
ध्यान किसका करें
तीन चीजों का ध्यान हमारे रूहानी सफ़र में हमारा सहायक हो सकता है : .
परमात्मा का ध्यान नाम या शब्द का ध्यान जो परमात्मा का क्रियात्मक रूप है गुरु का ध्यान जो परमात्मा का प्रकट रूप है .
हमारे जीवन का उद्देश्य मालिक को देखना है , उसका सिमरन और उसका ध्यान करना है । पर उसको हमने कभी देखा नहीं , जिसको देखा नहीं उसका ध्यान कैसे हो सकता है ?
बिनु पेखे कहु कैसो धिआनु ।। आदि ग्रन्थ , पृ .1140
वह मालिक जिसका हमें ध्यान करना है , खण्डों – ब्रह्माण्डों के पार है । वह निराकार है और हमारे मन तथा बुद्धि की पहुँच से परे है । उसका असली स्वरूप शब्द है जो बे – ज़बानी की ज़बान है । लेकिन जिस पवित्र हृदय में उसका वास है और जिसकी आत्मा रूपी बूंद परमात्मा रूपी समुद्र में अभेद हो चुकी है , वह वास्तव में परमात्मा में और परमात्मा उसमें समाया हुआ है । ऐसी हस्ती के लिए सत्य ही कहा गया है :
शब्द ने देह धारण की और हमारे बीच निवास किया । बाइबल , जॉन 1:14
ऐसा महान् व्यक्तित्व , सतगुरु , हमारे ध्यान करने के योग्य है , क्योंकि उसमें पाँच तत्त्व पूर्ण हैं । मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ योनि है । सतगुरु मानव – जाति में सबसे श्रेष्ठ है । इसको छोड़ शेष सारी सृष्टि – पीपल , तुलसी आदि जिनमें एक तत्त्व , साँप आदि जिनमें दो तत्त्व , गरुड़ आदि जिनमें तीन तत्त्व औरगाय आदि जिनमें चार तत्त्व मौजूद हैं – मनुष्य – योनि से नीचे है । इनमें से किसी का भी ध्यान या पूजा करना नीचे की ओर जाना है ।
सब सन्तों – महात्माओं ने गुरु के ध्यान को सफलता का साधन बताया है , क्योंकि गुरु आदर्श मनुष्य है । सतगुरु का स्वरूप साक्षात् अकालमूर्ति है , वह ध्यान करने के लिए सर्वोत्तम है और सबसे अधिक फलदायक है :
अकाल मूरति है साध संतन की ठाहर नीकी धिआन कउ ।। आदि ग्रन्थ , पृ . 1208
सतगुरु में सत्य का जुहूर ( प्रकाश ) है । वह सत्य का स्वरूप है । इसलिए उसको ध्यान का मूल समझो :
सतिगुरु सति सरूपु है धिआन मूलु गुर मूरति जाणै ।। वाराँ भाई गुरदास , 6:19
साधु – सन्तों की देह वह दर्पण है जिसमें मालिक की झलक दिखायी देती है । मालिक अलख है । जो उसको देखना चाहे वह उसे सन्तों में ही देख सकता है :
निराकार की आरसी , साधोंहीं की देंहि ।लखा जो चाहै अलख को , ( तो ) इन्हीं में लखि लेहि ॥ कबीर साखी संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ . 119
ध्यान – योग में तीन प्रकार के ध्यान आ जाते हैं : . . स्थूल ध्यान -गुरु के स्थूल रूप का ध्यान, सूक्ष्म ध्यान- निरत के खुलने पर जो ज्योति प्रकट होती है उसका ध्यान, गुरु के नूरी स्वरूप का ध्यान- जो सूक्ष्म और कारण मण्डलों में से शिष्य को ले जाकर उसकी आत्मा को परमात्मा में लीन कर देता है।
जब तक गुरु स्थूल शरीर में बैठा है , वह नहीं कहता कि मैं गुरु हूँ और न ही वह कहता है कि मेरा ध्यान करो । गुरु शीशे के समान है जिसमेंहमारे हृदय की किरणें टकराकर हमें हमारा अपना रूप दिखाती हैं । यदि हँसते हुए देखें तो हँसता चेहरा दिखायी देता है , यदि रोते हुए देखें तो रोता हुआ । शीशा यह नहीं कहता कि मुझे देखो । गुरु को कोई ज़रूरत नहीं कि शिष्य उसका ध्यान करे , गुरु का ध्यान करने में शिष्य का ही लाभ है।
जब तक सिमरन द्वारा अन्तर में गुरुदेव का नूरी स्वरूप प्रकट नहीं होता , तब तक हमें बाहरी स्वरूप के ध्यान की ज़रूरत है । जब यह नूरी स्वरूप प्रकट हो जाता है तो यह शिष्य को खण्डों – ब्रह्माण्डों पर ले जाता है । ऊपरी मण्डलों में उसका दिव्य प्रताप विशेष आकर्शक है और उसका प्रकाश सूक्ष्म देशों में दूर – दूर तक फैल जाता है ।
जिस तरह किसी महल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की ज़रूरत होती है और उनके बिना महल पर नहीं चढ़ सकते , उसी तरह गुरु के ध्यान के बिना हम हरि तक नहीं पहुँच सकते :
बिनु पउड़ी गड़ि किउ चड़उ गुर हरि धिआन निहाल ॥ आदि ग्रन्थ , पृ . 17
परमार्थ में जो भी लाभ प्राप्त होता है , जीवित गुरु के ध्यान द्वारा होता है । महात्माओं के चित्रों से यह काम नहीं हो सकता । तुलसी साहिब फ़रमाते हैं कि कल्पवृक्ष का चित्र बनाकर उसके आगे चाहे हजारों विनतियाँ करें , उससे कुछ प्राप्त नहीं हो सकता । तस्वीर का ध्यान करने से उसका कागज और फ्रेम अन्तर में आ जाते हैं जो स्वयं जड़ वस्तुएँ हैं , वे चेतन को कैसे खींच सकती हैं ? चेतन को तो चेतन ही खींच सकता है :
कलप वृक्ष के चित्र लख , कीनै विनय हज़ार । बित न पावें ताहि सिउ , तुलसी करे विचार ।
जब अन्तर में सतगुरु का नूरी स्वरूप प्रकट हो जाये तो शिष्य को चाहिए कि वह अपना ध्यान इसमें इस तरह लीन कर दे कि उसको यह सुध ही न रहे कि वह मैं हूँ या मैं वह हूँ । अमीर ख़ुसरो फ़रमाते हैं कि मैं हो गयाऔर त् मैं बन गया । मैं तन बन गया और तु मेरी जान बन गया और अब कोई यह न कहे कि मैं और तु दो हैं :
मन तू शुदम तू मन शुदी , मन तन शुदम तू जां शुदी , ता कस नगोयद बअद अर्जी मन दीगरम तू दीगरी । अमीर खुसरों , पृ . 112
जब ध्यान पूर्ण हो जाता है तो उपासक , उपास्य और उपासना की त्रिपुटी नहीं रहती । पूजा , पूज्य और पुजारी मिलकर एक हो जाते हैं । गुरु अमरदास जी फरमाते हैं कि अपने आपको छोड़कर गुरु में समा जाओं :
नानक आयु छोडि गुर माहि समावै ॥ आदि ग्रन्थ , पृ . 509
इस अवस्था को मुसलमान फ़क़ीर फ़नाफ़िलशैख ( शेख या मुर्शिद में सम्मा जाना ) होना कहते हैं । गुरु तो पहले ही फनाफ़िल्लाह ( प्रभु में लीन ) है । जो शिष्य गुरु के नूरी स्वरूप में लीन हो जाता है , उसमें अपने आप ही परमात्मा का निवास हो जाता है । गुरु उस परमात्मा का देहस्वरूप है । जो शिष्य गुरुमुख बन जाता है उसके अन्तर में अनायास , बेइजियार , परमात्मा बस जाता है ।
नोट: यह विषय और विचार मूल रूप से आरएसएसबी बियास, द्वारा प्रकाशित पुस्तक गुरूमत सार में से लिया गया है।