बाहर मुखी साधना

संत दरिया मारवाड़ वाले

बहुत से लोग पाठ पूजा, तीर्थ व्रत, दान पुण्य , घर बार त्याग कर जंगलों पहाड़ों में भटकना आदि बहार्मुखी क्रियाओं को भक्ति का साधन मान बैठते है। बाहरमुखी साधना के पीछे भाग रही दुनिया को सचेत करते हुए दरिया साहिब फरमाते है:

दुनिया भरम बोराई । आतमराम सकल घट भीतर , जाकी सुध न पाई । मधुरा काशी जाय द्वारिका , अड़सठ तीरथ ह न्याहवे । सतगुरु बिन सोजी नहीं कोई , फिर – किर गोता खावे ॥

संसार के लोग भ्रमों में फंसकर बाक्ले हुए फिर रहे हैं । हालाँकि प्रा अंतर में है , लेकिन इस बात की किसी को सुध या अठसठ तीर्थों पर नहाने से मन की मैल नहीं उतरती और हम जन्म – मरण के चक्र से भी मुक्त नहीं हो सकते । सतगुरु के मार्गदर्शन के बिना हमें सच्चा ज्ञाम नहीं मिल सकता , फलस्वरूप हम भवसागर में गोते खाते रहते हैं ।

दरिया साहिब ने आडंबरों को कोई महत्त्व नहीं दिया है , क्योंकि उनके अनुसार यूजा , अर्चना और आरती मंदिर में नहीं बल्कि घट ( हृदय ) के भीतर होनी चाहिए ।

अज्ञानता के कारण बाहरमुखी साधनों में फंसे हुए जीवों को चेताने का प्रयास करते हुए दरिया साहिब कहते हैं :

दरिया तीनूँ लोक में , ढूंढ्या सवही धाम । तीरथ व्रत विधि करत बहु , बिना राम किण काम ।

उस प्रभु की खोज में जीव चाहे तीनों लोकों में भटकता फिरे , चाहे चारों धाम की यात्रा में समय लगाए या फिर तीर्थ – व्रत आदि अन्य सब प्रकार के धर्म कर्म कर , लेकिन असलियत यही है कि राम नाम के बिना परमात्मा से मिलाप नहीं हो सकता ।

कर्मकांड , मूर्ति पूजा आदि बाहरमुखी साधनों को नकारते हुए दरिया साहिब ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंतर्मुख होकर की गई भक्ति ही सच्ची भक्ति है । वह कहते हैं :

चेतन मूरत जड़ को सेवै , बड़ा थूल मत गैला । देह आचार किया कहा होई , भीतर है मन मैला । तीर्थ दान जग प्रतिमा सेवा , यह सब सुपना लेवा देवा ।

कितने अफ़सोस की बात है कि मनुष्य चेतन प्राणी होते हुए भी जड़ पदार्थों की पूजा में लगा रहता है । इससे बड़ी नासमझी और क्या हो सकती हैं ! जब तक मन के अंदर मैल भरी हुई है , तब तक शरीर को शुद्ध करने या बाहरी भेष धारण करने से क्या लाभ । तीर्थ , दान , प्रतिमा का पूजन आदि सब सपने की तरह हैं और ये सब जीव को लेन – देन के चक्र में फँसाए रखते हैं ।

माला फेरने के बारे में दरिया साहिब कहते हैं :

माला फिरी तो का भया , मन फाटै कर भार । दरिया मन । फेरिये , जामें बसै बिकार ॥168

जो मन फेरे राम दिस , तो कलि बिष नाखै धोय । दरिया माला फेरता , लोग दिखावा होय ॥169

दरिया साहिब प्रश्न करते हैं कि माला फेरने से क्या होता है ? फेरना यानी पलटना तो मन को है जिसमें विषय – विकार भरे हुए हैं । मन की वृत्ति को विषय – विकारों से पलटकर परमात्मा की ओर करना है । मन को राम की ओर फेरना है । जो अभ्यासी मन को परमात्मा की ओर मोड़ देता है , वहीं मन के ऊपर चढ़ी विषय – वासना की मैल को नाम के जल से धो पाता है वरना हाथ में माला फेरना तो केवल लोक दिखावा ही है :

कंठी माला काठ की , तिलक गार का होय । जन दरिया निज नाम बिन , पार न पहुँचै कोय ॥

वह कहते है कि कंठी और माला लकड़ी की होती है । माथे पर लगाया तिलक मिट्टी का होता है । कुछ लोग माथे पर तिलक लगाकर और हाथ में साला लेकर धर्मात्मा होने का दिखावा करते हैं , परंतु तिलक लगाने और साला फेरने से बात नहीं बनती । अंतर्मुखी अभ्यास और सच्चे प्रेम के बिना परमात्मा से मिलाप असंभव है ।

दरिया साहिब निडर होकर कहते हैं कि जिन्होंने सतगुरु की शरण नहीं ली , वे बेशक पाँच – सात साखियाँ सुना दें , दस – बारह पद गा दें , उनकी यह करनी उन्हें संसार – सागर से पार कराने में समर्थ नहीं हो सकती । हाँ , यह पेट भरने का साधन अवश्य हो सकती है :

पद गावे साखी कहे , मन्न रिझावे आन । दरिया कारज ना सरै , देह करी गुजरान ।। पांच सात साखी कही , पद गाया दस दोय । दरिया कारज न सरै , पेट भराई होय ॥171

धार्मिक पुस्तकों से ज्ञान की बातें सीखकर परमात्मा की चर्चा करनेवाले की ओर इशारा करते हुए वह कहते हैं :

सीखत ज्ञानी ज्ञान गम , करै ब्रह्म की बात । दरिया बाहर चाँदना , भीतर काली रात ॥172

ऐसा व्यक्ति कथनी से तो ज्ञानी लगता है , लेकिन अनुभव न होने के कारण उसके अंदर अज्ञानता का अँधेरा छाया रहता है । आपके कहने का मतलब है कि केवल किताबी ज्ञान प्राप्त करके कथा – कहानी सुनाने से कोई भक्त नहीं बन जाता । पद गाने या ज्ञान की बात सुनने – सुनाने से मन और आत्मा की अवस्था में बदलाव नहीं आता । निजी अनुभव के बिना ऐसा ज्ञान थोथा ज्ञान ही साबित होता है ।

दरिया साहिब वाचक ज्ञानी के बारे में एक दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि जिसकी कभी संत – सतगुरु से भेंट नहीं हुई , जिसने नाम का भेद नहीं लिया , ऐसे वाचक ज्ञानी की सारी करनी उसी प्रकार निष्फल हो जाती है , जिस प्रकार किसी खेत को जोतने के बाद यदि उसमें पानी न दिया जाए तो सारी मेहनत बेकार हो जाती है :

सतगुरु को परस्या नहीं, सिख्या सबद सो हेत। दरिया कैसे नीपजे, तेह बिहुना खेत।।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

2 thoughts on “बाहर मुखी साधना

  1. आप सिखाते बातें ज्ञान की
    पढ़ते हम नित्य यहा
    इक दिन ज्ञानी बन जाएंगे
    नही सोच ऐसी यहां।।

    मस्त लिखते आप धरा
    करते दान शब्दों का यहा
    आप सा दानी कोउ नही
    करे नमन आपको सदा।।

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