चेतना का स्तर

ऐ मानव ! तू कब तक घड़े के बाहरी साँचे – ढाँचे और सजावट से मोहित होकर भ्रम में पड़ा रहेगा ? इनसे हटकर , घड़े के अन्दर जो पानी है उसकी ओर दृष्टि डाल । तू कब तक बाहरी सूरतों पर मोहित होता रहेगा ? हक़ीक़त का खोजी बन और हक़ीक़त की तलाश कर । बाहर से दिखायी देनेवाली सूरतें नाशवान् हैं , केवल वह सच्चाई ( हक़ीक़त ) अटल और ( बाहरी शक्लों को देखकर और उनमें मग्न होकर हक़ीक़त चेतना के स्तर निश्चल है । की ओर से बेसुध हो रहा है । यदि समझदार है तो सीप में से मोती को निकाल ले , यह सीप तो केवल बाहरी खोल है । यह खोल केवल किसी बहुमूल्य वस्तु को रखने के लिए बनाया गया है । तुझे इसके अन्दर झाँकने की ज़रूरत है ।

सौभाग्यवश अपनी आत्मा के विकास के लिये हम कुछ क़दम उठा सकते हैं । हमें पिछले महात्माओं के अनमोल वचनों के भण्डार को खोलकर देखना चाहिए , उनमें आत्मा की खुराक छिपी हुई है , जिसे खाकर मन और आत्मा तृप्त हो सकती हैं । गुरु अर्जुन साहिब फ़रमाते हैं :

पीऊ दादे का खोलि डिठा खजाना ॥ ता मेरै मनि भइआ निधाना ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .186

मनुष्य – शरीर हाथ , पैर तथा अन्य बहुमूल्य अंगों से लैस है और उसकी बनावट अत्यन्त सुन्दर है । पर यह बात स्पष्ट है कि शरीर के सारे अंगों में आँखों का स्थान सबसे ऊँचा है । इनका कार्य भी सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है । ये हमारी आन्तरिक अशान्त या शान्त अवस्था की झलक देती हैं । इसलिए इन्हें आत्मा के झरोखे कहा जाता है । ये हमारी आन्तरिक गति और भावनाओं का प्रभाव औरों पर डालती हैं । एक ख़याल भी जब इसके अन्दर झलकता है तो सैकड़ों संसार उलट – पलट हो जाते हैं । इनकी एक निराली बोली है , जो मूक है , इशारे – इशारे में ही वह सब प्रकट कर देती है जो और किसी तरह भी प्रकट नहीं किया जा सकता ।

जाग्रत् अवस्था में , आत्मा और मन आँखों के पीछे अपनी बैठक से कार्य करते हैं । यदि किसी अन्धे को आवाज देकर पुकारें तो वह भी आँखों के केन्द्र पर ही जोर देकर कहता है , ” हाँ भाई ! ” सपने में मन और आत्मा आँखों के केन्द्र से नीचे कण्ठ – चक्र में होते हैं और गहरी निद्रा में नाभि चक्र में । यदि हमें उस भेद को जानना है जो मन की जाग्रत् अवस्था से ऊपर है , तो हमें अपनी चेतना ( सुरत ) को जाग्रत् अवस्था से ऊँची अवस्था में ले जाने की कोशिश करनी है । सन्तों का मार्ग , इसलिए , आँखों के केन्द्र से शुरु होकर सुरत को चेतना की उच्चतर अवस्था में ले जाता है ।

इस मार्ग पर चलने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि हम उन मण्डलों का ज़िक्र करें , जो आत्मा अपनी यात्रा के दौरान अनुभव करती है । समस्त सृष्टि को चार मुख्य स्तरों पर बाँटा जा सकता है :

पिण्ड अण्ड ब्रह्माण्ड सचखण्ड

सृष्टि का ज्ञान प्राप्त करने और परमात्मा के पास पहुँचने का मार्ग इस भौतिक शरीर के अन्दर है क्योंकि जो कुछ बाहर की रचना है , वह मनुष्य शरीर के अन्दर भी है :

जो ब्रहमंडे सोई पिंडे जो खोजै सो पावै ॥ पीपा प्रणवै परम ततु है सतिगुरु होइ लखावै ।। आदि ग्रन्थ , पृ .695

ब्रह्माण्ड तक की सारी सृष्टि ब्रह्म की सीमा में है और प्रलय में नष्ट हो जाती सतलोक के प्रवेश – द्वार तक की सृष्टि महाप्रलय में नष्ट हो जाती है । सतलोक अविनाशी देश है जो प्रलय और महाप्रलय की सीमा से परे है । यह सन्तों का निज – धाम है और सन्तमत का लक्ष्य है ।

ब्रह्माण्ड में मुख्य छ : चक्र हैं जिनका प्रतिबिम्ब अण्ड के छ : चक्रों पर पड़ता है , और अण्ड के छ : चक्रों का प्रतिबिम्ब पिण्ड के छ : चक्रों पर पड़ता है । जिस प्रकार पानी में पड़नेवाले सूर्य के प्रतिबिम्ब में सूर्य का आकार होता है , सूर्य की गर्मी या तेज नहीं होता और पानी के उस प्रतिबिम्ब की परछाईं यदि दीवार पर पड़ती है तो उसमें सूर्य का आकार भी नहीं रहता , केवल कुछ झलक – मात्र होती है , उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के छ : चक्र , ब्रह्माण्ड से अण्ड और अण्ड से पिण्ड तक प्रतिबिम्बित होकर अपने मूल – रूप के आभास – मात्र रह जाते हैं । पिण्ड के छ : चक्र आँखों तक समाप्त हो जाते हैं । वे इस प्रकार हैं

गुदा – चक्र ( मूलाधार ) इन्द्रिय -चक्र ( स्वाधिष्ठान ) नाभि – चक्र ( मणि पूरक ) हृदय – चक्र ( अनाहत ) कण्ठ – चक्र ( विशुद्ध ) नेत्र – चक्र ( आज्ञा ) जो आँखों के पीछे है . .

योगीजन पिण्ड के इन छ : चक्रों को जाग्रत् करके ऊपर आते हैं । वे पहले धौति , वस्ति और नेति द्वारा शरीर की मैल को साफ़ करते हैं । फिर वे अपनी तवज्जुह ( ध्यान ) को मूलाधार या गुदा – चक्र , जिसे गणेश – चक्र भी कहते हैं , पर एकाग्र करते हैं । फिर कुण्डलिनी को जगाकर उसे रीढ़ की हड्डी से जोड़ते हैं , और इस प्रकार अभ्यास द्वारा इन चक्रों को पार करके वे आँखों के पीछे आज्ञा – चक्र में पहुँचते हैं । ये अभ्यास बड़े कठिन है, क्योंकि इनमें प्राणों का संयम करना पड़ता है और गृहस्थ तथा निर्बल मनुष्यो के लिए ये हानिकारक भी ही सकते है।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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