लफ़्ज़ों का फेर

गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने ‘ जाय साहिब ‘ में मालिक के हजार से अधिक नाम बताये हैं । पर वे केवल नामों के तात्पर्य को ग्रहण करने का आदेश देते हैं और कहते हैं कि तुम नामों से चलकर उस नामी को पकड़ो जो सबका इष्ट है । महाराज सावन

सिंह चार अलग – अलग मुल्कों के आदमी इकट्ठे हुए । उन्होंने मिलकर सलाह की कि कोई काम करें । उन्होंने कुछ ज़मीन ख़रीद ली । उनमें से एक उत्तर प्रदेश का था । उसने कहा कि मैं तो गेहूँ बोऊँगा । दूसरा जो पंजाबी था वह बोला कि मैं तेरी बात मानने को तैयार नहीं , मैं तो कनक बोऊँगा । तीसरा जिसकी ज़बान फ़ारसी थी कहने लगा कि मैं गंदुम बोऊँगा । चौथा अंग्रेज़ था । उसने कहा कि नहीं जी , हम तो व्हीट ( wheat ) बोयेंगे । वे चारों आपस में झगड़ने लगे । कोई समझदार आदमी उधर से निकला , उसने देखा कि ये बेकार में लफ़्ज़ों पर झगड़ रहे हैं । उसने कहा कि आप सब अपना – अपना बीज ले आओ । जब बीज लाये तो सबका बीज एक जैसा ही था । सारा झगड़ा ख़त्म हो गया ।

इसी तरह अगर हम अपनी रूह को अंदर नाम के साथ लगा दें तो मज़हबों और मुल्कों का कोई झगड़ा न रहे , सारे झगड़े लफ़्ज़ों के हैं ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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