आंतरिक मार्ग

अगर हमें अपने घर के अन्दर जाना हो तो सबसे पहले घर के दरवाजे की तलाश करनी पड़ती है । निज – घर का वह दरवाजा आँखों के पीछे तीसरी आँख , एक आँख या तीसरा तिल है । उसी को खोलने के लिए हम उसको खटखटाते हैं यानी बार – बार सिमरन और ध्यान के द्वारा अपने फैले हुए ख्याल को आँखों के पीछे इकट्ठा करते हैं । जब बार – बार खटखटाने से यानी सिमरन और ध्यान से हमारा ख्याल इकट्ठा हो जाता है , तब उस घर का दरवाज़ा खुल जाता है । फिर हमें घर जाने का रास्ता मिलता है । जब हम अपने ख्याल को वहाँ जाकर शब्द के साथ जोड़ते हैं , तो शब्द का मार्ग खुल जाता है । उसके द्वारा हम वापस जाकर परमात्मा से मिलाप कर सकते हैं ।

तुलसी साहिब समझाते हैं : कुदरती काबे की तू महराब में सुन ग़ौर से । आ रही धुर से सदा तेरे बुलाने के लिये ।। 143

मुसलमानों का ख़्याल है कि हज यानी काबा की यात्रा करने से हम नजात प्राप्त कर सकते हैं । तुलसी साहिब फ़रमाते हैं कि जो असली क़ाबा है वह हमारा शरीर है । पैरों के तलवों से हमारा हज शुरू होता है और सिर की चोटी पर जाकर ख़त्म होता है । इस हज की दो मंजिलें हैं – एक आँखों तक और दूसरी आँखों से ऊपर । मौलवी हमेशा मेहराब के अन्दर खड़ा होकर बांग देता है । हमारे माथे की बनावट भी मेहराब की तरह है । जो मालिक की दरगाह की तरफ़ से क़ुदरती कलमा आ रहा है , वह इस मेहराब यानी माथे के अन्दर आ रहा है । जब हम उस आवाज़ या कलमे को पकड़ते हैं , तो हम उसके पीछे – पीछे चलकर अपनी मंज़िले – मक़सूद पर पहुँच जाते हैं जहाँ से यह आवाज़ आ रही है ।

गुरु अमरदास जी फ़रमाते हैं : इसु काइआ अंदरि वसतु असंखा ॥ गुरमुखि साचु मिलै ता वेखा । नउ दरवाजे दसवै मुकता अनहद सबदु वजावणिआ ॥44

हमारा यह शरीर सिर्फ हड्डियों और मांस का ही बना हुआ नहीं है और न सिर्फ पाँच – छ : फुट लम्बा मिट्टी का पुतला ही है । परमात्मा ने इसके अन्दर बेशुमार ख़ज़ाने रखे हुए हैं । बल्कि वह परमात्मा भी खुद इसके अन्दर बैठा हुआ है । जब तक कोई सच्चा गुरमुख नहीं मिलता तब तक हम शरीर में उस परमात्मा को देखने और अन्दर खोज करने के तरीके का पता नहीं लगा सकते । आप समझाते हैं कि शरीर के दो हिस्से हैं , एक आँखों से नीचे और दूसरा आँखों से ऊपर । आँखों के नीचे नौ द्वारों में सिर्फ इन्द्रियों के भोग और विषयों – विकारों के स्वाद हैं । जब तक हमारा ख्याल आँखों से नीचे – नीचे है , हम मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते , क्योंकि मुक्ति का दरवाज़ा आँखों के पीछे है । उसकी यही पहचान है कि उस जगह अनहद शब्द धुनकारें दे रहा है ।

गुरु अमरदास जी फ़रमाते हैं : गुर सबदि मिलहि से विछुड़हि नाही सहजे सचि समावणिआ ॥5

जब हम गुरमुखों के जरिये शब्द को पकड़ लेते हैं तो फिर शब्द हमें छोड़ता नहीं , अपने साथ लेकर परमात्मा में ही समा जाता है । हमें उस शब्द के ज़रिये अपने अन्दर , अपने घर का रुख क़ायम करना है और शब्द के प्रकाश के ज़रिये अपने घर का रास्ता देखना है । हमारी आत्मा की जो देखने की शक्ति है , उसे महात्मा ‘ निरत ‘ कहते हैं और जो सुनने की शक्ति है उसे सुरत ‘ कहते हैं । सुरत के द्वारा शब्द की आवाज़ को सुनना है और निरत के द्वारा उसके प्रकाश को देखना है ।

(यह लेख साइंस ऑफ द सोल रिसर्च सेंटर द्वारा पुस्तक “संत मार्ग” में से लिया गया है)

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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