होह सभना की रेणुका तउ आउ हमारे पास ॥131 गुरु अर्जुन देव
शेख़ फ़रीद को बहुत कम आयु में ही रूहानियत की गहरी लगन थी । उन्होंने ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का नाम सुना हुआ था जो राजस्थान के एक शहर अजमेर में रहते थे । उनसे दीक्षा लेने जब वे अजमेर पहुँचे तो देखा कि वे एक सूखे पेड़ का सहारा लेकर बैठे हैं ।
फ़रीद को इस बात पर बहुत हैरानी हुई कि एक कामिल फ़क़ीर ने पेड़ का सहारा लिया हो और वह पेड़ फिर भी सूखा हो ! उन्होंने अपनी योगशक्ति का प्रयोग करते हुए सूखे पेड़ पर दृष्टि डाली और वह एकदम हरा हो गया । ख़्वाजा साहिब ने यह सब देखा और पेड़ पर नज़र डाली , वह फिर पहले की तरह सूख गया । फ़रीद नहीं चाहता था कि पेड़ इसी तरह सूखा रहे । उन्होंने एक बार फिर उसे हरा कर दिया और ख़्वाजा साहिब ने पल – भर में उसे वापस उसी हालत में पहुँचा दिया । ख़्वाजा साहिब फ़रीद की ओर मुड़े और बोले , ‘ बेटा , तुम यहाँ रूहानी राज़ जानने और मालिक से मिलाप करने के लिए आये हो या कुदरत के क़ानूनों में दखल देने के लिए ? परमात्मा के हुक्म से ही यह पेड़ सूख गया है । तुम कुदरत की व्यवस्था में दखल देकर इस सूखे पेड़ को बार – बार हरा क्यों करना चाहते हो ? जाओ , अब तुम दिल्ली में कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी के पास जाओ । वही तुम्हारे मन की हालत देखकर तुम पर बख्रिशश करेंगे । ‘
हुक्म के अनुसार फ़रीद दिल्ली पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर क्या देखते हैं कि कुतुबुद्दीन , जो उस समय अभी बालक ही थे , अपने साथियों के साथ खेल रहे हैं । कुछ देर तक संदेहपूर्ण दृष्टि से फ़रीद उन्हें देखते रहे , फिर अपने मन में सोचा , यह नादान बालक भला मुझे क्या शिक्षा देगा !
हज़रत कुतुबुद्दीन देखने में तो बालक थे , लेकिन उनकी रूहानी अवस्था ऊँची थी । खेल छोड़कर वे पास की कोठरी में गये और एक मिनट बाद ही सफ़ेद लंबी दाढ़ी वाले बुजुर्ग के रूप में बाहर आ गये और कहने लगे , ‘ अब तो तुम्हारा मुर्शिद बनने के लिए मैं पूरा बुजुर्ग और समझदार दिखायी देता हूँ ? ‘ फ़रीद को अपनी अज्ञानता और अहंकार का एहसास हो गया और शर्म से उनकी गर्दन झुक गयी । घुटनों के बल गिरकर उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और दया की भीख माँगी । फिर उनकी संगति में रहकर उनके सच्चे शिष्य बने और समय बीतने पर खुद कामिल फ़क़ीर बने ।
संतों की संगति का लाभ प्राप्त करने के लिए दीनता और नम्रता आवश्यक है ।