सत्संग का अर्थ

सत्संग : ‘ सत् ‘ का मतलब है ‘ सत्य ‘ या ‘ सच्च ‘ , ‘ जीवित ‘ या ‘ जाग्रत ‘ , और ‘ संग ‘ का मतलब है ‘ साथ ‘ या ‘ सोहबत ‘ , यानी सदा कायम रहनेवाले पुरुष की सोहबत या संगति का नाम सत्संग है । सतगुरु सत् प्रकट है इसलिये उसकी संगति का नाम सत्संग है । जहाँ सतगुरु सत् का उपदेश देता है , वहाँ जाने पर आत्मिक रंग चढ़ता है । अगर जल के सरोवर के किनारे बैठने से शीतलता और अग्नि के पास बैठने से गर्मी आती है , तो रूहानी बादशाहों के पास बैठने से उनका रंग क्यों नहीं चढ़ेगा ? मालिक के रहने की असली जगह वह है जहाँ उसके प्रिय भक्त रहते हैं :

मन मेरा पंछी भया , उड़ि कर चढ़ा अकास । गगन मँडल खाली पड़ा , साहिब संतों पास ॥ कबीर साखी – संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ . 120

मिलि सतसंगति खोजु दसाई विचि संगति हरि प्रभु वसै जीउ । आदि ग्रन्थ , पृ .94

सत्संग में केवल नाम का ही उपदेश होता है :

सतसंगति कैसी जाणीऐ ॥ जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥ आदि ग्रन्थ , पृ .72

सत्संग दो प्रकार का होता है: बाहरी और आंतरिक। बाहर का सत्संग सतगुरु की सोहबत या संगति का नाम है और सुरत (आत्मा) का शब्द या नाम के साथ जुड़ना आंतरिक सत्संग है। गुरु अमरदास जी कहते है:

सतगुरु बाझहू संगति न होई।। (आदि ग्रंथ,पृ .1068)

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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