संत दरिया साहब की बाणी

चल सूवा । तेरे आद राज ‘ , पिंजरा में बैठा कौन काज ॥ बिल्ली का दुख दहै जोर , मारै पिंजरा तोर तोर ॥

मरने पहले मरी धीर , जो पाछे मुक्ता सहज छीर ।। सतगुरु सब्द हृदै में धार , सहजाँ सहजाँ करो उचार ॥ प्रेम प्रवाह धसै जब आभ , नाद प्रकासै परम लाभ ।।

फिर गिरह बसावो गगन जाय , जहँ बिल्ली मृत्यु न पहुँचै आय ॥

आम फलै जहँ रस अनंत , जहँ सुख में पावौ परम तंत ॥ झिरमिर झिरमिर बरसै नूर , बिन कर बाजै ताल तूर ।। जन दरिया आनंद पूर , जहँ बिरला पहुँचै भाग भूर ॥

दरिया साहब की बानी और जीवन – चरित्र , पृ . 39-40

इस पद में दरिया साहिब ने जीव की तुलना तोते से करते हुए शरीर को एक पिजरा माना है । जिस तरह पिंजरे में बंद तोते को हर पल बिल्ली का डर रहता है , उसी तरह शरीररूपी पिंजरे में कैद जीवात्मा को हर क्षण भर सकता है । उसी तरह जीव सतगुरु द्वारा दिए गए सुमिरन का हृदय से बात का भय सताता है । तोता पिंजरे को त्यागकर ही आसमान में उड़ान जाप करते हुए , मौत से पहले मरकर इस शरीररूपी पिंजरे से आज़ाद हो सकता है । कोई विरला ख़ुशक़िस्मत जीव ही परम आनंद की इस अवस्था को प्राप्त करके जन्म – मरण के भय से आज़ाद हो सकता है ।

1.तोता 3. परम तंत – परम तत्त्व 2. आद राज – मूल देश – 4.बिन … तूर – हाथों के बिना तूर बज रहा है भाव शब्द की तूर जैसी ध्वनि सुनाई देती है ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

3 thoughts on “संत दरिया साहब की बाणी

    1. original link के साथ लगाए तो मुझे कोई आपत्ती नहीं। साथ में जो भी शेयर करे उसकी एक कॉपी या लिंक मुझे जरूर शेयर करे

      Like

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started