धर्म – ग्रन्थों का महत्त्व

ग्रन्थों – पोथियों में महात्माओं की रूहानी मण्डलों की यात्रा का वर्णन और उनके निजी अनुभवों का उल्लेख है , जिनको हमारे मार्ग – दर्शन के लिए उन्होंने पुस्तकों में लिखा । हमारे दिल में उनके लिये इज़्ज़त है । उन्हें पढ़कर हमारे अन्दर किसी हद तक परमार्थ का शौक़ और मालिक से मिलने का चाव पैदा होता है । किताबों का सिर्फ इतना ही मक़सद है कि वे हमारे अन्दर दिल की किताब खोलने की इच्छा पैदा करें । ग्रन्थों – पुस्तकों के द्वारा हम पिछले महात्माओं के परमार्थ के विचारों को जान सकते हैं और उनके अनुभवों से लाभ उठाकर तथा किसी मौजूदा महात्मा से राह लेकर उनके अनुभवों को अपने निजी अनुभव बनाने का यत्न कर सकते हैं ।

इन सब बानियों में वही बानी सबसे उत्तम है जिसे मालिक किसी पूर्ण महात्मा के मुख से कहलवाता है । मन और बुद्धि के घाट पर बैठकर महात्मा कुछ भी नहीं कहते । इनके अलावा और सब बानियाँ अपर्याप्त और अधूरी । एक बार अपने एक शिष्य से गुरु नानक साहिब ने कहा :

जैसी मी आवै खसम को बाणी , तैसड़ा करी गिआनु वे लालो ॥आदि ग्रन्थ , पृ .722

महात्मा के वचन मालिक के वचन होते हैं , चाहे प्रकट रूप में वे मानवीय कण्ठ से निकलते हुए मालूम देते हैं ।

मुक्तलक आं आवाज़ खुद अज़ शाह बुवद , गरचिह अज हलकूमे – अब्दुल्ला बुवद । मसनवी मौलाना रूम , दफ्तर 1 , पृ .213

अनुभवी महात्माओं के वचन परमार्थ के जिज्ञासुओं के लिए हीरे जवाहरात से भी ज्यादा कीमती होते हैं । ये हमें केवल अन्दर जाने तथा स्वयं को और मालिक को पहचानने का उपाय बताते हैं , लेकिन ये हमें अन्दर नहीं ले जा सकते और न ही हमारी सुरत ( आत्मा ) को कुल – मालिक के साथ जोड़ सकते हैं ।

संसार किताबी ज्ञान में उलझा रहता है और इनकी टेक पकड़कर जीव इनसे बँधा रहता है । जब तक कोई पूर्ण महात्मा नहीं मिलता , छुटकारे का कोई उपाय नहीं है । गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं :

तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ॥ श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई । श्रीरामचरितमानस 7.116 ( ख ) : 3

धर्म और धर्म – ग्रन्थों से भी पहले इस संसार में इनसान थे । इतिहास के दौर में कई धर्म आये और चले गये । कई धर्म – ग्रन्थ लिखे गये । सब धर्म – ग्रन्थों का स्रोत मनुष्य का हृदय है क्योंकि सभी भेद मनुष्य के अन्तर में हैं । किताबों में उन भेदों का उल्लेख है , स्वयं भेद नहीं । जब तक किसी महात्मा से मार्गदर्शन पाकर हम अन्दर नहीं जाते , उन भेदों को नहीं पा सकते।

मनुष्य ग्रन्थों पोथियों को पढ़ता है और तत्त्व की बातों की व्याख्या करता है , लेकिन स्वयं तत्त्व से खाली रह जाता है :

सिम्रिति सासत्र पड़हि पुराणा ॥ वादु वखाणहि ततु न जाणा ।। विणु गुर पूरे ततु न पाईऐ , सच सूचे सचु राहा हे । आदि ग्रन्थ , पृ . 1032

पुस्तकों और मनुष्य का भेद प्रत्यक्ष है । मनुष्य चेतन है , लेकिन पुस्तकें चेतन नहीं । मनुष्य को ज्ञान है और उसे इस बात का पता है कि उसे ज्ञान है , पर पुस्तकों को इस बात का पता नहीं कि उन्हें ज्ञान नहीं है । मनुष्य आगे – पीछे का विचार कर सकता है , पर पुस्तकें नहीं कर सकतीं । जब तक हमें अपने अन्दर का पता नहीं , हम अविद्या में भूले रहते हैं । किताबी ज्ञान तो सिर का भार बन जाता है क्योंकि वह हमारे मन और बुद्धि के फैलने का कारण होता है । केवल वही विद्या हमारे सन्तोष का कारण हो सकती है जिससे हमें अपनी असलियत की जानकारी प्राप्त हो । जिसकी अन्तर की किताब खुल गयी , और वह अपने दिल को मालिक की याद में लगाये रखता है , उसे बाहरी किताबों की ज़रूरत नहीं रहती । सूफ़ी फ़क़ीर नूरी कहते हैं कि उन सैकड़ों किताबों और काग़ज़ों को , जिन्हें तुम पढ़ते हो , आग में फेंक दो और अपने दिल और अपनी आत्मा को परमात्मा की ओर मोड़ो :

सद किताब ओ सद वरक़ दर नार कुन , जानो – दिल ए जानिबे – दिलदार कुन । अबियाते – नूरी संदर्भ : किताब – उल – बैअत

उपनिषदों ( कठ , 1 : 2 : 23 श्वेताश्वतर उपनषिद् , 2:15 ) में कहा गया है कि आत्मा का ज्ञान न वेदों , ग्रन्थों और पोथियों के पढ़ने से प्राप्त होता है और न उनके निरन्तर सुनने से , क्योंकि आत्मा का ज्ञान मन , बुद्धि और विद्या के द्वारा नहीं हो सकता । यह कहने या सुनने का विषय नहीं , अनुभव का विषय है ।

ऋग्वेद ( 1 : 164 : 39 ) में और श्वेताश्वतर उपनिषद् ( 4 : 8 ) में कहा गया है , ” जो मनुष्य उस परमात्मा को नहीं जानता जो ऋचाओं में बतायी गयी अविनाशी परम सत्ता है , जिसके अन्तर आकाश में सब देवताओं का वास है , ऋचाएँ उसके किस काम आयेंगी ? जो उसे जान लेते हैं , वे उसमें अच्छी तरह स्थिर हो जाते हैं , टिक जाते हैं ।

” मनुष्य चाहे चारों वेद , अठारह पुराण , नौ व्याकरण और छ : शास्त्र ( दर्शन ) पढ़ ले , पर इन उक्तियों और युक्तियों में लगकर वह हक़ीक़त को नहीं पा सकता । जब तक हमें सुरत और शब्द का ज्ञान नहीं है , जब तक हमारी सुरत कुल मालिक को नहीं पहचानती , हमारी गति चण्डूल पक्षी की भाँति है जो जिस भी बोली को सुनता है , उसी की नक़ल कर लेता है पर समझता कुछ भी नहीं । तुलसी साहिब ने कहा है :

चार अठारह नौ पढ़े , षट पढ़ि खोया मूल । सुरत सबद चीन्हे बिना , ज्यों पंछी चंडूल ॥ संतबानी संग्रह , भाग 1 , पृ .215

विद्वता की काट – छाँट से ख़ुश्क बुद्धि का फैलाव होता है जो सिर पर मुसीबतों का बोझ बन जाता है । इन लम्बे – चौड़े हिसाबों को छोड़कर असली नुक्ते को पकड़ो , जिसके द्वारा कुफ्र दूर होता है और जीव का कल्याण होता है :

क्यों पढ़ना ए गड्ड किताबां दी , सिर चाना एं पंड अजाबां दी । कुल्लियात बुल्लेशाह , काफ़ी 11

फड़ नुकता छोड हिसाबां नूं । कर दूर कुफ़र देआं बाबां नूं । कुल्लियात बुल्लेशाह , काफ़ी 12

गुरुबानी कहती है कि पढ़ने , लिखने और विचार करने के लिए चाहे सारी उम्र , सालों – साल , साँसों के अन्त तक , गाड़ियों की गाड़ियाँ भरकर किताबों का अध्ययन करते रहें , पर सब व्यर्थ है । केवल एक ही बात मालिक को पहचानना- लेखे में आती है, बाकी सबकुछ व्यर्थ है। पढ़ाई के द्वारा काम, क्रोध आदि से छुटकारा नहीं होता।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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