माँ की शिक्षा

अपने अंदर प्रियतम के सिवाय और कोई चाह न रखो । भक्त और भगवान के बीच किसी दूसरे का ख़याल तक बाक़ी न रहे । मौलाना रूम

कहा जाता है कि जब प्राचीन भारत के एक राजा गोपीचंद ने दुनिया की ऐशो – इशरत से तंग आकर अपना राज्य छोड़ दिया और गोरखनाथ के पास योगी बनने के लिए चला गया तो गोरखनाथ ने उसे योग की दीक्षा दे दी । मगर यह सोचकर कि यह राजा है , इसके अंदर लोकलाज है , जो परमार्थ में बड़ी भारी दीवार है और जिसे दूर करना ज़रूरी है , उसने हुक्म दिया , ‘ बच्चा ! जैसा मैं तुझे कहूँ वैसा करो । साधू का भेष धारण करके , हाथ में कमंडल लेकर , वापस अपने राज्य में भिक्षा के लिए जाओ और जो कुछ तुम्हारी पूर्व प्रजा से मिले , ले आओ । ‘ अब राजा होकर अपने शहर में जाकर अपनी प्रजा से भिक्षा माँगना कोई छोटी – सी बात नहीं ।

गोपीचंद ने श्रद्धापूर्वक अपने गुरु का आदेश माना । जब शहर में गया , लोगों ने देखा कि यह राजा है , जिसने पैसा देना था उसने उसे रुपया दिया । वह आगे योगियों को देता गया और योगी गुरु के पास पहुँचाते गये । शहर में माँगकर फिर रानियों के पास गया । उन्होंने देखा कि यह तो राजा है , जो अच्छे कपड़े और गहने थे , सब उतारकर योगी को दे दिये कि अब राजा के बिना ये सब हमारे किस काम के ! गोपीचंद सब वस्तुएँ अपने साथी शिष्यों को देता गया और वे इन्हें अपने गुरु के पास भेजते रहे । अंत में गोपीचंद ने माँ के दरवाज़े पर जाकर अलख जगायी ।

माँ ने उसे देखकर कहा , ‘ योगी ! मैं गृहस्थ औरत हूँ , तू त्यागी पुरुष है । गृहस्थ का धर्म नहीं कि त्यागी को उपदेश दे , लेकिन इस समय तू मेरे दरवाज़े पर माँगने आया है , मुझे अधिकार है कि मैं जो चाहूँ , भिक्षा में दूँ !

जो कुछ तू माँगकर लाथा , ये तो योगी लोग खा जायेंगे , तेरे पास तो कुछ नहीं रहेगा । इसलिए मैं तुझे ऐसी भिक्षा नहीं देती , बल्कि तीन बातों की भिक्षा देती है :

‘ पहली यह कि रात को मज़बूत से मज़बूत किले में रहना । दुसरी यह कि स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन खाना और तीसरी यह कि नरम से नरम बिस्तर पर सोना ।

यह सुनकर योगी बोला , ‘ माँ ! तेरे उपदेश से मैं साधु हुआ हूँ , लेकिन अब तू मुझे क्या उलटा उपदेश दे रही है । अगर कोई और स्त्री यह कहती तो मैं उसे समझाता । देख माँ ! जंगलों में मज़बूत किले और स्वादिष्ट भोजन कहाँ ? इसी तरह नरम बिछौने कहाँ ? वहाँ तो सूखे टुकड़े खाने पड़ते हैं । वास पर लेटना पड़ता है । ‘ माँ ने उत्तर दिया , ‘ योगी ! तूने मेरा मतलब नहीं समझा ।

‘ गोपीचंद द्वारा मतलब पूछने पर उसने कहा , ‘ मेरा मतलब यह है कि तू दिन – रात जागना , अभ्यास करना । जिस वक़्त तुझे नींद तंग करे , गिराने लगे तो वहीं सो जाना , चाहे नीचे काँटे हों या कंकर , वही नरम से नरम बिछौना होगा । तुझे ऐसी नींद आयेगी जैसी कभी फूलों की सेज पर भी नहीं आयी होगी । दूसरे , जहाँ तक हो सके , थोड़ा खाना और भूखे रहना । जब भूख से प्राण तड़प उठे , प्राण निकलने लगें , तो रूखा – सूखा , बासी , जैसा भी टुकड़ा मिले , खा लेना । उस वक़्त सात दिनों का सूखा टुकड़ा भी तुझे हलवे और पुलाव से बढ़कर स्वादिष्ट लगेगा । तीसरे , तू राज्य छोड़कर योगी हुआ है । तेरे पास जवान स्त्रियों को भी आना है , वृद्ध और कम अवस्था की स्त्रियों को भी आना है । गुरु की संगति से बढ़कर और कोई मज़बूत क़िला नहीं है । अगर गुरु की संगति करेगा , गुरु के अधीन रहेगा , सत्संग सुनेगा तो इनसे बचा रहेगा । महात्मा के वचनों से मन को ठोकर लगती रहती है , मन सीधा रहता है । बस ! मैं तुझे इन तीनों बातों की भिक्षा देती हूँ और कुछ नहीं । ‘

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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