मुर्दा खाने का हुक्म

अपनी बुद्धि का सहारा न लेना बल्कि संपूर्ण मन से यहोवा ( प्रभु ) पर भरोसा रखना । उसी को याद करके सब काम करना , वह तेरा मार्गदर्शन करेगा ।42 प्रॉवर्बज़

एक बार गुरु नानक साहिब ने अपने सेवकों को मुर्दा खाने के लिए कहा । तो देखने में यह मुनासिब हुक्म नहीं था । हम तो मुर्दा छू जाने पर नहाते हैं । फिर मुर्दा खाये कौन ? एक भाई लहणा खड़े रहे , बाक़ी सब शिष्य चले गये । यह सबको नामुनासिब हुक्म लगा था , लेकिन भाई लहणा को नहीं । जब वह मुर्दे के इर्दगिर्द घूमने लगा तो गुरु साहिब ने उससे पूछा , ‘ क्या कर रहे हो ? ‘ भाई लहणे ने उत्तर दिया , ‘ हुजूर ! मुझे समझ नहीं आ रही कि मुर्दे को किस तरफ़ से खाना शुरू करूँ । ‘ जब वह खाने लगा तो देखता है कि वहाँ कोई मुर्दा नहीं था , बल्कि मुर्दे की जगह उसके सामने गुरु का प्रसाद , मीठा हलवा पड़ा था । गुरु नानक साहिब ने उनको गुरु – गद्दी का हक़दार बना दिया और वह भाई लहणा से गुरु अंगद साहिब बन गये । अंगद का अर्थ है , ‘ गुरु का अपना अंग या हिस्सा ‘ । इसी तरह जब गुरु गोबिन्द सिंह ने अपने शिष्यों की परख की , तब पाँच हज़ार में से सिर्फ पाँच प्यारे निकले ।

जब गुरु परखता है तो बड़े – बड़े फ़ेल हो जाते हैं । जीव का इम्तिहान में पास होना बड़ी मुश्किल बात है । गुरु किसी का इम्तिहान न ले ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

5 thoughts on “मुर्दा खाने का हुक्म

  1. बिल्कुल सही , गुरु की सच्ची भक्ति केवल उनको आदर देने में नहीं अपितु उनपे भरोसा करने में है ।🙏🙏

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