नदी पार करने का मंत्र

यदि तुमको राई के दाने के बराबर भी विश्वास होता , तो तुम इस शहतूत के पेड़ से अगर कहते कि जड़ से उखड़कर समुद्र में लग जा , तो वह तुम्हारी मान लेता ।80 सेंट ल्यूक

एक बार का ज़िक्र है , एक स्त्री किसी महापुरुष की सेवा किया करती थी । महात्मा का डेरा नदी के पार था । उसका यह नियम था कि हर रोज़ महात्मा के लिए दूध ले जाना , सत्संग सुनना और वापस आ जाना ।

पहाड़ी इलाक़ों में कई जगह ज़रूरत के मुताबिक़ दरिया पर पुल बाँध देने का रिवाज है । जब बर्फ पिघलनी शुरू होती है तो पुल तोड़ देते हैं । जब पुल टूट जाता है तो वहाँ आना – जाना बंद हो जाता है । वह इलाक़ा भी इसी तरह का था । कुछ समय तो वह स्त्री महात्मा की सेवा करती रही । आख़िर एक दिन कहने लगी , ‘ महात्मा जी ! मैं रोज़ दूध लाती थी । कल पुल टूट जायेगा , इसलिए कल से मैं नहीं आ सकूँगी । ‘ उन्होंने कहा , ” एक शब्द तुम्हें बताते हैं , उसे याद कर लो और उस शब्द को पढ़ती हुई पानी पर से इसी तरह आया – जाया करना , जिस तरह पुल या ज़मीन पर चलते हैं । ‘

सो वह रोज़ दूध लेकर आती और वापस चली जाती । किसी भेषी साधु को पता चला । उसने उस माई को बुलाकर पूछा कि तू क्या पढ़ती है , जिससे पानी में डूबती नहीं । उसने उसे शब्द बता दिया । अब ‘ शब्द ‘ में ताक़त तो देनेवाले अभ्यासी में से आती है , न कि केवल बोलने से । लेकिन उस भेषी साधु को क्या पता ! मन में कहता है , ‘ अच्छा ! चलो चलकर आज़माते हैं । ‘ वह अपने शिष्यों की टोली को साथ ले आया , एक रस्सी लेकर अपनी कमर से बाँध ली । शिष्यों से कहा कि अगर मैं डूबने लगूं तो मुझे खींच लेना ।

उसे क्या मालूम कि यह तो भरोसे , मेहनत और गुरु की दया की चीज़ थी । शब्द पढ़ता हुआ वह पानी में दाखिल हुआ ही था कि लगा डूबने । फ़ौरन चीख़ा , ‘ खींचो ! खींचो ! ‘ शिष्यों ने एकदम खींच लिया ।

सतगुरु उसकी मदद करते हैं जो उन पर पूरा भरोसा रखता है । उसी शब्द में ताक़त है जो किसी संत – सतगुरु ने बख़्शा हो ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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