रियां फिल्म की कहानी के अनुसार विशेष रिश्तों को निभाने के लिए इकट्ठे हो जाते है। फिल्म खत्म होते ही किसी का किसी के साथ कोई संबंध नहीं रहता। यदि कोई अभिनेता या अभिनेत्री फिल्म की समाप्ति पर किसी के साथ कोई सम्बन्ध समझे तो यह उसकी अज्ञानता है। फिल्म के दौरान सब रिश्ते एक निश्चित समय के लिए होते है।इसी तरह हर व्यक्ति का जीवन से मृत्यू तक एक विशेष फिल्म है। मौत के बाद दूसरा नाटक शुरू हो जाता है। संतो का समझाने का भाव है कि जीवन को एक नाटक समझो। नाटक के पात्र पूरी लगन से रिश्ते निभाते है, लेकिन किसी के मोह में नहीं फसते।
संत समझाते है कि संसार में लेन देन के सब फर्ज भी पूरे करो, रिश्तेदारों संबंधियों के प्रति अपनी सब जिम्मेदारी भी पूरी करो, लेकिन इन संबंधो को सच्चा, पक्का और स्थाई मत समझो।
स्वामी जी महाराज दो प्रकार के उपदेश देते है:
मित्र तेरा कोई नहीं संगियन में।
पड़ा क्यो सोवे इन ठगियन में।।
(सारबचन संग्रह 15:5:1)
आप कहते है कि संसार के रिश्तेदार सच्चे और पक्के नहीं है। ये ठगो के समान है जो तुझे तेरी परमार्थी पूंजी से वंचित कर देते है।
स्वामी जी महाराज फिर फरमाते है:
सत्संग सच्चा सतगुरु सच्चा।
नाम सच्चाई क्या कहूं गाय।।
आप समझाते है कि सतगुरु, साधु संगति और नाम या प्रभु के साथ हमारा सच्चा और पक्का रिश्ता है, क्यो कि लोक और परलोक दोनों में सफलता इस रिश्ते पर ही आधारित है।
किसने देखा कोन जाने
कोंन स्वर्ग कोन नर्ग गया
कर्म निर्धारित करते धरा पर
कोन किसका उत्तराधिकारी हैं यहां।।
हर घर आती मोत यहां
आज नही तो कल सदा
सबने देखा यमदूतों को
लाश कांधे जाती सदा।।
कर्म प्रधान इंसानी जीवन
जीवन कर्मो पर निर्भर यहा
कोई कह कर कमा रहा है कर्म
कोई लिख कर कमा रहा यहां।।
ऐ दोस्त हमारे इतना बताओ
क्यो दुख इतना फैला यहां
क्यो इतनी है गरीबी
अमीर भी आज रो रहा यहां।।
आशा तृष्णा मान अभिमान
क्यो सब इसमें हैं फँसे
इतने धर्मगुरु हैं विश्व मे
फिर भी मानव क्यो भटक रहा यहां।।
जिज्ञासा नही व्याकुल नही
ना उत्तर को तत्पर यहां
आजीवन इंतजार करेगे उत्तर का
जब मर्जी आप बताओ यहां।।✍️🙏
LikeLike
आप लिखते बहुत अच्छा है।
LikeLike
हैं मनोरथ एक हमारा
कलम देवी थमाई यहां
हम लिखना जाने नही
देवी बोले लिखो यहां।।
दिलवाना चाहते न्याय धरा
अन्याय हो रहा यहा
तलाक पीड़ित नारीयो को
इंसाफ ना मिल रहा यहां।।
बरसो बरस हो गए लड़ते
जवानी,रूप बदल रही वहाँ
तलाक ना मिल रहा नारी को
सँग परिवार दुखी नित्य होता यहां।।
नीति गलत चल रही आज
भारत देश उसे कहे यहां
तलाक चाहिए तो घिसो चपल्ले
चाहे उम्र बित जाए नारी की वहां।।
समय को कोई ना रोक सके
किसी बन्धन में ना बंधे यहां
समयानुसार ना हो रहा फैसला
कई जीवन व्यर्थ हो रहे यहां।।
सम्बन्ध नही तो तलाक तुरंत
हो समय की प्रतिबध्दता यहां
खुद ब खुद न्याय मिल जाएगा
हर पीड़ित नारी को यहां।।
आंकलन करवाना चाहते नीति
सविधान उसको कहे यहां
कैसे करेगे पता नही पर
जीवन समर्पित इसी पर यहां।।
चाहे जगाना पड़े आंदोलन
करना अनशन पड़े यहां
लाखो लोग प्रभावित इससे
दुख बेवजह फैला यहां।।
माना आज हम गरीब बहुत
गरीब की कोई सुनता नही
सत्य भावना सदा सँग हमारे
सँग देवी की दृष्टि हैं यहाँ।।
LikeLike
Good
LikeLike
Thenks sar ji
LikeLike
सर जी , आज की पोस्ट कॉमेंट जरूर करके बताए
LikeLike
आप कहते हो जीवन नाटक
नाटक जीवन हैं यहां
हम सब हैं कठपुतली
वक़्त चलाता हैं यहां।।
सत्य वचन आपका धरा पर
हम सहमत हैं यहाँ
पर लेनदेन कैसे पूरा करे
मोत कह कर ना आती यहां।।
लेनदेन ही निर्धारित करे
अगले जन्मो को यहां
जिसने जितना लिया धरा पर
फिर चुकाना उसे यहां।।
हाथो कोई बोए नही
ना लगती फर्ज की फसल यहां
मानो तो मानो फर्ज अपना
सबका जीवन आज कर्ज बना।।
कब किसको कैसे देना
सब निर्धारित वो करे यहां
हम सब तो है गुलाम
गुलाम वक़्त के है यहां।।
लेनदेन सदा बकाया
बकाया वो रहता सदा
कोई धरा पर जन्मा नही
जो लेनदेन चुका कर जाए वहां।।✍️🙏
LikeLike
लेकिन पूर्ण संत वे असली मित्र या रिश्तेदार है जो मौत के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ते बल्कि हमे यमदूतों के पंजों बज भी छुड़ाते है। ऐसे सतगुरु की शरण में आने के बाद धर्मराज का हिसाब किताब खत्म हो जाता है
गुरु रामदास जी आदि ग्रंथ पृष्ठ स 698 पर कहते है:
धरम राय दर कागद फारे, जन नानक लेखा समझा।।
गुरु रामदास जी आदि ग्रंथ पृष्ठ स 698 पर कहते है:
LikeLike
गुरु अर्जुन देवजी आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1348 पर कहते है:
सिमरत नाम किलबिख सभ काटे।।
धरम राय के कागर फाटे।।
गुरु अर्जुन देवजी आदि ग्रंथ पृष्ठ स 614 पर कहते है:
धरम राय अब कहां करेगो, जऊ फाटियो सगलो लेखा।।
यानि अगर हम पूर्ण संत की शरण मिल जाए तो यह का लेखा हो सकता है
कर्म पर मेरी पोस्ट जरूर पढ़े। उसमे पूरी डिटेल है जी
धन्यवाद
LikeLike