जब लग मेरी मेरी करै । तब लग काज एक नही सरै ॥ जब मेरी मेरी मिट जाए । तब प्रभ काज सवारह आए ॥ कबीर साहिब
एक बार हज़रत मुहम्मद साहिब अपने दोस्तों और इमामों को मसजिद में ले गये और पूछा , ‘ आपके पास क्या – क्या है ? ‘ हज़रत उमर ने कहा कि मेरी औरत है , लड़के – लड़कियाँ हैं , ऊँट वगैरह हैं । सब कुछ गिनते – गिनाते उसे बहुत समय लग गया । दूसरों ने भी इसी तरह बताया । जब हज़रत अली की बारी आयी तो वह अपनी जगह से उठे और बोले , ‘ मेरा तो एक ख़ुदा है और एक आप हैं , इसके अलावा मेरा कुछ नहीं । ‘ हज़रत मुहम्मद साहिब का मतलब उनको समझाना था , सो इस तरह समझा दिया ।
हज़रत मुहम्मद अपने शिष्यों से बातचीत के माध्यम से अपना उपदेश दिया करते थे । परमार्थ में सांसारिक पदार्थों की कोई ख़ास महत्ता नहीं , वे हमारे पास थोड़े समय के लिए होते हैं और दुनिया से कूच करते समय हमारे साथ नहीं जाते । जो दुनिया में ज़्यादा फँसा हुआ है , उसका यही हाल होता है । वह बार – बार दुनिया में जन्म लेता है । जो ख़ुदा से प्यार करता है , वह दुनिया में क्यों भटकेगा ? यह समझने की बात है ।
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