सच्चे धर्म का सार

यह लेख मूल रूप से राधा स्वामी ब्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तक “गुरूमत सार” में से लिया है। इसमें जो अधिकतर बाणी या आयते है वो फारसी या अरबी में है उनका अर्थ साथ ही दिया गया है।

सच्चो धर्म का सार अंश और अंशी मूल रूप में एक ही हैं । सब मनुष्य उसी एक जौहर से पैदा हुए हैं । बाहरी रंग रूप , पोशाकों के भेद या फिरकों के झगड़े उनके आत्मिक तौर पर एक होने में फर्क नहीं डाल सकते । खिलकत के साथ प्रेम करना भी , एक तरह से , मालिक के साथ प्रेम करना है । फारस के एक फ़कीर तो यहाँ तक कह देते हैं कि तू शराब पी , कुरान शरीफ़ जला दे , काबा में आग लगा दे , जो चाहे कर , पर किसी इनसान के दिल को न दुखा :

मैं खर ओ मुसहफ़ बसोज ओ आतिश अंदर कअबा जन , हर चिह वाही कुन व – लेकिन मर्दुम आजारी मकुन ।

यही सच्चा मजहब , सच्चा धर्म , दीन और ईमान है । शेख सादी ने इस बारे में फरमाया है कि ऐ मालिक , तेरी बन्दगी तेरे बन्दों की ख़िदमत करने में है ; तसबीह ( माला ) फेरने , सज्जादा ( आसन ) पर बैठे रहने या गुदड़ी पहन लेने में नहीं

तरीक़त बजुज़ ख़िदमते – ख़ल्क नीस्त , ब – तस्बीह ओ सज्जादा ओ दल्क़ नीस्त । बोस्तान , पृ .40

कबीर साहिब कहते हैं कि हर घट में मेरा साई है , कोई सेज उससे सूनी नहीं , लेकिन जिस घट के अन्दर वह प्रकट है , वह बलिहार जाने के योग्य है :

सब घट मेरा साइयाँ , सूनी सेज न कोय । बलिहारी वा घट्ट की , जा घट परघट होय । कबीर साखी संग्रह , पृ . 106 ‘

फारस के एक सूफी दरवेश कहते हैं कि अगर इनसान यह जान ले कि सबके अन्दर मेरा साईं बस रहा है , कोई उससे खाली नहीं , तो अपने आप ही उसके अन्दर हरएक दिल के लिए आदर पैदा हो जायेगा :

चू बदनिस्ती किह दर हू दिल – हा खुदा अस्त , बस तुरा आदावे – हर दिल मुदआ अस्त ।

तू जिन्दा दिलों की परिक्रमा कर , क्योंकि यह दिल हजारों काबों से बेहतर है । काबा तो हजरत इब्राहीम के पिता का बुतखाना था , पर यह दिल प्रभु के प्रकट होने का स्थान है :

कसबा बुंगाहे – खलीले – आजर अस्त , दिल गुज़रगाहे – जलीले – अकबर अस्त । दिल बदस्त आवर किह हज्जे – अकबर अस्त , अज हजारां कसबा यक दिल बिहतर अस्त ।

किसी फ़क़ीर ने क्या सुन्दर वचन कहे हैं कि ऐ दिल , तू दिलों की परिक्रमा कर , क्योंकि यही छिपा हुआ सच्चा काबा है । काबा शरीफ़ तो हजरत इब्राहीम ने बनवाया था , पर यह दिल उस परमात्मा ने खुद बनाया है :

दिला तवाफ़े – दिलाँ कुन कि कअबा मख़्फी अस्त , किह औं खलील बिना करद ओ ईं ख़ुदा ख़ुद सात ।

दिल दुखाने से मालिक कभी प्रसन्न नहीं होता , चाहे कोई हजारों तरह की पूजा , इबादत और तौबा करे , हज़ारों रोजे रखे और हरएक रोजे में हज़ार – हज़ार नमाजें पढ़े और हज़ारों रातें उसकी याद में गुजार दे । यह सबकुछ मालिक को मंजूर नहीं अगर वह एक भी दिल को सताता है :

हजार जुह्दो इबादत हज़ार इस्तिग़फ़ार , हजार रोजा ओ हर रोजा रा नमाज्ञ हजार । हज़ार ताअते – शब – हा हज़ार बेदारी , कबूल नीस्त अगर खातरे ब्याजारी । बू अली कलन्दर

इसलिए जब तक तू खुदा के बन्दों के दु : खी दिलों को राहत नहीं पहुँचातात मालिक की रज़ा की प्राप्ति से ख़ाली रहेगा । अगर तू चाहता है कि मालिक तुझ पर बख्शीश करे तो तू उसकी ख़िलक़त के साथ नेकी कर :

हासिल न – शवद रज़ाए – सुलतान , ता ख़ातिरे – बन्दगां न जूई । ख़्वाही किह ख़ुदाए बर तू बख़्शद , बा ख़ल्के – ख़ुदाए ब – कुन निकूई । शेख सादी , गुलिस्तान , पृ .58

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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