दुनियाँ भरम भूल बौराई (संत दरिया)

दुनियाँ भरम भूल बौराई ।। आतम राम सकल घट भीतर जाकी सुद्ध न पाई । मथुरा कासी जाय द्वारिका , अरसठ तीरथ न्हावै । सतगुर बिन सोधा नहिं कोई , फिर फिर गोता खावै ॥ चेतन मूरत जड़ को सेवै बड़ा थूल मत गैला । देह अचार किया कहा होई , भीतर है मन मैला । जप तप संजम काया कसनी , सांख जोग ब्रत दाना । या तें नहीं ब्रह्म से मेला , गुन हर करम बँधाना ॥ बकता होय होय कथा सुनावै , स्रोता सुन घर आवै । ज्ञान ध्यान की समझ न कोई , कह सुन जनम गँवावै ॥ जन दरिया यह बड़ा अचंभा , कहे न समझे कोई । भेड़ पूँछ गहि सागर लाँधै , निस्चय डूबै सोई ॥ दरिया साहब की बानी और जीवन – चरित्र , पृ . 40

परमार्थ की प्राप्ति के लिए बाहरमुखी साधनों का खंडन करते हुए दरिया साहिब कहते हैं कि परमात्मा तो सबके घट में समाया है , लेकिन सारी दुनिया उसे बाहर ढूँढ़ती फिर रही है । मथुरा , काशी आदि तीर्थों पर स्नान करने से , जप – तप , योग , व्रत – दान आदि क्रियाओं से प्रभु से मिलाप नहीं होता , बल्कि कर्मों का बंधन और मज़बूत हो जाता है । देह को साफ़ करने से क्या होगा जब भीतर मन मैला है । चेतन होकर जड़ की पूजा करना तो सूखता है । भ्रमों में पड़े जीव भवसागर से पार नहीं उतर सकते और सतगुरु के बिना परमात्मा से मिलाप नहीं हो सकता ।

शब्दार्थ……1. बौराई= बावली , पगली 2. सोधा … कोई= खोज नहीं कर पाया 3. थूल= स्थूल 4. मत गैला – नादान , नासमझ 5. काया कसनी= काया से किए कठोर तप 7. स्रोता = श्रोता 6. बकता= वक्ता 8. गहि=पकड़कर

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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