रूहानियत की जरूरत आजकल सारे संसार में खींच – तान , चिन्ता और फ़िक्र का राज्य नज़र आ रहा है । पहुँचे हुए महात्माओं को छोड़कर कोई भी , चाहे वह किसी भी वर्ग से सम्बन्धित है , इससे नहीं बच सका है । यह इस बात का प्रमाण है कि आजकल रूहानियत का दिवाला निकला हुआ है । इस अराजकता का कारण आजकल के लोगों की अशान्त हालत है । दुनिया के लोगों ने हरएक विद्या में तरक्की की है , लेकिन वे अपनी आत्मा की उन्नति से बिलकुल कोरे हैं । उन्होंने नदियों , पहाड़ों और समुद्रों को खोज डाला है , पर अपने आपकी खोज नहीं की । सारी विद्याओं का मूल उद्देश्य क्या है ? यही कि मनुष्य स्वयं को पहचाने :
जाने – जुमला इल्म – हा ईनस्त ईं , किह ब – दानी मन क़ियम दर यौमे – दीं । कीमते – हरकाला मी दानी किह चीस्त , कीमते – खुदरा न – दानी अहमक़ीस्त । मसनवी मौलाना रूम , दफ़्तर 3 , पृ .256
प्रत्येक इल्म के बारे में हम जानते हैं , पर अपनी आत्मा के बारे में , जिसके सहारे सब विद्याओं की प्राप्ति होती है , जिसके आधार पर शरीर , मन और बुद्धि का कारोबार चल रहा है , हम कुछ भी नहीं जानते । अपना मूल्य न जानकर इनसान बेवकूफ़ बना हुआ है । मनुष्य चाहे संसार के सब पदार्थों पर अधिकार प्राप्त कर ले , पर यदि वह अपनी आत्मा के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानता तो उसका सारा जीवन निष्फल चला जाता है । बाइबल ( मैथ्यू 16:26 ) का कथन है , ” मनुष्य को क्या लाभ होगा यदि वह सारे संसार पर अधिकार पा ले , परन्तु अपनी आत्मा को खो बैठे । “
अपनी आत्मा को न जानने और अपने मूल स्रोत से न मिलने के कारण हम अशान्त रहते हैं । हमारी इसी आन्तरिक अशान्ति का प्रभाव संसार पर पड़ रहा है , जिसके फलस्वरूप हम एक ही पिता की सन्तान होते हुए भी आपसी भ्रातृ – भाव को भूल चुके हैं । इसीलिए भाई – भाई , समाज समाज , क़ौम – क़ौम और देश – देश आपस में टकराकर तबाह हो रहे हैं और एक दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं । बाहरी धर्म के उपदेश और आचारसंहिता की शिक्षाएँ हममें आपसी प्रेम उत्पन्न नहीं कर सकीं ।
आजकल इस बात की अत्यन्त आवश्यकता है कि परमार्थ का नये सिरे से प्रचार हो , जिससे मानव – जाति इस दुर्दशा से निकल सके । हमें रूहानी जीवन की ज़रूरत पर जोर देना चाहिए ताकि मानव – जाति , जो दुःखों में डूबी हुई है और जो मैं – मेरी के भयंकर दौर से गुजर रही है , बच सके । आज दुनिया एक ओर नयी रोशनी और दूसरी ओर पुराने धार्मिक बन्धनों और मत – मतान्तरों के भ्रमों में उलझकर आपसी वैर – विरोध और तू – तू , मैं में फँसी हुई है । प्रचारक और विद्वान लोग , जिन्हें इन कठिनाइयों को हल करना चाहिए था , लोगों को साम्प्रदायिकता , कर्मकाण्ड और मनमाने धार्मिक विश्वासों की उलझनों में फँसाकर एक दूसरे से दूर कर रहे हैं ।
कुछ लोग पश्चिमी रोशनी के सिद्धान्त ‘ खाओ , पीयो और मौज करो ‘ ( ईट , ड्रिंक एण्ड बी मैरी ) से प्रभावित हैं । वे कहते हैं कि हमें परमात्मा की आवश्यकता ही क्या है । सबकी नज़र अखरोट के छिलके तक ही जाती है , वे उसे ही हज़म करने के पीछे पड़े हुए हैं , पर वह हज़म हो नहीं सकता । उसकी गिरी की ओर वे ध्यान नहीं देते , जिसकी रक्षा के लिए यह बाहरी आडम्बर बना था । इसी खींच – तान की दशा में हम परमात्मा को खो चुके हैं और हक़ीक़त से दूर जा रहे हैं ।
ऐ ख़ुदा जूयां ख़ुदा गुम करदा ईद , गुम दरी अमवाजे – कुलज़म करदा ईद । फ़रीद – उद् – दीन – अत्तार
ऐ परमात्मा को खोजने वालो! तुमने परमात्मा को अपने मन रूपी समुंद्र की लहरों में खो दिया है।
ऐसे अवसरों पर सन्त जीवों की नज़र सदा असलियत की ओर मोड़ते हैं , और संसार को एक ऐसे सरल मार्ग का संकेत देते हैं जो मनुष्य के अन्दर है , जो सत्पुरुष – कृत है और जो युगों – युगान्तरों से चला आया है । सन्त कहते हैं कि परमात्मा है और सब धर्म उसी को प्राप्त करने का यत्न करते हैं । ईश्वर – प्राप्ति के मार्ग का नाम ही धर्म है । इसी को अंग्रेजी में ‘ रिलीजन ‘ कहते हैं । यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘ रिलीगेअर ‘ से निकला है , जिसका अर्थ है पुनः बाँधना या जोड़ना । इस शब्द के मूल में ही इसका असली तात्पर्य छिपा हुआ है । इसलिए इसका अर्थ है फिर से ईश्वर के साथ जुड़ना ।
यह रूहानी परम्परा सबकी साँझी है । जो परमात्मा के साथ अन्तर में जुड़ जाये , वही सच्चा धर्मात्मा , मोमिन , सिक्ख , ईसाई और भक्त है । सन्त बताते हैं कि परमात्मा हमारे अन्दर है । वह इस शरीर रूपी मन्दिर में ही मिलता है । इस शरीर में आत्मा और परमात्मा दोनों एक साथ रहते हैं । लेकिन इन दोनों के बीच में हौंमैं ( अहं ) या ख़ुदी का पर्दा तना है जिसके कारण आत्मा परमात्मा के दर्शन नहीं कर पाती ।
एका संगति इकतु ग्रिहि बसते मिलि बात न करते भाई ॥ आदि ग्रन्थ , पृ . 205
या यों कहें कि आत्मा रूपी स्त्री और परमात्मा रूपी पति दोनों एक ही सेज पर हैं , अर्थात् दोनों ही शरीर के अन्दर हैं , लेकिन अफ़सोस की बात है कि कई युग बीत गये पर आत्मा रूपी स्त्री ने परमात्मा रूपी पति के दर्शन नहीं किये , क्योंकि स्त्री सोई हुई है और पति सदा जागता है :
एका सेज विछी धन कंता ॥ धन सूती पिरु सद जागंता ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .737
सारांश यह है कि मालिक की प्राप्ति के मार्ग पर चलने के लिए किसी को अपनी जाति या धर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं , न ही अपना रहन सहन बदलने की ज़रूरत है , क्योंकि वही परमात्मा सबके अन्दर है और अपने अन्दर ही वह मिल सकता है ।
यह लेख rssb द्वारा प्रकाशित पुस्तक गुरमत सार में से लिया गया है।